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अहं वैश्वानरो भूत्वा — भोजन मन्त्र — Word-by-Word Meaning

अहं वैश्वानरो भूत्वा — भोजन मन्त्र

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अहं
Aham
मैं (परमेश्वर)
वैश्वानरः
Vaishvanarah
वैश्वानर — समस्त प्राणियों में स्थित जठराग्नि (पाचन की अग्नि)
भूत्वा
bhutva
होकर, बनकर
प्राणिनां
praninam
समस्त प्राणियों का
देहमाश्रितः
deham-ashritah
शरीर में स्थित, भीतर निवास करता हुआ
प्राणापानसमायुक्तः
prana-apana-samayuktah
प्राण (बहिर्गामी) और अपान (अन्तर्गामी) वायुओं से युक्त
पचामि
pachami
मैं पचाता हूँ, पकाता / आत्मसात् करता हूँ
अन्नं
annam
अन्न, भोजन
चतुर्विधम्
chatur-vidham
चार प्रकार का (चबाया, चूसा, चाटा, पिया जाने वाला)

Complete Translation

मैं वैश्वानर (जठराग्नि) रूप होकर समस्त प्राणियों के शरीर में स्थित रहता हूँ, और प्राण तथा अपान वायु से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita, Chapter 15, Verse 14

Author: Veda Vyasa (words of Sri Krishna)

Period: Ancient (Mahabharata / Bhagavad Gita)

भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय, पुरुषोत्तम योग में, श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापी उपस्थिति प्रकट करते हैं। इस श्लोक में वे कहते हैं कि वैश्वानर — पाचन की अग्नि — रूप में वे स्वयं प्रत्येक प्राणी के शरीर में स्थित होकर, जीवन-वायुओं से युक्त होकर खाए हुए सब कुछ को पचाते हैं। भक्त इसे भोजन से पूर्व पढ़ते हैं ताकि भोजन इस जागरूकता के साथ हो कि भीतर स्थित भगवान ही सच्चे भोक्ता और पाचन-शक्ति के दाता हैं, और इस प्रकार एक सामान्य कार्य उपासना बन जाता है।

Frequently Asked Questions

अहं वैश्वानरो भूत्वा कहाँ से है?
यह भगवद्गीता का श्लोक 15.14 है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने कहा। इसे व्यापक रूप से भोजन-मन्त्र — भोजन से पूर्व पढ़ी जाने वाली प्रार्थना — के रूप में प्रयोग किया जाता है, प्रायः ब्रह्मार्पणम् (गीता 4.24) के साथ।
इस श्लोक का क्या अर्थ है?
श्रीकृष्ण घोषित करते हैं कि वे, वैश्वानर (पाचन की अग्नि) रूप में, प्रत्येक प्राणी के शरीर में स्थित होकर, प्राण और अपान वायुओं से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाते हैं। इस प्रकार जो शक्ति हमारे भोजन को पचाती है वह स्वयं भगवान ही है।
'चार प्रकार के अन्न' कौन से हैं?
चतुर्विध अन्न भोजन ग्रहण करने के चार प्रकारों को कहता है: भक्ष्य (चबाया जाने वाला), भोज्य (खाया/निगला जाने वाला), लेह्य (चाटा जाने वाला) और चोष्य (चूसा जाने वाला)। श्लोक का अर्थ है कि भगवान हर प्रकार के अन्न को पचाते हैं जिसे हम ग्रहण करते हैं।

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