अङ्गं हरेः पुलकभूषणम् PDF
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अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् । अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥
Angam hareh pulakabhushanamashrayanti Bhringanganeva mukulabharanam tamalam Angikritakhilavibhutirapangalila Mangalyadastu mama mangaladevatayah
जैसे भ्रमरी कलियों से सुशोभित श्याम तमालवृक्ष पर बैठती है, वैसे ही हरि (विष्णु) के रोमांचित अंग का आश्रय लेती हुई — समस्त ऐश्वर्य और विभूति को धारण करने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-लीला, उन मंगलदेवी की वह कल्याणकारी सुन्दर दृष्टि मुझे मंगल और समृद्धि प्रदान करे।