अयम् आत्मा ब्रह्म — Word-by-Word Meaning
अयम् आत्मा ब्रह्म
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
सर्वम्
sarvam
सब, सम्पूर्ण (समस्त जगत्)
हि
hi
निश्चय ही, वस्तुतः, क्योंकि
एतत्
etat
यह
ब्रह्म
brahma
ब्रह्म, परम सत्ता
अयम्
ayam
यह (अन्तःस्थित आत्मा)
आत्मा
ātmā
आत्मा, अन्तरात्मा
अयम् आत्मा ब्रह्म
ayam ātmā brahma
'यह आत्मा ही ब्रह्म है' — वह महावाक्य जो अन्तरतम आत्मा को परम तत्त्व के साथ एक बताता है
सः अयम् आत्मा
saḥ ayam ātmā
यही आत्मा
चतुष्पात्
catuṣpāt
चार पाद/अवस्थाओं वाली (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और चौथी तुरीय)
ओमित्येतदक्षरम्
om ityetad akṣaram
ॐ, यह अक्षर, यह सब है (उपनिषद् का प्रारम्भ, जो ॐ को ब्रह्म एवं आत्मा के साथ एक करता है)
Complete Translation
यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। यह आत्मा ही ब्रह्म है। यही आत्मा चार पादों (अवस्थाओं) वाली है — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय (चौथी अवस्था) जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप है और जिसका साक्षात्कार करना है।
Origin & History
Source: Mandukya Upanishad, Verse 2
Author: Traditional (Upanishadic)
Period: Vedic / Upanishadic
माण्डूक्य उपनिषद् इस घोषणा से आरम्भ होता है कि ॐ अक्षर ही यह सब है, सम्पूर्ण भूत, वर्तमान और भविष्य, तथा जो कुछ कालातीत है। इसका दूसरा श्लोक प्रतिपादित करता है — 'यह सब निश्चय ही ब्रह्म है; यह आत्मा ही ब्रह्म है,' और घोषित करता है कि इस आत्मा के चार पाद हैं। फिर उपनिषद् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं तथा अन्ततः तुरीय — चौथी, मौन, अद्वैत आत्मा — का वर्णन करता है। इसकी शिक्षा इतनी सघन है कि परम्परा मानती है कि गौडपाद की कारिका सहित अकेले माण्डूक्य का अध्ययन ही मोक्ष प्रदान करने में समर्थ है।
Frequently Asked Questions
अयम् आत्मा ब्रह्म का क्या अर्थ है?▼
अयम् आत्मा ब्रह्म का अर्थ है 'यह आत्मा ही ब्रह्म है'। यह सिखाता है कि आत्मा, आपके भीतर का यथार्थ स्वरूप, परम अनन्त सत्ता ब्रह्म से भिन्न नहीं है।
अयम् आत्मा ब्रह्म कहाँ से आया है?▼
यह माण्डूक्य उपनिषद् (श्लोक २) से है, जो अथर्ववेद से सम्बन्धित है। माण्डूक्य सबसे छोटा उपनिषद् है, केवल बारह श्लोकों वाला, फिर भी इसे आत्मा और ॐ अक्षर पर एक पूर्ण शिक्षा माना जाता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में वर्णित चार अवस्थाएँ कौन-सी हैं?▼
आत्मा की चार अवस्थाएँ हैं: जाग्रत अवस्था (बाह्य जगत् का अनुभव), स्वप्न अवस्था (मन का आन्तरिक जगत्), सुषुप्ति (बिना विषयों के अभिन्न आनन्द) और तुरीय, चौथी — शुद्ध अद्वैत चैतन्य, जो यथार्थ आत्मा और ब्रह्म है।
अयम् आत्मा ब्रह्म का ॐ के साथ अभ्यास कैसे किया जाता है?▼
माण्डूक्य ॐ की अ, उ, म ध्वनियों को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं से, तथा ॐ के पश्चात् के मौन को तुरीय से जोड़ता है। 'यह आत्मा ही ब्रह्म है' का चिन्तन करते हुए ॐ का ध्यान साधक को तीन अवस्थाओं से चौथी, मुक्तिदायक आत्म-अनुभूति की ओर ले जाता है।
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