अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् Meaning — Line by Line
अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम्
Every verse and every word explained in English & Hindi
Meaning — Line by Line
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namaste siddha-senāni ārye mandara-vāsini |
नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि। कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिङ्गले॥
namaste siddha-senāni ārye mandara-vāsini | kumāri kāli kāpāli kapile kṛṣṇa-piṅgale ||
Meaningहे सिद्धों की सेना की सेनापति! हे मन्दराचल पर निवास करने वाली आर्ये! आपको नमस्कार है — हे कुमारि, हे कालि, हे कापालि, हे कपिले, हे कृष्णपिङ्गले!
bhadrakāli namas-tubhyaṃ mahākāli namo'stu te |
भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोऽस्तु ते। चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिणि वरवर्णिनि॥
bhadrakāli namas-tubhyaṃ mahākāli namo'stu te | caṇḍi caṇḍe namas-tubhyaṃ tāriṇi vara-varṇini ||
Meaningहे मङ्गलमयी भद्रकालि, आपको नमस्कार; हे महाकालि, आपको नमस्कार हो; हे चण्डि, हे चण्डे, आपको नमस्कार; हे तारिणि, हे वरवर्णिनि!
kātyāyani mahā-bhāge karāli vijaye jaye |
कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये। शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते॥
kātyāyani mahā-bhāge karāli vijaye jaye | śikhi-piccha-dhvaja-dhare nānā-bharaṇa-bhūṣite ||
Meaningहे महाभाग्यशालिनी कात्यायनि, हे करालि, हे विजये, हे जये! हे मयूरपिच्छ की ध्वजा धारण करने वाली, नाना आभूषणों से विभूषित देवि!
aṭṭa-śūla-praharaṇe khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi |
अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि। गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे॥
aṭṭa-śūla-praharaṇe khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi | gopendrasyānuje jyeṣṭhe nanda-gopa-kulodbhave ||
Meaningहे विकराल शूल (त्रिशूल) धारण करने वाली, हे खड्ग और ढाल धारिणि! हे गोपेन्द्र (कृष्ण) की अनुजा, हे ज्येष्ठे, हे नन्दगोप के कुल में जन्म लेने वाली!
mahiṣāsṛk-priye nityaṃ kauśiki pīta-vāsini |
महिषासृक्प्रिये नित्यं कौशिकि पीतवासिनि। अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेऽस्तु रणप्रिये॥
mahiṣāsṛk-priye nityaṃ kauśiki pīta-vāsini | aṭṭa-hāse koka-mukhe namas-te'stu raṇa-priye ||
Meaningहे महिषासुर के रक्त से सदा प्रसन्न रहने वाली, हे पीताम्बरधारिणी कौशिकि! हे अट्टहास करने वाली, हे (विकराल) कोकमुखी! हे रणप्रिये, आपको नमस्कार हो!
Word-by-Word Breakdown
Origin & History
Source: Mahabharata, Bhishma Parva, Chapter 23 (Bhagavad-Gita Parva, the chapter preceding the Gita)
Author: Veda Vyasa (the hymn spoken by Arjuna at Krishna's bidding)
Period: Itihasa (Epic) period
कुरुक्षेत्र के मैदान में, जब पाण्डवों और कौरवों की विशाल सेनाएँ युद्ध के लिए सजी खड़ी थीं, भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा — 'अपने शत्रुओं के नाश हेतु देवी दुर्गा का आवाहन करो।' अर्जुन तुरन्त रथ से उतरकर, हाथ जोड़कर, देवी को उनके अनेक नामों से स्तुति करते हैं — सिद्धसेनानी, कालि, भद्रकालि, महाकालि, चण्डि, कात्यायनि, विजया, कौशिकि और महिषासुरमर्दिनी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी आकाश में उनके समक्ष प्रकट होती हैं, निश्चित विजय का वर देती हैं और अन्तर्धान हो जाती हैं। विजय का आश्वासन पाकर अर्जुन धनुष उठाते हैं — और तभी अमर भगवद्गीता का उपदेश आरम्भ होता है।
Frequently Asked Questions
अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् क्या है?▼
कृष्ण ने युद्ध से पूर्व अर्जुन से दुर्गा की स्तुति क्यों करवाई?▼
इस स्तोत्र के पाठ का क्या फल है?▼
इस स्तोत्र में दुर्गा को कृष्ण की बहन क्यों कहा गया है?▼
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