अक्रूर स्तुति Meaning — Line by Line
अक्रूर स्तुति
Every verse and every word explained in English & Hindi
Meaning — Line by Line
Every verse of अक्रूर स्तुति with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.
nato'smy ahaṁ tvākhila-hetu-hetuṁ
नतोऽस्म्यहं त्वाखिलहेतुहेतुं नारायणं पूरुषमाद्यमव्ययम् । यन्नाभिजातादरविन्दकोशाद् ब्रह्माविरासीद्यत एष लोकः ॥ १॥
nato'smy ahaṁ tvākhila-hetu-hetuṁ nārāyaṇaṁ pūruṣam ādyam avyayam | yan-nābhi-jātād aravinda-kośād brahmāvirāsīd yata eṣa lokaḥ || 1||
Meaningमैं आपको प्रणाम करता हूँ — समस्त कारणों के कारण, नारायण, आदि एवं अव्यय परम पुरुष — जिनकी नाभि से उत्पन्न कमलकोश से ब्रह्मा प्रकट हुए और जिनसे यह सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुआ।
bhūs toyam agniḥ pavanaṁ kham ādir
भूस्तोयमग्निः पवनं खमादिर् महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ २॥
bhūs toyam agniḥ pavanaṁ kham ādir mahān ajādir mana indriyāṇi | sarvendriyārthā vibudhāś ca sarve ye hetavas te jagato'ṅga-bhūtāḥ || 2||
Meaningपृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और उनका आदिकारण (अहंकार); महत्तत्त्व; अजन्मा प्रकृति; मन, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय तथा समस्त अधिष्ठातृ देवता — ये सब जगत् के कारण आपके ही अंगभूत हैं।
namo vijñāna-mātrāya sarva-pratyaya-hetave |
नमो विज्ञानमात्राय सर्वप्रत्ययहेतवे । पुरुषेशप्रधानाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ॥ ३॥
namo vijñāna-mātrāya sarva-pratyaya-hetave | puruṣeśa-pradhānāya brahmaṇe'nanta-śaktaye || 3||
Meaningआपको नमस्कार है, जो विशुद्ध विज्ञान (चैतन्य) मात्र हैं, समस्त ज्ञान के हेतु हैं, पुरुष और प्रधान (प्रकृति) के स्वामी हैं — अनन्त शक्तियों वाले उस परब्रह्म को नमस्कार।
namas te vāsudevāya sarva-bhūta-kṣayāya ca |
नमस्ते वासुदेवाय सर्वभूतक्षयाय च । हृषीकेश नमस्तुभ्यं प्रपन्नं पाहि मां प्रभो ॥ ४॥
namas te vāsudevāya sarva-bhūta-kṣayāya ca | hṛṣīkeśa namas tubhyaṁ prapannaṁ pāhi māṁ prabho || 4||
Meaningहे वासुदेव, आपको नमस्कार, जो समस्त भूतों के आश्रय हैं; हे हृषीकेश, आपको नमस्कार। हे प्रभो, मैं आपकी शरण में हूँ — मेरी रक्षा कीजिए।
Word-by-Word Breakdown
Origin & History
Source: Srimad Bhagavata Purana, Canto 10, Chapter 40 (The Prayers of Akrura)
Author: Veda Vyasa (as spoken by Akrura)
Period: Ancient (Puranic)
जब कंस ने भक्त अक्रूर को कृष्ण एवं बलराम को वृन्दावन से मथुरा लाने भेजा, तब अक्रूर प्रभु के दर्शन की उत्कट अभिलाषा से भरे हृदय से यात्रा करने लगे। मार्ग में यमुना नदी में स्नान करते समय उन्हें कृष्ण का परम प्रभु नारायण के रूप में, शेषनाग पर विराजमान एवं दिव्य प्राणियों से घिरे हुए, अद्भुत दर्शन हुआ। विस्मय एवं प्रेम से अभिभूत होकर अक्रूर ने हाथ जोड़कर यह स्तुति की, कृष्ण को समस्त कारणों के कारण, जिनकी नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए और जिनके शरीर में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्थित है, के रूप में महिमामण्डित किया। उन्होंने स्वयं को पूर्णतः समर्पित करते हुए, 'हे प्रभो, मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए' कहकर समापन किया। उनकी यह प्रार्थना भागवत के महान् भक्ति-स्तोत्रों में स्थान पाती है।
Frequently Asked Questions
अक्रूर स्तुति क्या है?▼
अक्रूर स्तुति कहाँ आती है?▼
'नमस्ते वासुदेवाय... प्रपन्नं पाहि मां प्रभो' का क्या अर्थ है?▼
अक्रूर स्तुति के पाठ के क्या लाभ हैं?▼
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