अङ्गं हरेः पुलकभूषणम् — Word-by-Word Meaning
अङ्गं हरेः पुलकभूषणम्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अङ्गं हरेः
Angam hareh
हरि (विष्णु) का अंग (शरीर)
पुलकभूषणम्
Pulaka-bhushanam
रोमांच से सुशोभित (आनंद के पुलक से युक्त)
आश्रयन्ती
Ashrayanti
आश्रय लेती हुई, सहारा लेती हुई
भृङ्गाङ्गना
Bhringangana
एक भ्रमरी
इव
Iva
के समान, जैसे
मुकुलाभरणम्
Mukulabharanam
कलियों/पुष्पों से सुशोभित
तमालम्
Tamalam
श्याम तमालवृक्ष
अङ्गीकृत
Angikrita
स्वीकार किया हुआ, धारण किया हुआ
अखिलविभूतिः
Akhila-vibhutih
समस्त विभूति, सम्पूर्ण ऐश्वर्य एवं समृद्धि
अपाङ्गलीला
Apanga-lila
कटाक्ष (तिरछी चितवन) की लीला
माङ्गल्यदा
Mangalyada
मंगल एवं कल्याण प्रदान करने वाली
अस्तु मम
Astu mama
मेरे लिए हो
मङ्गलदेवतायाः
Mangaladevatayah
मंगल की देवी (लक्ष्मी) की
Complete Translation
जैसे भ्रमरी कलियों से सुशोभित श्याम तमालवृक्ष पर बैठती है, वैसे ही हरि (विष्णु) के रोमांचित अंग का आश्रय लेती हुई — समस्त ऐश्वर्य और विभूति को धारण करने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-लीला, उन मंगलदेवी की वह कल्याणकारी सुन्दर दृष्टि मुझे मंगल और समृद्धि प्रदान करे।
Origin & History
Source: Kanakadhara Stotram (verse 1 of the descriptive verses), composed by Adi Shankaracharya
Author: Adi Shankaracharya
Period: 8th century CE
लगभग आठ वर्ष के बालक ब्रह्मचारी के रूप में शंकराचार्य ने एक अत्यन्त निर्धन स्त्री के द्वार पर भिक्षा माँगी, जिसके पास देने को एक आँवले के अतिरिक्त कुछ न था। उसकी निःस्वार्थ उदारता से द्रवित होकर उन्होंने स्वतःस्फूर्त रूप से माँ लक्ष्मी की स्तुति की, और यही श्लोक — 'अङ्गं हरेः पुलकभूषणम्' — उस प्रार्थना, कनकधारा स्तोत्र, का आरम्भ करता है। प्रसन्न होकर लक्ष्मी ने उस स्त्री के घर पर स्वर्ण के आँवलों की वर्षा कर दी।
Frequently Asked Questions
यह श्लोक किस स्तोत्र से है?▼
यह कनकधारा स्तोत्र का प्रसिद्ध प्रथम वर्णनात्मक श्लोक है (गणेश-वन्दना के पश्चात् पहला श्लोक), जिसे आदि शंकराचार्य ने माँ लक्ष्मी की स्तुति में रचा।
'अङ्गं हरेः पुलकभूषणम्' का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है कि लक्ष्मी की दृष्टि हरि (विष्णु) के अंग पर ठहरती है, जो रोमांच से 'सुशोभित' है — उनके बाल देवी की उपस्थिति में आनंद से खड़े हो जाते हैं — जैसे भ्रमरी पुष्पित तमालवृक्ष पर बैठती है।
यह श्लोक धन के लिए क्यों पढ़ा जाता है?▼
सम्पूर्ण कनकधारा स्तोत्र, जिसका यह प्रथम वर्णनात्मक श्लोक है, लक्ष्मी की कृपा के आह्वान के लिए रचा गया था और इसने एक बार स्वर्ण की वर्षा करा दी थी। यह श्लोक विशेष रूप से प्रार्थना करता है कि समस्त समृद्धि को धारण करने वाली उनकी मंगलमयी दृष्टि भक्त की ओर मुड़े।
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