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अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः उषाकाल में (ब्रह्म-मुहूर्त); किसी महत्त्वपूर्ण कार्य, यात्रा या प्रतियोगिता से पूर्व; नवरात्रि में·📜 Mahabharata, Bhishma Parva, Chapter 23 (Bhagavad-Gita Parva, the chapter preceding the Gita)

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अर्थ

अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् वह स्तुति है जो अर्जुन ने कुरुक्षेत्र युद्ध के आरम्भ में श्रीकृष्ण की आज्ञा से देवी दुर्गा की वन्दना में कही — जैसा महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय 23, जो भगवद्गीता से ठीक पहले आता है) में वर्णित है। कृष्ण अर्जुन से विजय हेतु दुर्गा का आवाहन करने को कहते हैं; अर्जुन रथ से उतरकर, हाथ जोड़कर, देवी के अनेक उग्र और मङ्गलमय नामों से उनकी स्तुति करते हैं। प्रसन्न होकर देवी प्रकट होती हैं और उन्हें निश्चित विजय का वर देती हैं। यह किसी भी महान् कार्य से पूर्व विजय, साहस और रक्षा की प्रबल प्रार्थना मानी जाती है।

उत्पत्ति और कथा

Mahabharata, Bhishma Parva, Chapter 23 (Bhagavad-Gita Parva, the chapter preceding the Gita) · Veda Vyasa (the hymn spoken by Arjuna at Krishna's bidding) · Itihasa (Epic) period

कुरुक्षेत्र के मैदान में, जब पाण्डवों और कौरवों की विशाल सेनाएँ युद्ध के लिए सजी खड़ी थीं, भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा — 'अपने शत्रुओं के नाश हेतु देवी दुर्गा का आवाहन करो।' अर्जुन तुरन्त रथ से उतरकर, हाथ जोड़कर, देवी को उनके अनेक नामों से स्तुति करते हैं — सिद्धसेनानी, कालि, भद्रकालि, महाकालि, चण्डि, कात्यायनि, विजया, कौशिकि और महिषासुरमर्दिनी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी आकाश में उनके समक्ष प्रकट होती हैं, निश्चित विजय का वर देती हैं और अन्तर्धान हो जाती हैं। विजय का आश्वासन पाकर अर्जुन धनुष उठाते हैं — और तभी अमर भगवद्गीता का उपदेश आरम्भ होता है।

शास्त्रों में वर्णित

महाभारत में आता है कि देवी ने आकाश में प्रकट होकर अर्जुन से कहा — 'हे पाण्डव! थोड़े ही समय में तुम अपने शत्रुओं को जीत लोगे; स्वयं नारायण तुम्हारे सहायक हैं, और तुम देवताओं के लिए भी अजेय हो।' परम्परा मानती है कि जो भी सच्चा भक्त भोर में इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे देवी का वही आश्रय प्राप्त होता है — भय से मुक्ति और प्रत्येक धर्मकार्य में विजय।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

नमस्ते सिद्धसेनानि आर्ये मन्दरवासिनि। कुमारि कालि कापालि कपिले कृष्णपिङ्गले॥

namaste siddha-senāni ārye mandara-vāsini | kumāri kāli kāpāli kapile kṛṣṇa-piṅgale ||

अर्थ:हे सिद्धों की सेना की सेनापति! हे मन्दराचल पर निवास करने वाली आर्ये! आपको नमस्कार है — हे कुमारि, हे कालि, हे कापालि, हे कपिले, हे कृष्णपिङ्गले!

श्लोक 2

भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालि नमोऽस्तु ते। चण्डि चण्डे नमस्तुभ्यं तारिणि वरवर्णिनि॥

bhadrakāli namas-tubhyaṃ mahākāli namo'stu te | caṇḍi caṇḍe namas-tubhyaṃ tāriṇi vara-varṇini ||

अर्थ:हे मङ्गलमयी भद्रकालि, आपको नमस्कार; हे महाकालि, आपको नमस्कार हो; हे चण्डि, हे चण्डे, आपको नमस्कार; हे तारिणि, हे वरवर्णिनि!

श्लोक 3

कात्यायनि महाभागे करालि विजये जये। शिखिपिच्छध्वजधरे नानाभरणभूषिते॥

kātyāyani mahā-bhāge karāli vijaye jaye | śikhi-piccha-dhvaja-dhare nānā-bharaṇa-bhūṣite ||

अर्थ:हे महाभाग्यशालिनी कात्यायनि, हे करालि, हे विजये, हे जये! हे मयूरपिच्छ की ध्वजा धारण करने वाली, नाना आभूषणों से विभूषित देवि!

श्लोक 4

अट्टशूलप्रहरणे खड्गखेटकधारिणि। गोपेन्द्रस्यानुजे ज्येष्ठे नन्दगोपकुलोद्भवे॥

aṭṭa-śūla-praharaṇe khaḍga-kheṭaka-dhāriṇi | gopendrasyānuje jyeṣṭhe nanda-gopa-kulodbhave ||

अर्थ:हे विकराल शूल (त्रिशूल) धारण करने वाली, हे खड्ग और ढाल धारिणि! हे गोपेन्द्र (कृष्ण) की अनुजा, हे ज्येष्ठे, हे नन्दगोप के कुल में जन्म लेने वाली!

श्लोक 5

महिषासृक्प्रिये नित्यं कौशिकि पीतवासिनि। अट्टहासे कोकमुखे नमस्तेऽस्तु रणप्रिये॥

mahiṣāsṛk-priye nityaṃ kauśiki pīta-vāsini | aṭṭa-hāse koka-mukhe namas-te'stu raṇa-priye ||

अर्थ:हे महिषासुर के रक्त से सदा प्रसन्न रहने वाली, हे पीताम्बरधारिणी कौशिकि! हे अट्टहास करने वाली, हे (विकराल) कोकमुखी! हे रणप्रिये, आपको नमस्कार हो!

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

नमस्ते सिद्धसेनानि🔊namaste siddha-senāniआपको नमस्कार, सिद्धों (पूर्ण पुरुषों) की सेना की सेनापति
आर्ये मन्दरवासिनि🔊ārye mandara-vāsiniहे आर्ये, मन्दर पर्वत पर निवास करने वाली
कुमारि🔊kumāriहे चिरकुमारी (कुमारि)
कालि कापालि🔊kāli kāpāliहे कालि, हे कपाल धारण करने वाली (कापालि)
कपिले कृष्णपिङ्गले🔊kapile kṛṣṇa-piṅgaleहे कपिलवर्णा, हे कृष्ण एवं पिङ्गल (श्याम-रक्तवर्ण) रूपा
भद्रकालि नमस्तुभ्यं🔊bhadrakāli namas-tubhyaṃहे मङ्गलमयी भद्रकालि, आपको नमस्कार
महाकालि नमोऽस्तु ते🔊mahākāli namo'stu teहे महाकालि, आपको मेरा नमस्कार हो
चण्डि चण्डे🔊caṇḍi caṇḍeहे उग्र चण्डि, हे क्रोधमयी (चण्डे)
तारिणि वरवर्णिनि🔊tāriṇi vara-varṇiniहे तारिणी (प्राणियों को पार उतारने वाली), हे परम वर्ण (सुन्दर वर्ण) वाली
कात्यायनि महाभागे🔊kātyāyani mahā-bhāgeहे कात्यायनि, हे महाभाग्यशालिनी एवं तेजस्विनी
करालि विजये जये🔊karāli vijaye jayeहे करालि (विकराल), हे विजये, हे जये (जय-स्वरूपा)
शिखिपिच्छध्वजधरे🔊śikhi-piccha-dhvaja-dhareहे मयूरपिच्छ से अलंकृत ध्वजा धारण करने वाली
नानाभरणभूषिते🔊nānā-bharaṇa-bhūṣiteहे नाना आभूषणों से विभूषित
अट्टशूलप्रहरणे🔊aṭṭa-śūla-praharaṇeहे महान् एवं विकराल शूल (त्रिशूल) धारण करने वाली
खड्गखेटकधारिणि🔊khaḍga-kheṭaka-dhāriṇiहे खड्ग और ढाल धारण करने वाली
गोपेन्द्रस्य अनुजे ज्येष्ठे🔊gopendrasyānuje jyeṣṭheहे गोपेन्द्र (कृष्ण) की अनुजा, हे ज्येष्ठे
नन्दगोपकुलोद्भवे🔊nanda-gopa-kulodbhaveहे नन्दगोप के कुल में जन्म लेने वाली
महिषासृक्प्रिये नित्यं🔊mahiṣāsṛk-priye nityaṃहे महिषासुर के रक्त से सदा प्रसन्न रहने वाली
कौशिकि पीतवासिनि🔊kauśiki pīta-vāsiniहे कौशिकि, हे पीताम्बर धारण करने वाली
अट्टहासे कोकमुखे🔊aṭṭa-hāse koka-mukheहे अट्टहास करने वाली, हे (विकराल) भेड़िये के मुख जैसी (कोकमुखी)
नमस्ते अस्तु रणप्रिये🔊namas-te'stu raṇa-priyeआपको नमस्कार हो, हे रणप्रिये (युद्ध को प्रिय मानने वाली)

अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् पाठ के लाभ

युद्धों और महान् कार्यों से पूर्व निश्चित विजय हेतु पढ़ा जाता है, जैसा अर्जुन को मिली

देवी दुर्गा के उग्र, दैत्यनाशक रूपों की रक्षा का आवाहन करता है

साहस, निर्भयता और हर कठिनाई का सामना करने का बल देता है

कहा जाता है कि जो भोर में उठकर इसका पाठ करता है वह समस्त भय और संकट से मुक्त हो जाता है

बाधाओं तथा शत्रुओं और विरोधी शक्तियों के प्रभाव को दूर करता है

महाभारत की प्रत्यक्ष प्रार्थना, जो पाण्डवों की विजय से ही पावन है

अर्जुनकृत दुर्गा स्तोत्रम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः उषाकाल में (ब्रह्म-मुहूर्त); किसी महत्त्वपूर्ण कार्य, यात्रा या प्रतियोगिता से पूर्व; नवरात्रि में

जैसा अर्जुन ने किया, उगते सूर्य की ओर मुख कर खड़े होकर अथवा बैठकर, हाथ जोड़कर, पूर्ण श्रद्धा और वीर के संकल्प के साथ इन श्लोकों का पाठ करें। महाभारत के अनुसार, जो भोर में उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है वह सर्वदा भय से मुक्त रहता है और विजय पाता है। किसी कठिन कार्य, परीक्षा, यात्रा अथवा किसी प्रतियोगिता से पूर्व, मन को देवी — विजय की दात्री — के प्रति समर्पित कर इसका पाठ विशेष फलदायी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह वह प्रार्थना है जो अर्जुन ने कुरुक्षेत्र युद्ध के आरम्भ में, भगवान् कृष्ण के निर्देश पर, देवी दुर्गा को अर्पित की। यह महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय 23) में, भगवद्गीता से ठीक पहले के भाग में अंकित है, और 'दुर्गा स्तव' के नाम से भी जानी जाती है।
जब दोनों सेनाएँ तैयार खड़ी थीं, कृष्ण ने अर्जुन से शत्रुओं पर विजय हेतु देवी दुर्गा का आवाहन करने को कहा। अर्जुन रथ से उतरकर इस स्तोत्र का पाठ करते हैं; उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी आकाश में प्रकट होकर उन्हें विजय का आश्वासन देती हैं, और तब भगवद्गीता कही जाती है।
महाभारत स्वयं कहता है कि जो प्रातः उठकर देवी के इस स्तोत्र का पाठ करता है वह समस्त भय से मुक्त होकर विजय, समृद्धि और रक्षा पाता है। परम्परागत रूप से युद्ध, यात्रा, परीक्षा और किसी भी महान् कार्य से पूर्व सफलता एवं बाधाओं पर विजय हेतु इसका पाठ किया जाता है।
यह स्तोत्र देवी को योगनिद्रा से एकात्म मानता है, जिन्होंने गोप नन्द के घर उस कन्या के रूप में जन्म लिया जो शिशु कृष्ण के बदले में दी गई थी। इसी कारण उन्हें कृष्ण (गोपेन्द्र) की अनुजा और 'नन्दगोप के कुल में जन्मी' (नन्दगोपकुलोद्भवा) कहकर स्तुति की जाती है।

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