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अपराधसहस्राणि — Word-by-Word Meaning

अपराधसहस्राणि

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अपराध
aparādha
अपराध, भूलें, त्रुटियाँ, दोष
सहस्राणि
sahasrāṇi
सहस्रों (असंख्य)
क्रियन्ते
kriyante
किये जाते हैं, होते हैं
अहर्निशम्
aharniśam
दिन-रात, निरन्तर
मया
mayā
मुझसे
दासः अयम्
dāsaḥ ayam
यह तो आपका दास / सेवक है
इति
iti
इस प्रकार, ऐसा मानकर
माम्
mām
मुझे
मत्वा
matvā
मानकर, समझकर (मुझे ऐसा)
क्षमस्व
kṣamasva
क्षमा करें, माफ़ करें
परमेश्वर
parameśvara
हे परम प्रभु (परमेश्वर)

Complete Translation

हे परमेश्वर, मुझसे दिन-रात सहस्रों अपराध (भूलें) होते रहते हैं। 'यह तो मेरा दास (सेवक) है' — ऐसा मानकर, हे परमेश्वर, उन सबको क्षमा कर दें।

Origin & History

Source: Traditional Kshama Prarthana (forgiveness) verse recited to conclude worship

Author: Traditional (anonymous devotional verse)

Period: Classical (Puranic / liturgical devotional tradition)

हिन्दू उपासना परम्परागत रूप से क्षमापन से समाप्त होती है — अनुष्ठान में हुई किसी भी चूक के लिए क्षमा माँगने वाली प्रार्थना, क्योंकि यह स्वीकार किया जाता है कि मानवीय भक्ति सदा अपूर्ण होती है। यह श्लोक ऐसी प्रार्थनाओं में सबसे अधिक प्रयुक्त है। निश्छल सरलता से यह स्वीकार करता है कि 'मुझसे दिन-रात सहस्रों भूलें होती हैं', और अपनी समस्त आशा प्रभु की अपने दास पर कृपा में रखता है। पीढ़ियों के उपासकों से होकर आया यह श्लोक, चाहे किसी भी देवता की उपासना हो, पूजा को विनम्रता एवं समर्पण में समाप्त करने का मानक एवं प्रिय रूप बन गया है।

Frequently Asked Questions

अपराधसहस्राणि श्लोक कब पढ़ा जाता है?
इसे किसी भी उपासना के अन्त में — पूजा, आरती, जप अथवा स्तोत्र के पश्चात् — क्षमा-प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है, जिसमें प्रभु से अनुष्ठान की एवं अपने नित्य आचरण की किसी भी भूल, कमी या त्रुटि के लिए क्षमा माँगी जाती है।
पूजा के अन्त में हम क्षमा क्यों माँगते हैं?
कोई भी उपासना पूर्ण रूप से नहीं होती — विधि, उच्चारण अथवा ध्यान में त्रुटियाँ हो सकती हैं, तथा दैनिक जीवन में असंख्य भूलें भी। यह श्लोक विनम्रता से उन्हें स्वीकार कर प्रभु की कृपा को समर्पित कर देता है, और उपासना को गर्व के बजाय समर्पण के भाव में पूर्ण करता है।
क्या यह श्लोक किसी भी देवता के लिए प्रयुक्त हो सकता है?
हाँ। यह 'परमेश्वर', परम प्रभु को सम्बोधित है, और सार्वभौमिक है। इसे विष्णु, शिव, देवी, गणेश अथवा किसी भी देवता की उपासना के अन्त में पढ़ा जाता है, जो इसे सबसे व्यापक रूप से प्रयुक्त समापन-प्रार्थनाओं में से एक बनाता है।
इस मन्त्र का मुख्य भाव क्या है?
इसका हृदय 'दासोऽयमिति मां मत्वा' — 'यह तो आपका दास है, ऐसा मानकर' — इन शब्दों में है। भक्त क्षमा का दावा अपनी योग्यता से नहीं करता, अपितु प्रभु की अपने ही दास के प्रति करुणा का आश्रय लेकर माँगता है — यही समर्पण का सार है।

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