आराधिता सैव नृणाम् (देवी की शरण — फल-श्लोक) — Word-by-Word Meaning
आराधिता सैव नृणाम् (देवी की शरण — फल-श्लोक)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
Complete Translation
Origin & History
Source: Durga Saptashati Chapter 13
Author: Sage Markandeya (Markandeya Purana)
Period: Ancient (part of the Markandeya Purana, c. 400–600 CE)
देवी माहात्म्य का समापन अध्याय अपनी कथा-भूमिका पर लौटता है। राज्य से वंचित राजा सुरथ और अपने परिवार द्वारा निकाले गए वैश्य समाधि, मेधा मुनि से देवी की सम्पूर्ण महिमा सुन चुके हैं। अब मुनि राजा को परम देवी की शरण लेने को कहते हैं, जो अपनी माया से सबको मोहित करती हैं फिर भी पूजित होने पर भोग, स्वर्ग और मोक्ष देती हैं। वे दोनों नदी के तट पर जाकर देवी की मिट्टी की प्रतिमा बनाते हैं और तीन वर्ष तक पुष्प, अग्नि और संयम से उनकी आराधना करते हैं। प्रसन्न होकर चण्डिका साक्षात् प्रकट होती हैं और प्रत्येक को मनचाहा वर देती हैं — सुरथ को राज्य और भावी मनुपद, समाधि को मुक्तिदायी ज्ञान — और फिर अन्तर्धान हो जाती हैं, जिससे ग्रन्थ अपने समापन को पहुँचता है।
Frequently Asked Questions
'भोग-स्वर्ग-अपवर्ग-दा' का क्या अर्थ है?▼
ये श्लोक दुर्गा सप्तशती में कहाँ आते हैं?▼
राजा और वैश्य ने कौन-से वर चुने?▼
इन्हें फल-श्लोक क्यों कहते हैं?▼
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