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अक्रोधेन जयेत्क्रोधम् — Word-by-Word Meaning

अक्रोधेन जयेत्क्रोधम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अक्रोधेन
akrodhena
अक्रोध से, शान्ति से, क्रोध-रहितता से
जयेत्
jayet
जीतना चाहिए, परास्त करना चाहिए
क्रोधम्
krodham
क्रोध, रोष
असाधुम्
asādhum
दुष्ट व्यक्ति, बुरे को
साधुना
sādhunā
अच्छाई से, सद्व्यवहार से
जयेत्
jayet
जीतना चाहिए, वश में करना चाहिए
कदर्यम्
kadaryam
कंजूस, कृपण व्यक्ति को
दानेन
dānena
देने से, उदारता से, दान से
सत्येन
satyena
सत्य से, सत्यनिष्ठा से
ca
और
अनृतम्
anṛtam
असत्य, झूठ, मिथ्या को

Complete Translation

क्रोध को अक्रोध (शान्ति) से जीतना चाहिए, दुष्ट को सज्जनता से, कंजूस को दान से, और असत्य को सत्य से जीतना चाहिए। यह प्रसिद्ध सूक्ति सिखाती है कि प्रत्येक दोष को उसी के समान भाव से नहीं, अपितु उसके विपरीत गुण से ही जीता जाता है।

Origin & History

Source: Subhashita (Sanskrit niti literature; quoted in the Garuda Purana and ethical anthologies)

Author: Traditional (anonymous wisdom verse)

Period: Classical Sanskrit literature

यह श्लोक सुभाषितों के महान् भण्डार से सम्बन्धित है — वे संक्षिप्त, परिष्कृत संस्कृत सूक्तियाँ जो नैतिक ज्ञान को एक ही सुन्दर छन्द में संगृहीत कर देती हैं। यह आत्म-विजय पर शिक्षाओं में प्रायः उद्धृत किया जाता है, और इस कालातीत आदर्श को व्यक्त करता है कि किसी दोष पर सबसे निश्चित विजय उसे उसके विपरीत गुण से जीतने में है, न कि समान से समान का उत्तर देने में।

Frequently Asked Questions

अक्रोधेन जयेत्क्रोधम् का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'क्रोध को अक्रोध (शान्ति) से जीतना चाहिए।' पूर्ण श्लोक इस सिद्धान्त का विस्तार करता है: दुष्ट को अच्छाई से, कंजूस को दान से, और असत्य को सत्य से जीतो — सदैव दोष को उसके विपरीत गुण से परास्त करते हुए।
यह श्लोक कहाँ पाया जाता है?
यह संस्कृत नीति-परम्परा का एक सुप्रसिद्ध सुभाषित (बुद्धिमत्तापूर्ण सूक्ति) है, जो गरुड पुराण तथा अन्य नैतिक सूक्ति-संग्रहों में उद्धृत है। बुराई को भलाई से जीतने की यही शिक्षा समस्त भारतीय ज्ञान-साहित्य में मिलती है।
इस श्लोक को दैनिक जीवन में कैसे लागू किया जा सकता है?
जब भी आप क्रोध, दुर्भावना, लोभ या छल का सामना करें — अपने या दूसरों के — तो विपरीत गुण से उत्तर दें: क्रोध के समक्ष शान्त रहें, दुष्टता के समक्ष दयालु बनें, लोभ से पूर्व दान करें, और असत्य से पूर्व सत्य बोलें। यह संघर्ष को विकास में बदल देता है।

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