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अपराधसहस्राणि

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 किसी भी पूजा, उपासना, आरती, जप अथवा स्तोत्र-पाठ के बिल्कुल अन्त में·📜 Traditional Kshama Prarthana (forgiveness) verse recited to conclude worship

अन्य नाम / खोज: aparadha sahasrani · aparadha sahasrani kriyante · kshama prarthana mantra · forgiveness mantra · daso'yam iti mam matva kshamasva parameshvara · end of puja forgiveness mantra

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अर्थ

अपराधसहस्राणि किसी भी पूजा, उपासना या जप के अन्त में पढ़ी जाने वाली प्रसिद्ध 'क्षमा' (क्षमा-प्रार्थना) का श्लोक है। परम विनम्रता में भक्त स्वीकार करता है कि उससे दिन-रात असंख्य भूलें होती हैं, और परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वे उन सबको क्षमा कर दें — भक्त की अपनी योग्यता के कारण नहीं, अपितु इसलिए कि वह प्रभु का दास है। यह समर्पण (शरणागति) का सुन्दर भाव है जो प्रत्येक प्रार्थना का समापन करता है, और अभी-अभी की गई उपासना की किसी भी त्रुटि या कमी के लिए क्षमा माँगता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Kshama Prarthana (forgiveness) verse recited to conclude worship · Traditional (anonymous devotional verse) · Classical (Puranic / liturgical devotional tradition)

हिन्दू उपासना परम्परागत रूप से क्षमापन से समाप्त होती है — अनुष्ठान में हुई किसी भी चूक के लिए क्षमा माँगने वाली प्रार्थना, क्योंकि यह स्वीकार किया जाता है कि मानवीय भक्ति सदा अपूर्ण होती है। यह श्लोक ऐसी प्रार्थनाओं में सबसे अधिक प्रयुक्त है। निश्छल सरलता से यह स्वीकार करता है कि 'मुझसे दिन-रात सहस्रों भूलें होती हैं', और अपनी समस्त आशा प्रभु की अपने दास पर कृपा में रखता है। पीढ़ियों के उपासकों से होकर आया यह श्लोक, चाहे किसी भी देवता की उपासना हो, पूजा को विनम्रता एवं समर्पण में समाप्त करने का मानक एवं प्रिय रूप बन गया है।

शास्त्रों में वर्णित

ऐसा माना जाता है कि सदा करुणामय प्रभु उस भक्त के असंख्य अपराधों को क्षमा कर देते हैं जो दास रूप में उनकी शरण लेता है; अतः यह सरल स्वीकारोक्ति, सच्चे मन से अर्पित की जाने पर, उपासना एवं आचरण दोनों की त्रुटियों को धो देती है और भक्त को शान्ति प्रदान करती है, ऐसी श्रद्धा है।

मंत्र

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अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥

Aparādhasahasrāṇi kriyante'harniśaṁ mayā। Dāso'yam iti māṁ matvā kṣamasva parameśvara॥

अर्थ:हे परमेश्वर, मुझसे दिन-रात सहस्रों अपराध (भूलें) होते रहते हैं। 'यह तो मेरा दास (सेवक) है' — ऐसा मानकर, हे परमेश्वर, उन सबको क्षमा कर दें।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अपराध🔊aparādhaअपराध, भूलें, त्रुटियाँ, दोष
सहस्राणि🔊sahasrāṇiसहस्रों (असंख्य)
क्रियन्ते🔊kriyanteकिये जाते हैं, होते हैं
अहर्निशम्🔊aharniśamदिन-रात, निरन्तर
मया🔊mayāमुझसे
दासः अयम्🔊dāsaḥ ayamयह तो आपका दास / सेवक है
इति🔊itiइस प्रकार, ऐसा मानकर
माम्🔊māmमुझे
मत्वा🔊matvāमानकर, समझकर (मुझे ऐसा)
क्षमस्व🔊kṣamasvaक्षमा करें, माफ़ करें
परमेश्वर🔊parameśvaraहे परम प्रभु (परमेश्वर)

अपराधसहस्राणि पाठ के लाभ

उपासना में हुई समस्त त्रुटियों एवं कमियों के लिए प्रभु से क्षमा माँगता है

किसी भी पूजा, जप, आरती अथवा स्तोत्र-पाठ के समापन के लिए सर्वोत्तम श्लोक

गहन विनम्रता एवं समर्पण (शरणागति) के भाव को पुष्ट करता है

जाने-अनजाने हुए अपराधों के बोझ से हृदय को हल्का करता है

भक्त का प्रभु के दास रूप में सम्बन्ध पुष्ट करता है, दिव्य कृपा का आवाहन करता है

मन को शान्ति एवं अपनी नित्य साधना को पूर्णता प्रदान करता है

अपराधसहस्राणि जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयकिसी भी पूजा, उपासना, आरती, जप अथवा स्तोत्र-पाठ के बिल्कुल अन्त में

अपनी उपासना के अन्त में, आरती अथवा जप के पश्चात्, हाथ जोड़कर एवं सिर झुकाकर इस श्लोक का पाठ प्रार्थना के अन्तिम कर्म के रूप में करें। प्रभु को 'परमेश्वर' कहकर सम्बोधित करें एवं अभी-अभी किये गये अनुष्ठान की किसी भी भूल, कमी या त्रुटि को सच्चे मन से स्वीकार करें, केवल उनके दास के रूप में क्षमा माँगें। परम्परा से इसे एक बार कहा जाता है, यद्यपि तीन बार भी दोहराया जा सकता है; अनेक इसके पश्चात् एक अन्तिम प्रणाम करते हैं। यह सार्वभौमिक है — किसी भी देवता की उपासना में प्रयोग्य — एवं विनम्रता में प्रार्थना को समाप्त करने के सबसे उपयुक्त उपायों में से एक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसे किसी भी उपासना के अन्त में — पूजा, आरती, जप अथवा स्तोत्र के पश्चात् — क्षमा-प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है, जिसमें प्रभु से अनुष्ठान की एवं अपने नित्य आचरण की किसी भी भूल, कमी या त्रुटि के लिए क्षमा माँगी जाती है।
कोई भी उपासना पूर्ण रूप से नहीं होती — विधि, उच्चारण अथवा ध्यान में त्रुटियाँ हो सकती हैं, तथा दैनिक जीवन में असंख्य भूलें भी। यह श्लोक विनम्रता से उन्हें स्वीकार कर प्रभु की कृपा को समर्पित कर देता है, और उपासना को गर्व के बजाय समर्पण के भाव में पूर्ण करता है।
हाँ। यह 'परमेश्वर', परम प्रभु को सम्बोधित है, और सार्वभौमिक है। इसे विष्णु, शिव, देवी, गणेश अथवा किसी भी देवता की उपासना के अन्त में पढ़ा जाता है, जो इसे सबसे व्यापक रूप से प्रयुक्त समापन-प्रार्थनाओं में से एक बनाता है।
इसका हृदय 'दासोऽयमिति मां मत्वा' — 'यह तो आपका दास है, ऐसा मानकर' — इन शब्दों में है। भक्त क्षमा का दावा अपनी योग्यता से नहीं करता, अपितु प्रभु की अपने ही दास के प्रति करुणा का आश्रय लेकर माँगता है — यही समर्पण का सार है।

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