अणोरणीयान्महतो महीयान्
अन्य नाम / खोज: anor aniyan mahato mahiyan · anoraniyan mahato mahiyan atmasya jantor nihito guhayam · smaller than the smallest greater than the greatest · atma nihito guhayam
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✦ अर्थ
अणोरणीयान्महतो महीयान् कठ उपनिषद् के सर्वाधिक प्रिय श्लोकों में से एक है, जो आत्मा के विरोधाभासी स्वरूप का वर्णन करता है — जो सूक्ष्मतम अणु से भी सूक्ष्म और विशालतम से भी विशाल है, फिर भी प्रत्येक प्राणी के हृदय की गुप्त गुहा में विराजमान है। यह सिखाता है कि केवल वही निष्काम साधक, जिसकी इन्द्रियाँ एवं मन शान्त हो गए हैं, इस आत्मा की महिमा का दर्शन करके समस्त शोक से मुक्त हो जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Katha Upanishad, Verse 1.2.20 · Traditional (Upanishadic); taught by Yama to Nachiketa · Vedic / Upanishadic
कठ उपनिषद् में यम, मृत्यु के देवता, दृढ़ बालक नचिकेता को अमर आत्मा के ज्ञान का उपदेश देते हैं। नचिकेता को धन एवं भोग के स्थान पर ज्ञान चुनने के लिए सराहकर, यम उस आत्मा का वर्णन करते हैं जो समस्त प्राणियों के भीतर निवास करता है: अणु से भी सूक्ष्म फिर भी महान् से भी महान्, हृदय की गुहा में छिपा हुआ। वे घोषित करते हैं कि जिसने इच्छा को शान्त कर लिया है और मन को निर्मल बना लिया है, वही इस महिमामय आत्मा का दर्शन करता है और समस्त शोक से परे चला जाता है — वही अमरत्व जिसे नचिकेता ने माँगा था।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कठ उपनिषद् सिखाता है कि आत्मा, यद्यपि हृदय में स्थिर बैठा है, शरीर के सोने पर दूर तक यात्रा करता है और समस्त में वह अमर ज्योति है; और यह वचन देता है कि जो ज्ञानी इस 'महान् एवं सर्वव्यापी' आत्मा को अपने ही अस्तित्व में निवास करते हुए जान लेते हैं, वे फिर शोक नहीं करते, क्योंकि उन्होंने उस शान्ति को पा लिया है जो शाश्वत है।
मंत्र
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अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥
aṇor aṇīyān mahato mahīyān ātmāsya jantor nihito guhāyām tam akratuḥ paśyati vītaśoko dhātuprasādān mahimānam ātmanaḥ
अर्थ:अणु से भी सूक्ष्म और महान् से भी महान् यह आत्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय-गुहा में स्थित है। जो निष्काम, शान्तचित्त पुरुष है, वह इन्द्रियों एवं मन की प्रसन्नता (निर्मलता) से उस आत्मा की महिमा का दर्शन करता है और शोकरहित हो जाता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अणोरणीयान्महतो महीयान् पाठ के लाभ
आत्मा को अनन्त रूप से सूक्ष्म एवं अनन्त रूप से विशाल — समस्त माप से परे — प्रकट करता है।
परम सत्ता को अन्तर में, हृदय की गुहा में, ध्यान के लक्ष्य रूप में स्थित करता है।
सिखाता है कि इच्छा से मुक्ति एवं शान्त मन ही आत्मा के दर्शन की कुंजी हैं।
आत्मा का साक्षात्कार करने वाले को शोक से मुक्ति (वीत-शोक) का वचन देता है।
आन्तरिक शान्ति, निष्कामता एवं एकाग्र चिन्तन को विकसित करता है।
मन की शान्ति के लिए तथा अन्तर्यामी आत्मा की ओर ध्यान मोड़ने के लिए जपा जाता है।
अणोरणीयान्महतो महीयान् जप विधि
श्लोक का पाठ करें और फिर ध्यान को भीतर उसी 'हृदय की गुहा' की ओर मोड़ें जिसका यह वर्णन करता है। इच्छाओं एवं चंचलता को शान्त होने दें, जिससे इन्द्रियाँ एवं मन वैसे ही निर्मल हो जाएँ जैसा श्लोक निर्देश देता है। उस शान्ति में, उस आत्मा पर चिन्तन करें जो अणु से भी सूक्ष्म फिर भी समस्त आकाश से भी विशाल है, भीतर विराजमान है। उस महिमा की शोकरहित स्थिरता में विश्राम करें, जो आपके अपने आत्मा की महिमा है।