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अन्नपूर्णा चालीसा

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल (जैसा चालीसा सुझाती है), तथा अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), शुक्रवार एवं अक्षय तृतीया पर; भोजन पकाने या परोसने से पूर्व भी·📜 Traditional Hindi devotional literature (Shakta tradition of Kashi)

अन्य नाम / खोज: annapurna chalisa · annapurna mata chalisa · maa annapurna chalisa · annapoorna chalisa · shri annapurna chalisa

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अर्थ

अन्नपूर्णा चालीसा देवी अन्नपूर्णा—काशी की अधीश्वरी पार्वती-स्वरूपा, जो अन्न, पोषण एवं समृद्धि प्रदान करती हैं—की स्तुति में रचित चालीस पंक्तियों का हिन्दी स्तोत्र है। इसमें माला, पुस्तक एवं अंकुश धारिणी उनके श्वेत तेजोमय स्वरूप, सती एवं गिरिजा रूप में शिव से पुनर्मिलन की कथा, तथा स्वर्ग में महालक्ष्मी और भूलोक में लक्ष्मी रूप का वर्णन है। प्रातःकाल इसके पाठ से काशीनाथ की साक्षी में समृद्धि, ऐश्वर्य एवं गृहस्थ-सुख की प्राप्ति मानी जाती है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Hindi devotional literature (Shakta tradition of Kashi) · Traditional (anonymous) · Modern devotional period

अन्नपूर्णा चालीसा अन्नपूर्णा, काशी की अन्न-दात्री देवी, की स्तुति में लोकप्रिय चालीस पंक्तियों का हिन्दी स्तोत्र है। यह अन्नपूर्णा की पौराणिक पहचान को पार्वती के रूप में तथा उस प्रसिद्ध काशी कथा को आधार बनाता है जिसमें शिव ने यह सिखाने के लिए कि तपस्वी भी पोषण हेतु माता पर निर्भर है, अन्नपूर्णा के ही हाथों से भिक्षा माँगी। चालीसा उनकी सती एवं गिरिजा रूप में शिव से पुनर्मिलन की कथा सुनाती है, और उन्हें समस्त पोषण एवं समृद्धि के स्रोत के रूप में, लक्ष्मी से एकरूप, महिमामंडित करती है।

शास्त्रों में वर्णित

काशी की परम्परा बताती है कि जब शिव ने संसार को माया घोषित किया, तब पार्वती ने समस्त अन्न समेट लिया और तीनों लोक भूखे मरने लगे; तब वे काशी में अन्नपूर्णा रूप में अन्न के पात्र के साथ प्रकट हुईं, और शिव स्वयं भिक्षापात्र लेकर भिक्षा पाने उनके समक्ष आए — जिससे यह स्थापित हुआ कि माता की कृपा के बिना कोई नहीं जी सकता। भक्त मानते हैं कि इस चालीसा से अन्नपूर्णा की आराधना सुनिश्चित करती है कि उनका घर कभी अन्न-रहित न हो और समृद्धि से भरा रहे।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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दोहा 1

दोहा विश्वेश्वर पदपद्म की, रज निज शीश लगाय। अन्नपूर्णे! तव सुयश, बरनौं कवि मति लाय॥

|| Doha || Vishweshvara Padapadma Ki, Raja Nija Shisha Lagaya. Annapurne! Tava Suyasha, Baranaun Kavi Mati Laya.

अर्थ:विश्वेश्वर के चरणकमलों की रज अपने शीश पर लगाकर कवि अपनी मति के अनुसार अन्नपूर्णा के सुयश का वर्णन करता है। हे नित्य आनंद देने वाली माता, वर एवं अभय मुद्रा से विख्यात, सौंदर्य-सिंधु, जगज्जननी, समस्त पाप एवं भव-भय हरने वाली—आपकी जय हो। चौपाइयों में श्वेतवर्णा, श्वेतवस्त्रधारिणी, ऋषि-मुनियों से सेवित, काशीपुराधीश्वरी, सकल जगत् की त्राता रुद्राणी का वर्णन है। दक्ष-यज्ञ में सती रूप में देह-त्याग, हिमालय-पुत्री गिरिजा रूप में पुनः प्राकट्य, नारद की प्रेरणा से तप, ब्रह्मा द्वारा वर-प्रदान, तथा शंकर से पुनर्मिलन की कथा है। वे माला, पुस्तक एवं अंकुश धारिणी, चन्द्रकोटि-रविकोटि प्रभा वाली, सदापूर्णा, अज, अनवद्य, अनंत—कृपासागरी अन्नपूर्णा हैं, जो स्वर्ग में महालक्ष्मी और मर्त्यलोक में लक्ष्मी कहलाती हैं। जो इस चालीसा का पाठ करता है, ईश की साक्षी में शुभ फल पाता है; प्रातःकाल भक्तिपूर्वक पढ़ने वाला स्त्री, पति, मित्र, पुत्र सहित अद्भुत ऐश्वर्य प्राप्त करता है। यह पाठ महान् हर्ष एवं मंगल का दाता है—काशीनाथ की साक्षी में भक्त के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।

दोहा 2

चौपाई नित्य आनंद करिणी माता। वर अरु अभय भाव प्रख्याता॥ जय! सौंदर्य सिंधु जग जननी। अखिल पाप हर भव-भय-हरनी॥

|| Chaupai || Nitya Ananda Karini Mata. Vara Aru Abhaya Bhava Prakhyata. Jaya! Saundarya Sindhu Jaga Janani. Akhila Papa Hara Bhava-Bhaya-Harani.

चौपाई 1

श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि। संतन तुव पद सेवत ऋषि-मुनि॥ काशी पुराधीश्वरी माता। माहेश्वरी सकल जग त्राता॥

Shveta Badana Para Shveta Basana Puni. Santana Tuva Pada Sevata Rishi-Muni. Kashi Puradhishvari Mata. Maheshvari Sakala Jaga Trata.

चौपाई 2

वृषभारूढ़ नाम रुद्राणी। विश्व विहारिणि जय! कल्याणी॥ पतिदेवता सती शिरोमणि। पदवी प्राप्त कीन्ह गिरि नंदिनि॥

Vrishabharudha Nama Rudrani. Vishva Viharini Jaya! Kalyani. Patidevata Sati Shiromani. Padavi Prapta Kinha Giri Nandini.

चौपाई 3

पति विछोह दुख सहि नहिं पावा। योग अग्नि तब बदन जरावा॥ देह तजत शिव चरण सनेहू। राखेउ जात हिमगिरि गेहू॥

Pati Vichhoha Dukha Sahi Nahin Pava. Yoga Agni Taba Badana Jarava. Deha Tajata Shiva Charana Sanehu. Rakheu Jata Himagiri Gehu.

चौपाई 4

प्रकटी गिरिजा नाम धरायो। अति आनंद भवन महं छायो॥ नारद ने तब तोहिं भरमायहु। ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु॥

Prakati Girija Nama Dharayo. Ati Ananda Bhavana Mahn Chhayo. Narada Ne Taba Tohin Bharamayahu. Byaha Karana Hita Patha Padhayahu.

चौपाई 5

ब्रह्मा वरुण कुबेर गनाये। देवराज आदिक कहि गाये॥ सब देवन को सुजस बखानी। मति पलटन की मन महं ठानी॥

Brahma Varuna Kubera Ganaye. Devaraja Adika Kahi Gaye. Saba Devana Ko Sujasa Bakhani. Mati Palatana Ki Mana Mahn Thani.

चौपाई 6

अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या। कीन्ही सिद्ध हिमाचल कन्या॥ निज कौं तब नारद घबराये। तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये॥

Achala Rahin Tum Prana Para Dhanya. Kinhi Siddha Himachala Kanya. Nija Kaun Taba Narada Ghabaraye. Taba Prana Purana Mantra Padhaye.

चौपाई 7

करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ। संत बचन तुम सत्य परेखेउ॥ गगनगिरा सुनि टरी टारे। ब्रह्मा तब तुव पास पधारे॥

Karana Hetu Tapa Tohin Upadeshe-u. Santa Bachana Tum Satya Parekheu. Gaganagira Suni Tari Na Tare. Brahma Taba Tuva Pasa Padhare.

चौपाई 8

कहेउ पुत्रि वर मांगु अनूपा। देहौं आज तुव मति अनुरूपा॥ तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी। कष्ट उठायहु अति सुकुमारी॥

Kaheu Putri Vara Mangu Anupa. Dehaun Aja Tuva Mati Anurupa. Tum Tapa Kinha Alaukika Bhari. Kashta Uthayahu Ati Sukumari.

चौपाई 9

अब संदेह छांड़ि कछु मोसों। है सौगंध नहीं छल तोसों॥ करत वेद विद ब्रह्मा जानहु। वचन मोर यह सांचा मानहु॥

Aba Sandeha Chhandi Kachhu Moson. Hai Saugandha Nahin Chhala Toson. Karata Veda Vida Brahma Janahu. Vachana Mora Yaha Sancha Manahu.

चौपाई 10

तजि संकोच कहहु निज इच्छा। देहौं मैं मनमानी भिक्षा॥ सुनि ब्रह्मा की मधुरी बानी। मुख सों कछु मुसुकाय भवानी॥

Taji Sankocha Kahahu Nija Ichchha. Dehaun Main Manamani Bhiksha. Suni Brahma Ki Madhuri Bani. Mukha Son Kachhu Musukaya Bhavani.

चौपाई 11

बोली तुम का कहहु विधाता। तुम तो जग के स्रष्टा-धाता॥ मम कामना गुप्त नहिं तोसों। कहवावा चाहहु का मोसों॥

Boli Tum Ka Kahahu Vidhata. Tum To Jaga Ke Srashta-Dhata. Mama Kamana Gupta Nahin Toson. Kahavava Chahahu Ka Moson.

चौपाई 12

दक्ष यज्ञ महं मरती बारा। शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा॥ सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये। कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये॥

Daksha Yajna Mahn Marati Bara. Shambhunatha Puni Hohin Hamara. So Aba Milahin Mohin Manabhaye. Kahi Tathastu Vidhi Dhama Sidhaye.

चौपाई 13

तब गिरिजा शंकर तव भयऊ। फल कामना संशयो गयऊ॥ चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा। तब आनन महं करत निवासा॥

Taba Girija Shankara Tava Bhayau. Phala Kamana Sanshayo Gayau. Chandrakoti Ravi Koti Prakasha. Taba Anana Mahn Karata Nivasa.

चौपाई 14

माला पुस्तक अंकुश सोहै। कर महं अपर पाश मन मोहै॥ अन्नपूर्णे! सदापूर्णे। अज अनवद्य अनंत पूर्णे॥

Mala Pustaka Ankusha Sohai. Kara Mahn Apara Pasha Mana Mohai. Annapurne! Sadapurne. Aja Anavadya Ananta Purne.

चौपाई 15

कृपा सागरी क्षेमंकरि मां। भव विभूति आनंद भरी मां॥ कमल विलोचन विलसित भाले। देवि कालिके चण्डि कराले॥

Kripa Sagari Kshemankari Man. Bhava Vibhuti Ananda Bhari Man. Kamala Vilochana Vilasita Bhale. Devi Kalike Chandi Karale.

चौपाई 16

तुम कैलास मांहि हैं गिरिजा। विलसी आनंद साथ सिंधुजा॥ स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी। मर्त्य लोक लक्ष्मी पद पायी॥

Tum Kailasa Manhi Hain Girija. Vilasi Ananda Satha Sindhuja. Svarga Mahalakshmi Kahalayi. Martya Loka Lakshmi Pada Payi.

चौपाई 17

विलसी सब महं सर्व सरूपा। सेवत तोहिं अमर पुर भूपा॥ जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा। फल पाइहहिं शुभ साखी ईसा॥

Vilasi Saba Mahn Sarva Sarupa. Sevata Tohin Amara Pura Bhupa. Jo Padhihahin Yaha Tava Chalisa. Phala Paihahin Shubha Sakhi Isa.

चौपाई 18

प्रात समय जो जन मन लायो। पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अधिकायो॥ स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत। परमैश्वर्य लाभ लहि अद्भुत॥

Prata Samaya Jo Jana Mana Layo. Padhihahin Bhakti Suruchi Adhikayo. Stri Kalatra Pati Mitra Putra Yuta. Paramaishvarya Labha Lahi Adbhuta.

चौपाई 19

राज विमुख को राज दिवावै। जस तेरो जन सुजस बढ़ावै॥ पाठ महा मुद मंगल दाता। भक्त मनोवांछित निधि पाता॥

Raja Vimukha Ko Raja Divavai. Jasa Tero Jana Sujasa Badhavai. Patha Maha Muda Mangala Data. Bhakta Manovanchhita Nidhi Pata.

अंतिम दोहा

दोहा जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावैंगे माथ। तिनके कारज सिद्ध सब, साखी काशीनाथ॥

|| Doha || Jo Yaha Chalisa Subhaga, Padhi Navainge Matha. Tinake Karaja Siddha Saba, Sakhi Kashinatha.

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

विश्वेश्वर पदपद्म की रज🔊Vishweshvara Padapadma Ki Rajaविश्वेश्वर (काशी के भगवान शिव) के चरणकमलों की रज
निज शीश लगाय🔊Nija Shisha Lagayaअपने शीश पर लगाकर
अन्नपूर्णे! तव सुयश🔊Annapurne! Tava Suyashaहे अन्नपूर्णा, आपका यशस्वी सुयश
बरनौं कवि मति लाय🔊Baranaun Kavi Mati Layaकवि की बुद्धि लगाकर मैं वर्णन करता हूँ
नित्य आनंद करिणी🔊Nitya Ananda Kariniनित्य आनंद देने वाली, सतत आनंद की दात्री
वर अरु अभय🔊Vara Aru Abhayaवर देने और अभय करने की मुद्राओं (वरद एवं अभय मुद्रा) के लिए विख्यात
सौंदर्य सिंधु जग जननी🔊Saundarya Sindhu Jaga Jananiसौंदर्य का सागर, जगत् की माता
काशी पुराधीश्वरी🔊Kashi Puradhishvariकाशी (वाराणसी) नगरी की अधीश्वरी देवी
माहेश्वरी सकल जग त्राता🔊Maheshvari Sakala Jaga Trataमहेश्वरी, समस्त जगत् की रक्षिका
गिरि नंदिनि🔊Giri Nandiniपर्वत (हिमालय) की पुत्री
दक्ष यज्ञ महं मरती बारा🔊Daksha Yajna Mahn Marati Baraदक्ष-यज्ञ में (सती रूप में) देह-त्याग के समय
माला पुस्तक अंकुश🔊Mala Pustaka Ankushaहाथों में माला, पुस्तक और अंकुश धारण किए
अन्नपूर्णे! सदापूर्णे🔊Annapurne! Sadapurneहे अन्नपूर्णा, सदा पूर्ण एवं परिपूर्ण
अज अनवद्य अनंत पूर्णे🔊Aja Anavadya Ananta Purneअजन्मा, निर्दोष, अनंत और पूर्ण
कृपा सागरी क्षेमंकरि🔊Kripa Sagari Kshemankariकरुणा की सागर, कल्याण लाने वाली
स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी🔊Svarga Mahalakshmi Kahalayiस्वर्ग में आप महालक्ष्मी कहलाती हैं
मर्त्य लोक लक्ष्मी🔊Martya Loka Lakshmiमर्त्यलोक में आप (समृद्धि की) लक्ष्मी हैं
पाठ महा मुद मंगल दाता🔊Patha Maha Muda Mangala Dataयह पाठ महान् हर्ष एवं मंगल का दाता है
भक्त मनोवांछित निधि🔊Bhakta Manovanchhita Nidhiभक्त अपने हृदय की वांछित निधि प्राप्त करता है
साखी काशीनाथ🔊Sakhi Kashinathaकाशीनाथ (काशी के स्वामी) की साक्षी में, उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं

अन्नपूर्णा चालीसा पाठ के लाभ

अन्न, पोषण की प्रचुरता एवं घर में कभी कमी न होने के लिए देवी अन्नपूर्णा का आह्वान करती है

भक्त एवं परिवार को समृद्धि एवं अद्भुत ऐश्वर्य (परमैश्वर्य) लाने वाली मानी जाती है

पति, सन्तान, मित्र एवं समस्त परिवार के कल्याण के लिए पढ़ी जाती है

काशी की माता की कृपा से पाप, भय एवं भव-बन्धन दूर करती है

काशीनाथ की साक्षी में मंगल एवं हृदय की कामना की पूर्ति लाती है

पार्वती एवं लक्ष्मी, जो अन्नपूर्णा में एक हैं, का संयुक्त आशीर्वाद लाती है

प्रातःकाल भक्तिपूर्वक पढ़ने पर विशेष फलदायी, महान् हर्ष (महा-मुद) प्रदान करती है

अन्नपूर्णा चालीसा जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल (जैसा चालीसा सुझाती है), तथा अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), शुक्रवार एवं अक्षय तृतीया पर; भोजन पकाने या परोसने से पूर्व भी

देवी अन्नपूर्णा की आराधना के पश्चात्, आदर्श रूप से रसोई या चूल्हे या उनकी छवि के समक्ष पाठ करें। आरम्भ में आरम्भिक दोहा पढ़ें, चालीस चौपाइयों का भक्तिपूर्वक पाठ करें, और काशीनाथ को साक्षी रूप में आमंत्रित करने वाले समापन दोहे से समाप्त करें। स्तोत्र कहता है कि यह प्रातःकाल प्रेमपूर्वक पढ़ने पर विशेष फलदायी है। अनेक भक्त इसे भोजन पकाने से पूर्व पढ़ते हैं और भोजन का प्रथम भाग देवी को अर्पित करते हैं, अन्न को कभी व्यर्थ न करते हुए, उनके पोषण के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति रूप में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अन्नपूर्णा देवी पार्वती का वह स्वरूप हैं जो अन्न एवं पोषण की अधिष्ठात्री हैं। उनके नाम का अर्थ है 'अन्न से पूर्ण' (अन्न = भोजन, पूर्णा = पूर्ण)। वे काशी (वाराणसी) की अधीश्वरी देवी हैं, जहाँ कहा जाता है कि वे समस्त प्राणियों को भोजन कराती हैं, और पोषण, प्रचुरता एवं समृद्धि की दात्री रूप में पूजी जाती हैं।
चालीसा में उन्हें माला, पुस्तक एवं अंकुश धारण किए वर्णित किया गया है, और अन्यत्र वे प्रसिद्ध रूप से अन्न का पात्र और परोसने का चमचा लिए दर्शायी जाती हैं, जिससे वे स्वयं भगवान शिव को भी, जो काशी में भिक्षुक रूप में उनके समक्ष प्रकट होते हैं, भिक्षा देती हैं।
इसे प्रातःकाल पढ़ना सर्वोत्तम है, जैसा कि स्तोत्र स्वयं सुझाता है, और विशेषकर अन्नपूर्णा जयन्ती (मार्गशीर्ष की पूर्णिमा), अक्षय तृतीया एवं शुक्रवार को। अनेक लोग इसे भोजन पकाने या परोसने से पूर्व भी पढ़ते हैं।
समापन पंक्तियाँ वचन देती हैं कि भक्त को शुभ फल एवं हृदय की वांछित निधि प्राप्त होती है, काशीनाथ की साक्षी में। इसे अन्न की प्रचुरता, समृद्धि एवं अपने समस्त परिवार के कल्याण के लिए पढ़ा जाता है।

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