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आराधिता सैव नृणाम् (देवी की शरण — फल-श्लोक) PDF

आराधिता सैव नृणाम् (देवी की शरण — फल-श्लोक) की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

ऋषिरुवाच एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम् । एवं प्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥

ṛṣiruvāca etatte kathitaṃ bhūpa devīmāhātmyamuttamam evaṃ prabhāvā sā devī yayedaṃ dhāryate jagat

ऋषि बोले — 'हे राजन्! देवी का यह उत्तम माहात्म्य आपको कह सुनाया। ऐसे प्रभाव वाली हैं वे देवी, जिनसे यह जगत् धारण किया जाता है। और ज्ञान भी वैसे ही भगवान् विष्णु की माया से उत्पन्न होता है। उन्हीं के द्वारा आप, यह वैश्य, और वैसे ही अन्य विवेकी जन मोहित किए जाते हैं; कुछ मोहित हुए हैं, और कुछ अन्य मोह को प्राप्त होंगे। हे महाराज! उन परमेश्वरी की शरण में जाइए। वही आराधना किए जाने पर मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष देने वाली होती हैं।' (तब राजा और वैश्य द्वारा तीन वर्ष आराधना करने पर) जगद्धात्री चण्डिका परम प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे बोलीं। देवी बोलीं — 'हे राजन्! और हे कुलनन्दन! तुम दोनों जो माँगते हो, वह सब मुझसे प्राप्त करो; प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह देती हूँ।'

विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया । तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥

vidyā tathaiva kriyate bhagavadviṣṇumāyayā tayā tvameṣa vaiśyaśca tathaivānye vivekinaḥ

मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे । तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥

mohyante mohitāścaiva mohameṣyanti cāpare tāmupaihi mahārāja śaraṇaṃ parameśvarīm

आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥

ārādhitā saiva nṛṇāṃ bhogasvargāpavargadā

परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥

parituṣṭā jagaddhātrī pratyakṣaṃ prāha caṇḍikā

देव्युवाच यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन । मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि ते ॥

devyuvāca yatprārthyate tvayā bhūpa tvayā ca kulanandana mattastatprāpyatāṃ sarvaṃ parituṣṭā dadāmi te