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असङ्गोऽहम् असङ्गोऽहम् (सच्चिदानन्दरूपोऽहम्) — Word-by-Word Meaning

असङ्गोऽहम् असङ्गोऽहम् (सच्चिदानन्दरूपोऽहम्)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

असङ्गः
asaṅgaḥ
असंग, अनासक्त, सभी संग/संपर्क से मुक्त
अहम्
aham
मैं हूँ, मैं
पुनः पुनः
punaḥ punaḥ
बार-बार, पुनः-पुनः, बारम्बार
सत्
sat
सत्, शुद्ध अस्तित्व, सदा विद्यमान
चित्
cit
चित्, शुद्ध चेतना, विशुद्ध बोध
आनन्द
ānanda
आनन्द, निरुपाधिक सुख
रूपः
rūpaḥ
के स्वरूप/रूप वाला
सच्चिदानन्द-रूपः अहम्
sac-cid-ānanda-rūpaḥ aham
मैं साक्षात् सच्चिदानन्द-स्वरूप हूँ
अहम् एव अहम्
aham eva aham
मैं ही 'मैं' हूँ (एकमात्र सच्चा 'मैं'), मैं वस्तुतः स्वयं हूँ
अव्ययः
avyayaḥ
अविनाशी, अपरिवर्तनीय, अक्षय

Complete Translation

मैं असंग (अनासक्त) हूँ, मैं असंग हूँ, मैं असंग हूँ — बार-बार। मैं सच्चिदानन्द-स्वरूप हूँ; मैं ही एकमात्र अविनाशी आत्मा हूँ।

Origin & History

Source: Advaita Vedanta tradition (a classic self-affirmation / nididhyasana verse)

Author: Traditional (Advaita Vedanta)

Period: Ancient / classical

यह श्लोक अद्वैतिक आत्म-घोषणाओं की उस प्रिय परम्परा का अंग है जो निदिध्यासन — अपने वास्तविक स्वरूप पर गहन, बारम्बार ध्यान — के लिए है। अपने को 'असंग' और फिर 'सत्-चित्-आनन्द स्वरूप' घोषित कर साधक आत्मा को देह-मन समझने की आजीवन आदत का प्रतिकार करता है, और इसके स्थान पर सदा-मुक्त, अविनाशी तत्त्व में स्थित होता है। ऐसी घोषणाएँ वेदान्तिक आचार्यों द्वारा आत्म-ज्ञान को परिपक्व करने के दैनिक साधन के रूप में व्यापक रूप से सिखाई जाती हैं।

Frequently Asked Questions

'असङ्गोऽहम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'मैं असंग हूँ' अथवा 'मैं सभी संग से मुक्त हूँ।' अद्वैत वेदान्त में वास्तविक आत्मा साक्षी चेतना है, जो देह, मन, कर्म और संसार से सदा अस्पृष्ट रहती है — आकाश के समान, जो सबमें व्याप्त है फिर भी किसी से लिप्त नहीं होता।
'असङ्गोऽहम्' को तीन बार क्यों दोहराया जाता है?
तीन बार की पुनरावृत्ति बल देने और दृढ़ निश्चय को गहरा करने के लिए है, जो देह और मन से तादात्म्य की गहरी जड़ जमी आदत को धीरे-धीरे विलीन करती है। इसे 'बार-बार' (पुनः पुनः) दोहराना मन को सहज ही अपने असंग स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास कराता है।
सत्-चित्-आनन्द क्या है?
सत्-चित्-आनन्द (अस्तित्व-चेतना-आनन्द) परम तत्त्व तथा अपने वास्तविक आत्मा का शास्त्रीय वेदान्तिक वर्णन है: सत् (शुद्ध सत्ता जो कभी नहीं मिटती), चित् (शुद्ध बोध), और आनन्द (निरुपाधिक आनन्द)। श्लोक घोषणा करता है 'मैं उसी स्वरूप वाला हूँ।'
यह आत्म-घोषणा व्यवहार में कैसे प्रयुक्त होती है?
इसका प्रयोग आत्म-विचार और ध्यान में चिन्तनात्मक घोषणा के रूप में होता है। साधक इसे दोहराकर मिथ्या तादात्म्यों से हटता है और आत्मा को असंग, अविनाशी सत्-चित्-आनन्द के रूप में पहचान कर उसमें स्थित होता है।

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