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अन्नपूर्णा चालीसा — Word-by-Word Meaning

अन्नपूर्णा चालीसा

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

विश्वेश्वर पदपद्म की रज
Vishweshvara Padapadma Ki Raja
विश्वेश्वर (काशी के भगवान शिव) के चरणकमलों की रज
निज शीश लगाय
Nija Shisha Lagaya
अपने शीश पर लगाकर
अन्नपूर्णे! तव सुयश
Annapurne! Tava Suyasha
हे अन्नपूर्णा, आपका यशस्वी सुयश
बरनौं कवि मति लाय
Baranaun Kavi Mati Laya
कवि की बुद्धि लगाकर मैं वर्णन करता हूँ
नित्य आनंद करिणी
Nitya Ananda Karini
नित्य आनंद देने वाली, सतत आनंद की दात्री
वर अरु अभय
Vara Aru Abhaya
वर देने और अभय करने की मुद्राओं (वरद एवं अभय मुद्रा) के लिए विख्यात
सौंदर्य सिंधु जग जननी
Saundarya Sindhu Jaga Janani
सौंदर्य का सागर, जगत् की माता
काशी पुराधीश्वरी
Kashi Puradhishvari
काशी (वाराणसी) नगरी की अधीश्वरी देवी
माहेश्वरी सकल जग त्राता
Maheshvari Sakala Jaga Trata
महेश्वरी, समस्त जगत् की रक्षिका
गिरि नंदिनि
Giri Nandini
पर्वत (हिमालय) की पुत्री
दक्ष यज्ञ महं मरती बारा
Daksha Yajna Mahn Marati Bara
दक्ष-यज्ञ में (सती रूप में) देह-त्याग के समय
माला पुस्तक अंकुश
Mala Pustaka Ankusha
हाथों में माला, पुस्तक और अंकुश धारण किए
अन्नपूर्णे! सदापूर्णे
Annapurne! Sadapurne
हे अन्नपूर्णा, सदा पूर्ण एवं परिपूर्ण
अज अनवद्य अनंत पूर्णे
Aja Anavadya Ananta Purne
अजन्मा, निर्दोष, अनंत और पूर्ण
कृपा सागरी क्षेमंकरि
Kripa Sagari Kshemankari
करुणा की सागर, कल्याण लाने वाली
स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी
Svarga Mahalakshmi Kahalayi
स्वर्ग में आप महालक्ष्मी कहलाती हैं
मर्त्य लोक लक्ष्मी
Martya Loka Lakshmi
मर्त्यलोक में आप (समृद्धि की) लक्ष्मी हैं
पाठ महा मुद मंगल दाता
Patha Maha Muda Mangala Data
यह पाठ महान् हर्ष एवं मंगल का दाता है
भक्त मनोवांछित निधि
Bhakta Manovanchhita Nidhi
भक्त अपने हृदय की वांछित निधि प्राप्त करता है
साखी काशीनाथ
Sakhi Kashinatha
काशीनाथ (काशी के स्वामी) की साक्षी में, उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं

Complete Translation

विश्वेश्वर के चरणकमलों की रज अपने शीश पर लगाकर कवि अपनी मति के अनुसार अन्नपूर्णा के सुयश का वर्णन करता है। हे नित्य आनंद देने वाली माता, वर एवं अभय मुद्रा से विख्यात, सौंदर्य-सिंधु, जगज्जननी, समस्त पाप एवं भव-भय हरने वाली—आपकी जय हो। चौपाइयों में श्वेतवर्णा, श्वेतवस्त्रधारिणी, ऋषि-मुनियों से सेवित, काशीपुराधीश्वरी, सकल जगत् की त्राता रुद्राणी का वर्णन है। दक्ष-यज्ञ में सती रूप में देह-त्याग, हिमालय-पुत्री गिरिजा रूप में पुनः प्राकट्य, नारद की प्रेरणा से तप, ब्रह्मा द्वारा वर-प्रदान, तथा शंकर से पुनर्मिलन की कथा है। वे माला, पुस्तक एवं अंकुश धारिणी, चन्द्रकोटि-रविकोटि प्रभा वाली, सदापूर्णा, अज, अनवद्य, अनंत—कृपासागरी अन्नपूर्णा हैं, जो स्वर्ग में महालक्ष्मी और मर्त्यलोक में लक्ष्मी कहलाती हैं। जो इस चालीसा का पाठ करता है, ईश की साक्षी में शुभ फल पाता है; प्रातःकाल भक्तिपूर्वक पढ़ने वाला स्त्री, पति, मित्र, पुत्र सहित अद्भुत ऐश्वर्य प्राप्त करता है। यह पाठ महान् हर्ष एवं मंगल का दाता है—काशीनाथ की साक्षी में भक्त के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

Origin & History

Source: Traditional Hindi devotional literature (Shakta tradition of Kashi)

Author: Traditional (anonymous)

Period: Modern devotional period

अन्नपूर्णा चालीसा अन्नपूर्णा, काशी की अन्न-दात्री देवी, की स्तुति में लोकप्रिय चालीस पंक्तियों का हिन्दी स्तोत्र है। यह अन्नपूर्णा की पौराणिक पहचान को पार्वती के रूप में तथा उस प्रसिद्ध काशी कथा को आधार बनाता है जिसमें शिव ने यह सिखाने के लिए कि तपस्वी भी पोषण हेतु माता पर निर्भर है, अन्नपूर्णा के ही हाथों से भिक्षा माँगी। चालीसा उनकी सती एवं गिरिजा रूप में शिव से पुनर्मिलन की कथा सुनाती है, और उन्हें समस्त पोषण एवं समृद्धि के स्रोत के रूप में, लक्ष्मी से एकरूप, महिमामंडित करती है।

Frequently Asked Questions

देवी अन्नपूर्णा कौन हैं?
अन्नपूर्णा देवी पार्वती का वह स्वरूप हैं जो अन्न एवं पोषण की अधिष्ठात्री हैं। उनके नाम का अर्थ है 'अन्न से पूर्ण' (अन्न = भोजन, पूर्णा = पूर्ण)। वे काशी (वाराणसी) की अधीश्वरी देवी हैं, जहाँ कहा जाता है कि वे समस्त प्राणियों को भोजन कराती हैं, और पोषण, प्रचुरता एवं समृद्धि की दात्री रूप में पूजी जाती हैं।
अन्नपूर्णा अपने हाथों में क्या धारण करती हैं?
चालीसा में उन्हें माला, पुस्तक एवं अंकुश धारण किए वर्णित किया गया है, और अन्यत्र वे प्रसिद्ध रूप से अन्न का पात्र और परोसने का चमचा लिए दर्शायी जाती हैं, जिससे वे स्वयं भगवान शिव को भी, जो काशी में भिक्षुक रूप में उनके समक्ष प्रकट होते हैं, भिक्षा देती हैं।
अन्नपूर्णा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे प्रातःकाल पढ़ना सर्वोत्तम है, जैसा कि स्तोत्र स्वयं सुझाता है, और विशेषकर अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष की पूर्णिमा), अक्षय तृतीया एवं शुक्रवार को। अनेक लोग इसे भोजन पकाने या परोसने से पूर्व भी पढ़ते हैं।
अन्नपूर्णा चालीसा क्या आशीर्वाद देती है?
समापन पंक्तियाँ वचन देती हैं कि भक्त को शुभ फल एवं हृदय की वांछित निधि प्राप्त होती है, काशीनाथ की साक्षी में। इसे अन्न की प्रचुरता, समृद्धि एवं अपने समस्त परिवार के कल्याण के लिए पढ़ा जाता है।

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