प्रज्ञानं ब्रह्म — Word-by-Word Meaning
प्रज्ञानं ब्रह्म
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
प्रज्ञानम्
prajñānam
शुद्ध चेतना, सर्वोच्च ज्ञान, वह बोध जो समस्त अनुभव को प्रकाशित करता है
प्र
pra
'पूर्णतः, सर्वोत्कृष्ट रूप से' अर्थ का उपसर्ग — सर्वोच्च, पूर्ण ज्ञान की ओर संकेत
ज्ञानम्
jñānam
ज्ञान, जानना, बोध
ब्रह्म
brahma
ब्रह्म, अनन्त परम सत्ता
प्रज्ञानं ब्रह्म
prajñānaṁ brahma
'चेतना ही ब्रह्म है' — शुद्ध बोध को परम तत्त्व के साथ अभिन्न बताने वाला महावाक्य
एष ब्रह्मा
eṣa brahmā
यह (चेतना) ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है (पूर्ण प्रसंग में)
एष इन्द्रः
eṣa indraḥ
यही इन्द्र और समस्त देवता हैं (चेतना ही सबका आधार है)
एतेन प्रज्ञेनात्मना
etena prajñenātmanā
इसी प्रज्ञान-रूप आत्मा से मनुष्य इस लोक से ऊपर उठता है (अमरत्व पाता है)
प्रज्ञां प्रतिष्ठा
prajñā pratiṣṭhā
प्रज्ञान ही (समस्त अस्तित्व की) प्रतिष्ठा है
प्रज्ञानेत्रः
prajñānetraḥ
जिसका नेत्र/मार्गदर्शक प्रज्ञान है — सम्पूर्ण जगत् चेतना द्वारा संचालित है
Complete Translation
प्रज्ञान (शुद्ध चेतना) ही ब्रह्म है। जिस चेतना से मनुष्य देखता, सुनता, जानता और जीता है, वही अनन्त ब्रह्म है; यही चेतना ब्रह्मा, सम्पूर्ण देवता, पाँचों महाभूत और समस्त प्राणी है; यह सब प्रज्ञान से ही संचालित और प्रतिष्ठित है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।
Origin & History
Source: Aitareya Upanishad, Verse 3.1.3
Author: Traditional (Upanishadic)
Period: Vedic / Upanishadic
ऐतरेय उपनिषद् का तीसरा अध्याय पूछता है: 'यह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं? किससे मनुष्य देखता, सुनता, सूँघता, बोलता और विवेक करता है?' ऋषि उत्तर देते हैं कि वह प्रज्ञान (चेतना) है, जो समस्त इन्द्रियों और सम्पूर्ण सृष्टि पर अधिष्ठित है — देवता, ऋषि, मनुष्य, पशु और महाभूत सभी उसी से संचालित हैं और उसी पर आश्रित हैं। इस अन्वेषण का सार बताते हुए उपनिषद् घोषणा करता है — 'प्रज्ञानं ब्रह्म — चेतना ही ब्रह्म है,' और शुद्ध बोध को परम सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
Frequently Asked Questions
प्रज्ञानं ब्रह्म का क्या अर्थ है?▼
प्रज्ञानं ब्रह्म का अर्थ है 'चेतना ही ब्रह्म है'। यह सिखाता है कि शुद्ध बोध — वह जानने वाली उपस्थिति जिससे हम देखते और जीते हैं — स्वयं ही परम सत्ता ब्रह्म है।
प्रज्ञानं ब्रह्म कहाँ से आता है?▼
यह ऐतरेय उपनिषद् (3.1.3) से है, जो ऋग्वेद का उपनिषद् है। यह ऋग्वेद से सम्बद्ध महावाक्य अर्थात् 'महान् वचन' है।
प्रज्ञानं ब्रह्म और अहं ब्रह्मास्मि में क्या अन्तर है?▼
दोनों महावाक्य एक ही अद्वैत सत्य की ओर संकेत करते हैं। प्रज्ञानं ब्रह्म ब्रह्म के स्वरूप को चेतना के रूप में परिभाषित करता है, जबकि अहं ब्रह्मास्मि साधक की प्रत्यक्ष अनुभूति है — 'मैं ब्रह्म हूँ'। तत् त्वम् असि और अयम् आत्मा ब्रह्म के साथ ये चार महावाक्य कहलाते हैं।
प्रज्ञानं ब्रह्म पर ध्यान कैसे करें?▼
चिन्तन करें कि जो कुछ भी आप अनुभव करते हैं वह बोध के भीतर ही प्रकट होता है, और यह बोध कोई विषय नहीं बल्कि आपका अपना स्वरूप है। इसे स्वयं-प्रकाश और असीम जानकर बदलते शरीर-मन के बजाय इसी से तादात्म्य करें। यही वह चिन्तन है जो मोक्ष तक ले जाता है।
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