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अङ्गं हरेः पुलकभूषणम्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 शुक्रवार प्रातःकाल, दीपावली, धनतेरस, अथवा आर्थिक कठिनाई के समय·📜 Kanakadhara Stotram (verse 1 of the descriptive verses), composed by Adi Shankaracharya

अन्य नाम / खोज: angam hareh pulaka bhushana · angam hare pulaka bhushanam · kanakadhara first verse

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अर्थ

यह आदि शंकराचार्य रचित कनकधारा स्तोत्र का प्रसिद्ध प्रथम वर्णनात्मक श्लोक है, जो माँ लक्ष्मी की कटाक्ष-दृष्टि की कृपा के लिए प्रार्थना करता है। इसमें उनकी दृष्टि को विष्णु के रोमांचित अंग पर बैठी भ्रमरी और पुष्पित तमालवृक्ष की उपमा दी गई है, जिसमें समस्त ऐश्वर्य और मंगल समाहित है। भक्त प्रार्थना करता है कि वह कल्याणकारी दृष्टि उसकी ओर मुड़े और उसे समृद्धि दे।

उत्पत्ति और कथा

Kanakadhara Stotram (verse 1 of the descriptive verses), composed by Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · 8th century CE

लगभग आठ वर्ष के बालक ब्रह्मचारी के रूप में शंकराचार्य ने एक अत्यन्त निर्धन स्त्री के द्वार पर भिक्षा माँगी, जिसके पास देने को एक आँवले के अतिरिक्त कुछ न था। उसकी निःस्वार्थ उदारता से द्रवित होकर उन्होंने स्वतःस्फूर्त रूप से माँ लक्ष्मी की स्तुति की, और यही श्लोक — 'अङ्गं हरेः पुलकभूषणम्' — उस प्रार्थना, कनकधारा स्तोत्र, का आरम्भ करता है। प्रसन्न होकर लक्ष्मी ने उस स्त्री के घर पर स्वर्ण के आँवलों की वर्षा कर दी।

शास्त्रों में वर्णित

शंकरविजय के अनुसार, जब बालक शंकराचार्य ने लक्ष्मी की दृष्टि का वर्णन करने वाले इन श्लोकों का पाठ किया, तो आकाश घिर आया और उस निर्धन स्त्री के घर पर स्वर्ण के आँवलों की वर्षा हुई, जिसने उसकी दरिद्रता सदा के लिए समाप्त कर दी। यह प्रारम्भिक श्लोक इसीलिए उस प्रार्थना का आदि माना जाता है जिसने शून्य से धन प्रकट कर दिया।

मंत्र

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अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः

Angam hareh pulakabhushanamashrayanti Bhringanganeva mukulabharanam tamalam Angikritakhilavibhutirapangalila Mangalyadastu mama mangaladevatayah

अर्थ:जैसे भ्रमरी कलियों से सुशोभित श्याम तमालवृक्ष पर बैठती है, वैसे ही हरि (विष्णु) के रोमांचित अंग का आश्रय लेती हुई — समस्त ऐश्वर्य और विभूति को धारण करने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-लीला, उन मंगलदेवी की वह कल्याणकारी सुन्दर दृष्टि मुझे मंगल और समृद्धि प्रदान करे।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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अङ्गं हरेः🔊Angam harehहरि (विष्णु) का अंग (शरीर)
पुलकभूषणम्🔊Pulaka-bhushanamरोमांच से सुशोभित (आनंद के पुलक से युक्त)
आश्रयन्ती🔊Ashrayantiआश्रय लेती हुई, सहारा लेती हुई
भृङ्गाङ्गना🔊Bhringanganaएक भ्रमरी
इव🔊Ivaके समान, जैसे
मुकुलाभरणम्🔊Mukulabharanamकलियों/पुष्पों से सुशोभित
तमालम्🔊Tamalamश्याम तमालवृक्ष
अङ्गीकृत🔊Angikritaस्वीकार किया हुआ, धारण किया हुआ
अखिलविभूतिः🔊Akhila-vibhutihसमस्त विभूति, सम्पूर्ण ऐश्वर्य एवं समृद्धि
अपाङ्गलीला🔊Apanga-lilaकटाक्ष (तिरछी चितवन) की लीला
माङ्गल्यदा🔊Mangalyadaमंगल एवं कल्याण प्रदान करने वाली
अस्तु मम🔊Astu mamaमेरे लिए हो
मङ्गलदेवतायाः🔊Mangaladevatayahमंगल की देवी (लक्ष्मी) की

अङ्गं हरेः पुलकभूषणम् पाठ के लाभ

कनकधारा स्तोत्र का प्रारम्भिक आवाहन — दरिद्रता दूर करने की सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रार्थना

लक्ष्मी की धन-प्रदायिनी कटाक्ष (कृपा-दृष्टि) को आकर्षित करने वाला माना जाता है

जब पूर्ण स्तोत्र न पढ़ा जा सके तब समृद्धि के लिए संक्षिप्त दैनिक प्रार्थना के रूप में आदर्श

देवी के सौन्दर्य एवं मंगलमयता का ध्यान कर भक्ति को विकसित करता है

समृद्धि के आह्वान हेतु पारम्परिक रूप से शुक्रवार, दीपावली एवं धनतेरस पर पढ़ा जाता है

मांगल्य — शुभता, वैवाहिक कल्याण एवं समग्र मंगल प्रदान करने वाला कहा गया है

अङ्गं हरेः पुलकभूषणम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयशुक्रवार प्रातःकाल, दीपावली, धनतेरस, अथवा आर्थिक कठिनाई के समय

लक्ष्मी अथवा लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा के समक्ष बैठें और घी का दीप जलाएँ। कमल अथवा पीले पुष्प अर्पित करें। इस श्लोक का 11 अथवा 108 बार पाठ करें, और देवी की करुणामयी कटाक्ष-दृष्टि को अपने ऊपर पड़ता हुआ चिन्तन करें। इसे एक प्रबल बीज-प्रार्थना के रूप में अकेले अथवा सम्पूर्ण कनकधारा स्तोत्र के प्रारम्भ के रूप में पढ़ा जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह कनकधारा स्तोत्र का प्रसिद्ध प्रथम वर्णनात्मक श्लोक है (गणेश-वन्दना के पश्चात् पहला श्लोक), जिसे आदि शंकराचार्य ने माँ लक्ष्मी की स्तुति में रचा।
इसका अर्थ है कि लक्ष्मी की दृष्टि हरि (विष्णु) के अंग पर ठहरती है, जो रोमांच से 'सुशोभित' है — उनके बाल देवी की उपस्थिति में आनंद से खड़े हो जाते हैं — जैसे भ्रमरी पुष्पित तमालवृक्ष पर बैठती है।
सम्पूर्ण कनकधारा स्तोत्र, जिसका यह प्रथम वर्णनात्मक श्लोक है, लक्ष्मी की कृपा के आह्वान के लिए रचा गया था और इसने एक बार स्वर्ण की वर्षा करा दी थी। यह श्लोक विशेष रूप से प्रार्थना करता है कि समस्त समृद्धि को धारण करने वाली उनकी मंगलमयी दृष्टि भक्त की ओर मुड़े।

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