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अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् Meaning — Line by Line

अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम्

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. namaste siddha-senāni ārye mandara-vāsini |
  2. Verse 2. bhadrakāli namas-tubhyaṃ mahākāli namo'stu te |
  3. Verse 3. kātyāyani mahā-bhāge karāli vijaye jaye |
  4. Verse 4. aṭṭa-śūla-praharaṇe khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi |
  5. Verse 5. mahiṣāsṛk-priye nityaṃ kauśiki pīta-vāsini |
Verse 1#

namaste siddha-senāni ārye mandara-vāsini |

नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि। कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिङ्गले॥

namaste siddha-senāni ārye mandara-vāsini | kumāri kāli kāpāli kapile kṛṣṇa-piṅgale ||

Meaningहे सिद्धों की सेना की सेनापति! हे मन्दराचल पर निवास करने वाली आर्ये! आपको नमस्कार है — हे कुमारि, हे कालि, हे कापालि, हे कपिले, हे कृष्णपिङ्गले!

Verse 2#

bhadrakāli namas-tubhyaṃ mahākāli namo'stu te |

भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोऽस्तु ते। चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिणि वरवर्णिनि॥

bhadrakāli namas-tubhyaṃ mahākāli namo'stu te | caṇḍi caṇḍe namas-tubhyaṃ tāriṇi vara-varṇini ||

Meaningहे मङ्गलमयी भद्रकालि, आपको नमस्कार; हे महाकालि, आपको नमस्कार हो; हे चण्डि, हे चण्डे, आपको नमस्कार; हे तारिणि, हे वरवर्णिनि!

Verse 3#

kātyāyani mahā-bhāge karāli vijaye jaye |

कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये। शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते॥

kātyāyani mahā-bhāge karāli vijaye jaye | śikhi-piccha-dhvaja-dhare nānā-bharaṇa-bhūṣite ||

Meaningहे महाभाग्यशालिनी कात्यायनि, हे करालि, हे विजये, हे जये! हे मयूरपिच्छ की ध्वजा धारण करने वाली, नाना आभूषणों से विभूषित देवि!

Verse 4#

aṭṭa-śūla-praharaṇe khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi |

अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि। गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे॥

aṭṭa-śūla-praharaṇe khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi | gopendrasyānuje jyeṣṭhe nanda-gopa-kulodbhave ||

Meaningहे विकराल शूल (त्रिशूल) धारण करने वाली, हे खड्ग और ढाल धारिणि! हे गोपेन्द्र (कृष्ण) की अनुजा, हे ज्येष्ठे, हे नन्दगोप के कुल में जन्म लेने वाली!

Verse 5#

mahiṣāsṛk-priye nityaṃ kauśiki pīta-vāsini |

महिषासृक्प्रिये नित्यं कौशिकि पीतवासिनि। अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेऽस्तु रणप्रिये॥

mahiṣāsṛk-priye nityaṃ kauśiki pīta-vāsini | aṭṭa-hāse koka-mukhe namas-te'stu raṇa-priye ||

Meaningहे महिषासुर के रक्त से सदा प्रसन्न रहने वाली, हे पीताम्बरधारिणी कौशिकि! हे अट्टहास करने वाली, हे (विकराल) कोकमुखी! हे रणप्रिये, आपको नमस्कार हो!

Word-by-Word Breakdown

नमस्ते सिद्धसेनानि
namaste siddha-senāni
आपको नमस्कार, सिद्धों (पूर्ण पुरुषों) की सेना की सेनापति
आर्ये मन्दरवासिनि
ārye mandara-vāsini
हे आर्ये, मन्दर पर्वत पर निवास करने वाली
कुमारि
kumāri
हे चिरकुमारी (कुमारि)
कालि कापालि
kāli kāpāli
हे कालि, हे कपाल धारण करने वाली (कापालि)
कपिले कृष्णपिङ्गले
kapile kṛṣṇa-piṅgale
हे कपिलवर्णा, हे कृष्ण एवं पिङ्गल (श्याम-रक्तवर्ण) रूपा
भद्रकालि नमस्तुभ्यं
bhadrakāli namas-tubhyaṃ
हे मङ्गलमयी भद्रकालि, आपको नमस्कार
महाकालि नमोऽस्तु ते
mahākāli namo'stu te
हे महाकालि, आपको मेरा नमस्कार हो
चण्डि चण्डे
caṇḍi caṇḍe
हे उग्र चण्डि, हे क्रोधमयी (चण्डे)
तारिणि वरवर्णिनि
tāriṇi vara-varṇini
हे तारिणी (प्राणियों को पार उतारने वाली), हे परम वर्ण (सुन्दर वर्ण) वाली
कात्यायनि महाभागे
kātyāyani mahā-bhāge
हे कात्यायनि, हे महाभाग्यशालिनी एवं तेजस्विनी
करालि विजये जये
karāli vijaye jaye
हे करालि (विकराल), हे विजये, हे जये (जय-स्वरूपा)
शिखिपिच्छध्वजधरे
śikhi-piccha-dhvaja-dhare
हे मयूरपिच्छ से अलंकृत ध्वजा धारण करने वाली
नानाभरणभूषिते
nānā-bharaṇa-bhūṣite
हे नाना आभूषणों से विभूषित
अट्टशूलप्रहरणे
aṭṭa-śūla-praharaṇe
हे महान् एवं विकराल शूल (त्रिशूल) धारण करने वाली
खड्गखेटकधारिणि
khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi
हे खड्ग और ढाल धारण करने वाली
गोपेन्द्रस्य अनुजे ज्येष्ठे
gopendrasyānuje jyeṣṭhe
हे गोपेन्द्र (कृष्ण) की अनुजा, हे ज्येष्ठे
नन्दगोपकुलोद्भवे
nanda-gopa-kulodbhave
हे नन्दगोप के कुल में जन्म लेने वाली
महिषासृक्प्रिये नित्यं
mahiṣāsṛk-priye nityaṃ
हे महिषासुर के रक्त से सदा प्रसन्न रहने वाली
कौशिकि पीतवासिनि
kauśiki pīta-vāsini
हे कौशिकि, हे पीताम्बर धारण करने वाली
अट्टहासे कोकमुखे
aṭṭa-hāse koka-mukhe
हे अट्टहास करने वाली, हे (विकराल) भेड़िये के मुख जैसी (कोकमुखी)
नमस्ते अस्तु रणप्रिये
namas-te'stu raṇa-priye
आपको नमस्कार हो, हे रणप्रिये (युद्ध को प्रिय मानने वाली)

Origin & History

Source: Mahabharata, Bhishma Parva, Chapter 23 (Bhagavad-Gita Parva, the chapter preceding the Gita)

Author: Veda Vyasa (the hymn spoken by Arjuna at Krishna's bidding)

Period: Itihasa (Epic) period

कुरुक्षेत्र के मैदान में, जब पाण्डवों और कौरवों की विशाल सेनाएँ युद्ध के लिए सजी खड़ी थीं, भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा — 'अपने शत्रुओं के नाश हेतु देवी दुर्गा का आवाहन करो।' अर्जुन तुरन्त रथ से उतरकर, हाथ जोड़कर, देवी को उनके अनेक नामों से स्तुति करते हैं — सिद्धसेनानी, कालि, भद्रकालि, महाकालि, चण्डि, कात्यायनि, विजया, कौशिकि और महिषासुरमर्दिनी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी आकाश में उनके समक्ष प्रकट होती हैं, निश्चित विजय का वर देती हैं और अन्तर्धान हो जाती हैं। विजय का आश्वासन पाकर अर्जुन धनुष उठाते हैं — और तभी अमर भगवद्गीता का उपदेश आरम्भ होता है।

Frequently Asked Questions

अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् क्या है?
यह वह प्रार्थना है जो अर्जुन ने कुरुक्षेत्र युद्ध के आरम्भ में, भगवान् कृष्ण के निर्देश पर, देवी दुर्गा को अर्पित की। यह महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय 23) में, भगवद्गीता से ठीक पहले के भाग में अंकित है, और 'दुर्गा स्तव' के नाम से भी जानी जाती है।
कृष्ण ने युद्ध से पूर्व अर्जुन से दुर्गा की स्तुति क्यों करवाई?
जब दोनों सेनाएँ तैयार खड़ी थीं, कृष्ण ने अर्जुन से शत्रुओं पर विजय हेतु देवी दुर्गा का आवाहन करने को कहा। अर्जुन रथ से उतरकर इस स्तोत्र का पाठ करते हैं; उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी आकाश में प्रकट होकर उन्हें विजय का आश्वासन देती हैं, और तब भगवद्गीता कही जाती है।
इस स्तोत्र के पाठ का क्या फल है?
महाभारत स्वयं कहता है कि जो प्रातः उठकर देवी के इस स्तोत्र का पाठ करता है वह समस्त भय से मुक्त होकर विजय, समृद्धि और रक्षा पाता है। परम्परागत रूप से युद्ध, यात्रा, परीक्षा और किसी भी महान् कार्य से पूर्व सफलता एवं बाधाओं पर विजय हेतु इसका पाठ किया जाता है।
इस स्तोत्र में दुर्गा को कृष्ण की बहन क्यों कहा गया है?
यह स्तोत्र देवी को योगनिद्रा से एकात्म मानता है, जिन्होंने गोप नन्द के घर उस कन्या के रूप में जन्म लिया जो शिशु कृष्ण के बदले में दी गई थी। इसी कारण उन्हें कृष्ण (गोपेन्द्र) की अनुजा और 'नन्दगोप के कुल में जन्मी' (नन्दगोपकुलोद्भवा) कहकर स्तुति की जाती है।

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