श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम्
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✦ अर्थ
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित काशी की माता अन्नपूर्णा की स्तुति है। यह देवी पार्वती के अन्न और पोषण देने वाले रूप की वंदना है। इसका पाठ अन्न, समृद्धि तथा भूख और दरिद्रता के भय से मुक्ति के लिए किया जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Composed by Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · 8th century CE
अन्नपूर्णा स्तोत्रम् आदि शंकराचार्य का काशी में स्थापित पोषण की देवी का स्तोत्र है, जहाँ वे विश्वनाथ के साथ उस माता के रूप में पूजी जाती हैं जो स्वयं भगवान शिव को भी भोजन कराती हैं। प्रत्येक श्लोक 'भिक्षां देहि… माता अन्नपूर्णेश्वरी' पर समाप्त होने वाले अलंकृत पदों में वे उनसे धन नहीं, बल्कि अन्न, ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा माँगते हैं। अंतिम श्लोकों में वे पूर्णतः समर्पित हो जाते हैं — 'मेरी माता पार्वती हैं, पिता महेश्वर हैं, शिव के भक्त मेरे बंधु हैं, और तीनों लोक मेरा घर हैं।'
✦ शास्त्रों में वर्णित
काशी में कहा जाता है कि अन्नपूर्णा अपने पास आने वाले प्रत्येक तीर्थयात्री को भोजन कराती हैं, ताकि उनकी नगरी में कोई भूखा न रहे; उनके भक्त मानते हैं कि इस स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करना इस आश्वासन के समान है कि घर और आत्मा कभी पोषण से वंचित नहीं रहेंगे।
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नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी । प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Nityanandakari varabhayakari saundaryaratnakari Nirdhutakhilaghorapavanakari pratyakshamaheshvari Praleyachalavamshapavanakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:नित्य आनन्द देने वाली, वर और अभय की दात्री, सौन्दर्य की रत्नाकर; समस्त घोर का नाश कर पवित्र करने वाली, साक्षात् माहेश्वरी; हिमगिरि (हिमालय) के वंश को पावन करने वाली, काशीपुर की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी मुक्ताहारविलम्बमान विलसत् वक्षोजकुम्भान्तरी । काश्मीरागरुवासिता रुचिकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Nanaratnavichitrabhushanakari hemambaradambari Muktaharavilambamana vilasat vakshojakumbhantari Kashmiragaruvasita ruchikari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:अनेक रत्नों के अद्भुत आभूषणों से सुसज्जित, स्वर्ण वस्त्रों में देदीप्यमान; वक्ष पर शोभित चमकता मुक्ताहार; केसर और अगरु से सुगन्धित, कान्तिमयी, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी । सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Yoganandakari ripukshayakari dharmarthanishthakari Chandrarkanalabhasamanalahari trailokyarakshakari Sarvaishvaryasamastavanchhitakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:योग के आनन्द की दात्री, शत्रुओं का नाश करने वाली, धर्म और कल्याण में निष्ठा की प्रतिष्ठापिका; चन्द्र, सूर्य और अग्नि सी तरंगों में देदीप्यमान, त्रैलोक्य की रक्षिका; समस्त ऐश्वर्य और प्रत्येक अभिलाषा की दात्री, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी । मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Kailasachalakandaralayakari gauri uma shankari Kaumari nigamarthagocharakari onkarabijakshari Mokshadvarakapatapatanakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:जो कैलास पर्वत की गुफाओं में निवास करती हैं — गौरी, उमा, शंकरी; नित्य कुमारी जो वेदों का अर्थ प्रकट करती हैं, जिनका बीजमन्त्र ओंकार है; जो मोक्ष के द्वार खोल देती हैं, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
दृश्यादृश्य विभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी । श्रीविश्वेशमनः प्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Drishyadrishya vibhutivahanakari brahmandabhandodari Lilanatakasutrabhedanakari vijnanadipankuri Shrivishveshamanah prasadanakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:जो दृश्य और अदृश्य समस्त विभूति धारण करती हैं, जिनके उदर में ब्रह्माण्ड का भाण्ड स्थित है; जो लीला-नाटक के सूत्र संचालित करती हैं, सत्यज्ञान की प्रज्वलित ज्योति; जो श्रीविश्वनाथ के मन को प्रसन्न करती हैं, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
उर्वी सर्वजनेश्वरी भगवती माताऽन्नपूर्णेश्वरी वेणीनीलसमानकुन्तलधरी नित्यान्नदानेश्वरी । सर्वानन्दकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Urvi sarvajaneshvari bhagavati matannapurneshvari Veninilasamanakuntaladhari nityannadaneshvari Sarvanandakari sadashubhakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:स्वयं पृथ्वी, समस्त प्राणियों की अधीश्वरी, दिव्य माता अन्नपूर्णेश्वरी; वेणी में गुँथे श्याम केश वाली, नित्य अन्न की दात्री; समस्त आनन्द की दात्री, सदा शुभकारिणी, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी काश्मीरा त्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी । कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Adikshantasamastavarnanakari shambhostribhavakari Kashmira trijaleshvari trilahari nityankura sharvari Kamakankshakari janodayakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:जो 'अ' से 'क्ष' तक समस्त वर्णों की रचयिता हैं, जो शिव के तीन भावों को रूप देती हैं; केसरवर्णा, तीन जल और तीन तरंगों की स्वामिनी, नित्य अंकुरित होने वाली, श्याम शर्वरी (रात्रि-देवी); कामना की पूर्णकर्ती और अपने जनों की उत्थानकर्ती, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी वामे स्वादुपयोधरा प्रियकरी सौभाग्य माहेश्वरी । भक्ताभीष्टकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Devi sarvavichitraratnarachita dakshayani sundari Vame svadupayodhara priyakari saubhagya maheshvari Bhaktabhishtakari sadashubhakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:समस्त अद्भुत रत्नों से रचित देवी, दक्ष की सुन्दर पुत्री; कृपामयी और प्रिय, समस्त सौभाग्य की महान देवी; अपने भक्तों की प्रत्येक अभिलाषा की दात्री, सदा शुभकारिणी, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी चन्द्रार्काग्निसमानकुण्डलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी । मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Chandrarkanalakotikotisadrisha chandramshubimbadhari Chandrarkagnisamanakundaladhari chandrarkavarneshvari Malapustakapashasankushadhari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:करोड़ों-करोड़ चन्द्र, सूर्य और अग्नि सी देदीप्यमान, जिनका मुख चन्द्रमण्डल सा है; चन्द्र, सूर्य और अग्नि से उज्ज्वल कुण्डल धारण करने वाली, चन्द्र-सूर्य के वर्ण वाली देवी; माला और पुस्तक, पाश और अंकुश धारण करने वाली, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी । दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ॥
Kshatratranakari mahabhayakari mata kripasagari Sakshanmokshakari sada shivakari vishveshvari shridhari Dakshakrandakari niramayakari kashipuradhishvari Bhiksham dehi kripavalambanakari matannapurneshvari
अर्थ:धर्मियों की रक्षिका, महान अभय की दात्री, करुणा की सागर माता; जो साक्षात् मोक्ष प्रदान करती हैं, सदा शिवकारिणी, विश्वेश्वरी, श्रीधारिणी; जो शोक दूर करती हैं और अपने भक्तों को समस्त रोगों से मुक्त रखती हैं, काशी की अधीश्वरी — हे माता अन्नपूर्णेश्वरी, करुणावलम्बिनी, मुझे भिक्षा दीजिए।
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥
Annapurne sadapurne Shankarapranavallabhe Jnanavairagyasiddhyartham Bhiksham dehi cha parvati
अर्थ:हे अन्नपूर्णा, सदा परिपूर्ण रहने वाली, शंकर की प्राण के समान प्रिया; ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति के लिए हे पार्वती, मुझे भिक्षा दीजिए।
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः । बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥
Mata cha parvati devi Pita devo maheshvarah Bandhavah shivabhaktashcha Svadesho bhuvanatrayam
अर्थ:मेरी माता देवी पार्वती हैं, मेरे पिता भगवान महेश्वर हैं; शिव के भक्त मेरे बन्धु हैं, और तीनों लोक मेरी मातृभूमि हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम् पाठ के लाभ
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित काशी की माता अन्नपूर्णा का यह स्तोत्र अन्न, समृद्धि और अभाव से मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है — कि कोई भी भक्त कभी भोजन से वंचित न रहे।
यह देवी की अन्न, ज्ञान और मोक्ष की दात्री के रूप में स्तुति करता है, और प्रसिद्ध रूप से केवल अन्न नहीं बल्कि ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा माँगता है।
ऐसा माना जाता है कि यह घर और रसोई को समृद्धि से भर देता है, दरिद्रता और भूख का भय दूर करता है, तथा संतोष और कल्याण प्रदान करता है।
विशेष रूप से अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), नवरात्रि में, भोजन से पूर्व, और काशी में अन्नपूर्णा की पूजा में इसका पाठ किया जाता है।
माता की समृद्धि की कृपा पाने के लिए इसे दुर्गा चालीसा और लक्ष्मी स्तोत्रों के साथ पढ़ा जाता है।
श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम् जप विधि
स्नान के पश्चात माता अन्नपूर्णा की मूर्ति (शिव को भोजन कराती देवी) के समक्ष बैठें, दीप जलाएँ और पका हुआ अन्न अथवा अनाज और लाल पुष्प अर्पित करें। भक्ति के साथ स्तोत्र का पाठ करें, और भोजन को प्रसाद के रूप में अर्पित करें। बहुत से लोग इसे रसोई में या भोजन से पूर्व पढ़ते हैं, यह स्मरण करते हुए कि अन्न स्वयं माता का उपहार है।
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