प्रज्ञानं ब्रह्म
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✦ अर्थ
प्रज्ञानं ब्रह्म अर्थात् 'प्रज्ञान (चेतना) ही ब्रह्म है', ऐतरेय उपनिषद् (ऋग्वेद) का महावाक्य है और उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक है। यह घोषित करता है कि जिस शुद्ध चेतना के आधार पर समस्त देखना, सुनना, जानना और जीना होता है, वही परम तत्त्व ब्रह्म है। ऋग्वेद के इस महावाक्य पर अद्वैत वेदान्त आधारित है, जो साधक को अपनी ही चेतना में ब्रह्म का बोध कराता है।
उत्पत्ति और कथा
Aitareya Upanishad, Verse 3.1.3 · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic
ऐतरेय उपनिषद् का तीसरा अध्याय पूछता है: 'यह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं? किससे मनुष्य देखता, सुनता, सूँघता, बोलता और विवेक करता है?' ऋषि उत्तर देते हैं कि वह प्रज्ञान (चेतना) है, जो समस्त इन्द्रियों और सम्पूर्ण सृष्टि पर अधिष्ठित है — देवता, ऋषि, मनुष्य, पशु और महाभूत सभी उसी से संचालित हैं और उसी पर आश्रित हैं। इस अन्वेषण का सार बताते हुए उपनिषद् घोषणा करता है — 'प्रज्ञानं ब्रह्म — चेतना ही ब्रह्म है,' और शुद्ध बोध को परम सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
उपनिषद् का निष्कर्ष है कि जो ज्ञानी आत्मा को चेतना के रूप में जानकर उसी के द्वारा इस लोक से प्रयाण करता है, वह 'प्रकाशलोक में समस्त कामनाएँ प्राप्त कर अमर हो जाता है' — 'चेतना ही ब्रह्म है' का यह जागरण स्वयं मृत्यु के पार जाना है।
मंत्र
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प्रज्ञानं ब्रह्म ॥
prajñānaṁ brahma
अर्थ:प्रज्ञान (शुद्ध चेतना) ही ब्रह्म है। जिस चेतना से मनुष्य देखता, सुनता, जानता और जीता है, वही अनन्त ब्रह्म है; यही चेतना ब्रह्मा, सम्पूर्ण देवता, पाँचों महाभूत और समस्त प्राणी है; यह सब प्रज्ञान से ही संचालित और प्रतिष्ठित है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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प्रज्ञानं ब्रह्म पाठ के लाभ
उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक, जो ब्रह्म को शुद्ध चेतना के रूप में प्रकट करता है।
साधक का ध्यान बाहरी विषयों से हटाकर उन्हें जानने वाले भीतरी बोध-प्रकाश की ओर मोड़ता है।
ध्यान में अपनी ही चेतना को अनन्त, स्वयं-प्रकाश परम सत्ता के रूप में पहचानने हेतु प्रयुक्त होता है।
तैयार चित्त द्वारा चिन्तन करने पर आत्म-ज्ञान और मोक्ष प्रदान करता है।
मन को बदलते विचारों के बजाय अपरिवर्तनीय बोध में स्थिर कर अटल आन्तरिक शान्ति देता है।
अद्वैत वेदान्त के अध्ययन की आधारशिला और अद्वैत-चिन्तन का सशक्त संकेत।
प्रज्ञानं ब्रह्म जप विधि
यह चिन्तनपरक बोध का मन्त्र है। शान्त बैठकर 'प्रज्ञानं ब्रह्म' का उच्चारण करें, फिर धीरे से पूछें: 'वह बोध क्या है जिसमें मेरे सारे विचार, अनुभूतियाँ और संवेदन प्रकट होते हैं?' पहचानें कि यह नित्य-उपस्थित, जाननेवाली चेतना स्वयं ब्रह्म है — मन से उत्पन्न नहीं, बल्कि वही प्रकाश जो मन को प्रकाशित करता है। ध्यान को उसी बोध में विश्राम दें और मन के भटकने पर बार-बार उसी में लौट आएँ।