अहं वैश्वानरो भूत्वा — भोजन मन्त्र
अन्य नाम / खोज: aham vaishvanaro bhutva praninam deham ashritah · bhojan mantra gita 15.14 · food prayer before eating · vaishvanara mantra · prana apana samayuktah pachamy annam chaturvidham
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✦ अर्थ
भगवद्गीता (15.14) में श्रीकृष्ण द्वारा कहा गया यह श्लोक प्रकट करता है कि स्वयं भगवान वैश्वानर (जठराग्नि) रूप में प्रत्येक प्राणी के शरीर में स्थित होकर, प्राण-अपान से युक्त होकर हमारे खाए हुए अन्न को पचाते हैं। इसे भोजन से पूर्व भोजन-मन्त्र के रूप में व्यापक रूप से पढ़ा जाता है, जो स्मरण कराता है कि पाचन की शक्ति भी दिव्य है। इससे भोजन भगवान की अन्तरस्थ अग्नि में आहुति बन जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita, Chapter 15, Verse 14 · Veda Vyasa (words of Sri Krishna) · Ancient (Mahabharata / Bhagavad Gita)
भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय, पुरुषोत्तम योग में, श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापी उपस्थिति प्रकट करते हैं। इस श्लोक में वे कहते हैं कि वैश्वानर — पाचन की अग्नि — रूप में वे स्वयं प्रत्येक प्राणी के शरीर में स्थित होकर, जीवन-वायुओं से युक्त होकर खाए हुए सब कुछ को पचाते हैं। भक्त इसे भोजन से पूर्व पढ़ते हैं ताकि भोजन इस जागरूकता के साथ हो कि भीतर स्थित भगवान ही सच्चे भोक्ता और पाचन-शक्ति के दाता हैं, और इस प्रकार एक सामान्य कार्य उपासना बन जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि इस श्लोक के साथ ग्रहण किया हुआ भोजन खाने वाले को कभी हानि नहीं पहुँचाता, क्योंकि वह वैश्वानर रूप में स्वयं भगवान को अर्पित होता है और उन्हीं के द्वारा पचाया जाता है — और जिसे दिव्य स्वीकार करते हैं वह प्रसाद बन जाता है जो शरीर और आत्मा दोनों को पोषित करता है।
मंत्र
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अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
Aham vaishvanaro bhutva praninam deham-ashritah Prana-apana-samayuktah pachamy-annam chatur-vidham
अर्थ:मैं वैश्वानर (जठराग्नि) रूप होकर समस्त प्राणियों के शरीर में स्थित रहता हूँ, और प्राण तथा अपान वायु से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अहं वैश्वानरो भूत्वा — भोजन मन्त्र पाठ के लाभ
एक भगवद्गीता श्लोक (15.14) जो भोजन से पूर्व भोजन-मन्त्र रूप में पढ़ा जाता है, जो भोजन को भीतर स्थित भगवान को अर्पण बना देता है।
भक्त को स्मरण कराता है कि पाचन-अग्नि स्वयं भगवान (वैश्वानर) हैं, अतः खाया हुआ अन्न शरीर में उन्हीं के द्वारा ग्रहण होता है।
विनम्रता और कृतज्ञता विकसित करता है — पाचन का कार्य भी 'हमारा' नहीं, बल्कि दिव्य का ही कार्य है।
जागरूकता, संयम और सात्त्विक, प्रार्थनापूर्ण भाव से भोजन करने को प्रोत्साहित करता है।
घरों, आश्रमों और मन्दिरों में भोजन-पूर्व प्रार्थना के अंग रूप में पढ़ा जाता है।
संक्षिप्त, गूढ़ और ब्रह्मार्पणम् (गीता 4.24) के साथ कण्ठस्थ करने में सरल।
अहं वैश्वानरो भूत्वा — भोजन मन्त्र जप विधि
भोजन से पूर्व एक बार पढ़ें — प्रायः ब्रह्मार्पणम् (गीता 4.24) के बाद — भोजन को मन ही मन उन भगवान को अर्पित करते हुए जो भीतर पाचन की अग्नि रूप में स्थित हैं। इस जागरूकता के साथ भोजन करें कि अन्न को वैश्वानर, अन्तर्दिव्य अग्नि, ग्रहण कर रहे हैं, और कृतज्ञता एवं मौन में भोजन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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