अक्रूर स्तुति
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✦ अर्थ
अक्रूर स्तुति श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध (अध्याय ४०) में अक्रूर द्वारा भगवान् कृष्ण को अर्पित प्रसिद्ध प्रार्थना है, जो यमुना के जल में कृष्ण का दिव्य दर्शन पाकर विस्मय से कही गई। ओजस्वी श्लोकों में वे प्रभु को नारायण, समस्त कारणों के कारण, जिनसे सम्पूर्ण सृष्टि और उसके सभी तत्त्व उत्पन्न होते हैं, तथा अनन्त शक्तियों वाले परब्रह्म के रूप में स्तुति करते हैं। यह प्रसिद्ध शरणागति 'नमस्ते वासुदेवाय... प्रपन्नं पाहि मां प्रभो' — 'हे प्रभो, मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए' — से समाप्त होती है।
उत्पत्ति और कथा
Srimad Bhagavata Purana, Canto 10, Chapter 40 (The Prayers of Akrura) · Veda Vyasa (as spoken by Akrura) · Ancient (Puranic)
जब कंस ने भक्त अक्रूर को कृष्ण एवं बलराम को वृन्दावन से मथुरा लाने भेजा, तब अक्रूर प्रभु के दर्शन की उत्कट अभिलाषा से भरे हृदय से यात्रा करने लगे। मार्ग में यमुना नदी में स्नान करते समय उन्हें कृष्ण का परम प्रभु नारायण के रूप में, शेषनाग पर विराजमान एवं दिव्य प्राणियों से घिरे हुए, अद्भुत दर्शन हुआ। विस्मय एवं प्रेम से अभिभूत होकर अक्रूर ने हाथ जोड़कर यह स्तुति की, कृष्ण को समस्त कारणों के कारण, जिनकी नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए और जिनके शरीर में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्थित है, के रूप में महिमामण्डित किया। उन्होंने स्वयं को पूर्णतः समर्पित करते हुए, 'हे प्रभो, मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा कीजिए' कहकर समापन किया। उनकी यह प्रार्थना भागवत के महान् भक्ति-स्तोत्रों में स्थान पाती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भागवत में वर्णित है कि यमुना में स्नान करते समय अक्रूर ने कृष्ण एवं बलराम को जल के भीतर अनन्त-शेष पर विराजमान चतुर्भुज नारायण के रूप में, ब्रह्मा, शिव एवं दिव्य ऋषियों से सेवित देखा — यह दर्शन उन्हें अकेले उनकी शुद्ध भक्ति के पुरस्कार रूप में प्राप्त हुआ, जिसने उन्हें यही प्रार्थना अर्पित करने को प्रेरित किया।
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नतोऽस्म्यहं त्वाखिलहेतुहेतुं नारायणं पूरुषमाद्यमव्ययम् । यन्नाभिजातादरविन्दकोशाद् ब्रह्माविरासीद्यत एष लोकः ॥ १॥
nato'smy ahaṁ tvākhila-hetu-hetuṁ nārāyaṇaṁ pūruṣam ādyam avyayam | yan-nābhi-jātād aravinda-kośād brahmāvirāsīd yata eṣa lokaḥ || 1||
अर्थ:मैं आपको प्रणाम करता हूँ — समस्त कारणों के कारण, नारायण, आदि एवं अव्यय परम पुरुष — जिनकी नाभि से उत्पन्न कमलकोश से ब्रह्मा प्रकट हुए और जिनसे यह सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुआ।
भूस्तोयमग्निः पवनं खमादिर् महानजादिर्मन इन्द्रियाणि । सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः ॥ २॥
bhūs toyam agniḥ pavanaṁ kham ādir mahān ajādir mana indriyāṇi | sarvendriyārthā vibudhāś ca sarve ye hetavas te jagato'ṅga-bhūtāḥ || 2||
अर्थ:पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और उनका आदिकारण (अहंकार); महत्तत्त्व; अजन्मा प्रकृति; मन, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय तथा समस्त अधिष्ठातृ देवता — ये सब जगत् के कारण आपके ही अंगभूत हैं।
नमो विज्ञानमात्राय सर्वप्रत्ययहेतवे । पुरुषेशप्रधानाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ॥ ३॥
namo vijñāna-mātrāya sarva-pratyaya-hetave | puruṣeśa-pradhānāya brahmaṇe'nanta-śaktaye || 3||
अर्थ:आपको नमस्कार है, जो विशुद्ध विज्ञान (चैतन्य) मात्र हैं, समस्त ज्ञान के हेतु हैं, पुरुष और प्रधान (प्रकृति) के स्वामी हैं — अनन्त शक्तियों वाले उस परब्रह्म को नमस्कार।
नमस्ते वासुदेवाय सर्वभूतक्षयाय च । हृषीकेश नमस्तुभ्यं प्रपन्नं पाहि मां प्रभो ॥ ४॥
namas te vāsudevāya sarva-bhūta-kṣayāya ca | hṛṣīkeśa namas tubhyaṁ prapannaṁ pāhi māṁ prabho || 4||
अर्थ:हे वासुदेव, आपको नमस्कार, जो समस्त भूतों के आश्रय हैं; हे हृषीकेश, आपको नमस्कार। हे प्रभो, मैं आपकी शरण में हूँ — मेरी रक्षा कीजिए।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अक्रूर स्तुति पाठ के लाभ
परम प्रभु कृष्ण के नारायण रूप में समर्पण (शरणागति) की गम्भीर प्रार्थना
प्रभु को समस्त कारणों के कारण एवं सम्पूर्ण सृष्टि के स्रोत के रूप में स्तुत कर ज्ञान एवं भक्ति को गहराती है
समापन याचना 'प्रपन्नं पाहि मां प्रभो' शरणागति एवं प्रभु की रक्षा की कामना का उत्तम मन्त्र है
विनम्रता, श्रद्धा तथा इस बोध को जगाने के लिए पढ़ी जाती है कि समस्त सृष्टि प्रभु में स्थित है
वैष्णवों द्वारा इस आदर्श रूप में प्रिय कि प्रभु का दर्शन पाकर भक्त को कैसे प्रार्थना करनी चाहिए
भाव से पढ़ने वालों को आध्यात्मिक रक्षा, मन की शान्ति एवं भक्ति में स्थिरता प्रदान करती है
श्रीमद्भागवत की एक प्रामाणिक शास्त्रीय स्तुति, जो इसे महान् पवित्रता प्रदान करती है
अक्रूर स्तुति जप विधि
श्रीमद्भागवत के इन श्लोकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें, आदर्श रूप से कृष्ण या विष्णु की मूर्ति के समक्ष। इनके अर्थ पर चिन्तन करें — कि प्रभु समस्त कारणों के कारण हैं और समस्त सृष्टि उनका शरीर है — और 'प्रपन्नं पाहि मां प्रभो' कहकर सच्चे भाव से शरणागत होकर समाप्त करें। इस प्रार्थना का पाठ नित्य पूजा के अंग रूप में अथवा जब भी प्रभु की रक्षा एवं समर्पण-भाव की कामना हो, किया जा सकता है। इसे धीरे-धीरे, प्रभु की महिमा एवं उन पर अपनी निर्भरता के ध्यान रूप में पढ़ना उचित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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