अणोरणीयान्महतो महीयान् PDF
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अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥
aṇor aṇīyān mahato mahīyān ātmāsya jantor nihito guhāyām tam akratuḥ paśyati vītaśoko dhātuprasādān mahimānam ātmanaḥ
अणु से भी सूक्ष्म और महान् से भी महान् यह आत्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय-गुहा में स्थित है। जो निष्काम, शान्तचित्त पुरुष है, वह इन्द्रियों एवं मन की प्रसन्नता (निर्मलता) से उस आत्मा की महिमा का दर्शन करता है और शोकरहित हो जाता है।