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अष्टभुजाष्टकम् Meaning — Line by Line

अष्टभुजाष्टकम्

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of अष्टभुजाष्टकम् with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. gajendrarakṣātvaritaṃ bhavantaṃ grāhairivāhaṃ viṣayairvikṛṣṭaḥ |
  2. Verse 2. tvadekaśeṣo'hamanātmatantrastvatpādalipsāṃ diśatā tvayaiva |
  3. Verse 3. svarūparūpāstravibhūṣaṇādyaiḥ paratvacintāṃ tvayi durnivārām |
  4. Verse 4. śaktiṃ śaraṇyāntaraśabdabhājāṃ sāraṃ ca santolya phalāntarāṇām |
  5. Verse 5. abhītihetoranuvartanīyaṃ nātha tvadanyaṃ na vibhāvayāmi |
  6. Verse 6. tvadekatantraṃ kamalāsahāya svenaiva māṃ rakṣitum arhasi tvam |
  7. Verse 7. samādhibhaṅgeṣvapi sampatatsu śaraṇyabhūte tvayi baddhakakṣye |
  8. Verse 8. prāptābhilāṣaṃ tvadanugrahānmām padmāniṣevye tava pādapadme |
Verse 1#

gajendrarakṣātvaritaṃ bhavantaṃ grāhairivāhaṃ viṣayairvikṛṣṭaḥ |

गजेन्द्ररक्षात्वरितं भवन्तं ग्राहैरिवाहं विषयैर्विकृष्टः अपारविज्ञानदयानुभावम् आप्तं सतामष्टभुजं प्रपद्ये

gajendrarakṣātvaritaṃ bhavantaṃ grāhairivāhaṃ viṣayairvikṛṣṭaḥ | apāravijñānadayānubhāvam āptaṃ satāmaṣṭabhujaṃ prapadye || 1 ||

Meaningजैसे गजेन्द्र को ग्राह (मगर) ने खींचा था, वैसे ही मैं विषयों द्वारा खींचा जा रहा हूँ; गजेन्द्र की रक्षा हेतु शीघ्र दौड़ने वाले, सत्पुरुषों के आश्रय, अपार ज्ञान-दया-प्रभाव वाले उन अष्टभुज भगवान् की मैं शरण लेता हूँ।

Verse 2#

tvadekaśeṣo'hamanātmatantrastvatpādalipsāṃ diśatā tvayaiva |

त्वदेकशेषोऽहमनात्मतन्त्रस्त्वत्पादलिप्सां दिशता त्वयैव असत्समोऽप्यष्टभुजास्पदेश सत्ताम् इदानीम् उपलम्भितोऽस्मि

tvadekaśeṣo'hamanātmatantrastvatpādalipsāṃ diśatā tvayaiva | asatsamo'pyaṣṭabhujāspadeśa sattām idānīm upalambhito'smi || 2 ||

Meaningमैं केवल आपका शेष (अधीन) हूँ, स्वतन्त्र नहीं। जिन्होंने मुझे आपके चरणों की चाह दी, उन आपसे ही, असत् के समान होते हुए भी, अब मैं सत्ता (वास्तविक अस्तित्व) को प्राप्त हुआ हूँ — हे अष्टभुज-स्थान के स्वामी!

Verse 3#

svarūparūpāstravibhūṣaṇādyaiḥ paratvacintāṃ tvayi durnivārām |

स्वरूपरूपास्त्रविभूषणाद्यैः परत्वचिन्तां त्वयि दुर्निवाराम् भोगे मृदूपक्रमताम् अभीप्सन् शीलादिभिर्वारयसीव पुंसाम्

svarūparūpāstravibhūṣaṇādyaiḥ paratvacintāṃ tvayi durnivārām | bhoge mṛdūpakramatām abhīpsan śīlādibhirvārayasīva puṃsām || 3 ||

Meaningआपके स्वरूप, रूप, अस्त्र, आभूषण आदि से मुझमें उत्पन्न आपके परत्व (श्रेष्ठता) का दुर्निवार भाव — उसे, भोग में सुलभता चाहते हुए, आप अपने शील आदि गुणों से मानो दूर कर देते हैं।

Verse 4#

śaktiṃ śaraṇyāntaraśabdabhājāṃ sāraṃ ca santolya phalāntarāṇām |

शक्तिं शरण्यान्तरशब्दभाजां सारं सन्तोल्य फलान्तराणाम् त्वद्दास्यहेतोस्त्वयि निर्विशङ्कं न्यस्तात्मनां नाथ बिभर्षि भारम्

śaktiṃ śaraṇyāntaraśabdabhājāṃ sāraṃ ca santolya phalāntarāṇām | tvaddāsyahetostvayi nirviśaṅkaṃ nyastātmanāṃ nātha bibharṣi bhāram || 4 ||

Meaningहे नाथ! अन्य 'शरण' कहलाने वालों की शक्ति तथा अन्य फलों के सार को तौलकर, आपके दास्य के लिए जिन्होंने निःशंक होकर अपने को आप पर न्यस्त कर दिया है, उनका भार आप वहन करते हैं।

Verse 5#

abhītihetoranuvartanīyaṃ nātha tvadanyaṃ na vibhāvayāmi |

अभीतिहेतोरनुवर्तनीयं नाथ त्वदन्यं विभावयामि भयं कुतः स्यात् त्वयि सानुकम्पे रक्षा कुतः स्यात् त्वयि जातरोषे

abhītihetoranuvartanīyaṃ nātha tvadanyaṃ na vibhāvayāmi | bhayaṃ kutaḥ syāt tvayi sānukampe rakṣā kutaḥ syāt tvayi jātaroṣe || 5 ||

Meaningहे नाथ! अभय के लिए अनुसरणीय आपके अतिरिक्त किसी अन्य की मैं कल्पना भी नहीं करता। आप सानुकम्प हों तो भय कहाँ? और (कदाचित्) आप ही रुष्ट हों तो रक्षा कहाँ से हो?

Verse 6#

tvadekatantraṃ kamalāsahāya svenaiva māṃ rakṣitum arhasi tvam |

त्वदेकतन्त्रं कमलासहाय स्वेनैव मां रक्षितुम् अर्हसि त्वम् त्वयि प्रवृत्ते मम किं प्रयासैस्त्वय्यप्रवृत्ते मम किं प्रयासैः

tvadekatantraṃ kamalāsahāya svenaiva māṃ rakṣitum arhasi tvam | tvayi pravṛtte mama kiṃ prayāsaistvayyapravṛtte mama kiṃ prayāsaiḥ || 6 ||

Meaningहे कमलासहाय (लक्ष्मीपति)! मैं केवल आप पर निर्भर हूँ, अतः आप स्वयं ही मेरी रक्षा कीजिए। आपके प्रवृत्त होने पर मेरे प्रयास से क्या प्रयोजन? और आपके न प्रवृत्त होने पर भी मेरे प्रयास से क्या?

Verse 7#

samādhibhaṅgeṣvapi sampatatsu śaraṇyabhūte tvayi baddhakakṣye |

समाधिभङ्गेष्वपि सम्पतत्सु शरण्यभूते त्वयि बद्धकक्ष्ये अपत्रपे सोढुम् अकिञ्चनोऽहं दूराधिरोहं पतनं नाथ

samādhibhaṅgeṣvapi sampatatsu śaraṇyabhūte tvayi baddhakakṣye | apatrape soḍhum akiñcano'haṃ dūrādhirohaṃ patanaṃ ca nātha || 7 ||

Meaningसमाधि भंग होने पर और विघ्नों के आ पड़ने पर भी, शरण्यभूत आप जब कमर कसे (रक्षा को तत्पर) हैं, तब मैं अकिञ्चन एवं निर्लज्ज, हे नाथ, कठिन आरोहण तथा पतन — दोनों को सहन कर सकता हूँ।

Verse 8#

prāptābhilāṣaṃ tvadanugrahānmām padmāniṣevye tava pādapadme |

प्राप्ताभिलाषं त्वदनुग्रहान्माम् पद्मानिषेव्ये तव पादपद्मे आदेहपातादपराधदूरम् आत्मान्तकैङ्कर्यरसं विधेयाः

prāptābhilāṣaṃ tvadanugrahānmām padmāniṣevye tava pādapadme | ādehapātādaparādhadūram ātmāntakaiṅkaryarasaṃ vidheyāḥ || 8 ||

Meaningआपकी कृपा से अभीष्ट प्राप्त कर, हे लक्ष्मीसेव्य चरणकमल वाले! इस देह के पतन तक मुझे अपराध से दूर रखते हुए, अपने चरणकमलों में अन्तरंग कैंकर्य के रस से युक्त बनाइए।

Word-by-Word Breakdown

गजेन्द्ररक्षात्वरितम्
gajendrarakṣātvaritam
(जिन्होंने) गजराज गजेन्द्र की रक्षा हेतु शीघ्रता की
भवन्तम्
bhavantam
आप (भगवान्)
ग्राहैः इव अहम् विषयैः विकृष्टः
grāhaiḥ iva aham viṣayaiḥ vikṛṣṭaḥ
मैं, मगर द्वारा (खींचे गए गजेन्द्र) के समान विषयों द्वारा खींचा गया
अपारविज्ञानदयानुभावम्
apāravijñānadayānubhāvam
अपार ज्ञान, दया और प्रभाव वाले
आप्तम् सताम्
āptam satām
सत्पुरुषों के विश्वस्त आश्रय
अष्टभुजम् प्रपद्ये
aṣṭabhujam prapadye
अष्टभुज (आठ भुजाओं वाले) भगवान् की मैं शरण लेता हूँ
त्वदेकशेषः अहम्
tvadekaśeṣaḥ aham
मैं, जो केवल आपका हूँ (आपका एकमात्र अधीन/शेष)
अनात्मतन्त्रः
anātmatantraḥ
स्वतन्त्र नहीं, अपना स्वामी नहीं
त्वत्पादलिप्साम् दिशता त्वया एव
tvatpādalipsām diśatā tvayā eva
आपके द्वारा ही, जिन्होंने आपके चरणों की चाह प्रदान की
असत्समः अपि
asatsamaḥ api
असत् के समान होते हुए भी
सत्ताम् इदानीम् उपलम्भितः अस्मि
sattām idānīm upalambhitaḥ asmi
अब मुझे (सच्ची) सत्ता प्राप्त हुई है
परत्वचिन्ताम् त्वयि दुर्निवाराम्
paratvacintāṃ tvayi durnivārām
आपके परत्व (श्रेष्ठता) का दुर्निवार भाव जो आप में (देखकर उत्पन्न होता है)
शीलादिभिः वारयसि इव
śīlādibhiḥ vārayasi iva
अपने शील आदि गुणों से आप मानो दूर कर देते हैं
त्वद्दास्यहेतोः
tvaddāsyahetoḥ
आपके (प्रेमपूर्ण) दास्य के लिए
न्यस्तात्मनाम् नाथ बिभर्षि भारम्
nyastātmanāṃ nātha bibharṣi bhāram
हे नाथ, जिन्होंने स्वयं को (आप पर) न्यस्त किया, उनका भार आप वहन करते हैं
अभीतिहेतोः अनुवर्तनीयम्
abhītihetoḥ anuvartanīyam
अभय के लिए अनुसरणीय आश्रय रूप में
त्वदन्यम् न विभावयामि
tvadanyaṃ na vibhāvayāmi
आपके अतिरिक्त किसी अन्य की मैं कल्पना नहीं करता
भयम् कुतः स्यात् त्वयि सानुकम्पे
bhayaṃ kutaḥ syāt tvayi sānukampe
आप सानुकम्प हों तो भय कहाँ से हो?
त्वदेकतन्त्रम् कमलासहाय
tvadekatantraṃ kamalāsahāya
हे कमला (लक्ष्मी) के सहाय, केवल आप पर निर्भर
स्वेन एव माम् रक्षितुम् अर्हसि
svena eva māṃ rakṣitum arhasi
आप स्वयं ही मेरी रक्षा करने के योग्य हैं
शरण्यभूते त्वयि बद्धकक्ष्ये
śaraṇyabhūte tvayi baddhakakṣye
शरण्यभूत आप जब कमर कसे (रक्षा को तत्पर) हैं
अकिञ्चनः अहम्
akiñcanaḥ aham
मैं, (अन्य किसी) साधन से रहित अकिञ्चन
प्राप्ताभिलाषम् त्वदनुग्रहात्
prāptābhilāṣaṃ tvadanugrahāt
आपकी कृपा से अभीष्ट प्राप्त कर
तव पादपद्मे आत्मान्तकैङ्कर्यरसम् विधेयाः
tava pādapadme ātmāntakaiṅkaryarasaṃ vidheyāḥ
अपने चरणकमलों में अन्तरंग कैंकर्य के रस से युक्त बनाइए (देह-पतन तक)

Origin & History

Source: Ashtabhuja Ashtakam (eight verses on the Ashtabhuja Perumal of Kanchipuram)

Author: Vedanta Desika (Venkatanatha)

Period: 13th-14th century CE

स्वामी वेदान्त देशिक, जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय काञ्चीपुरम् में बिताया, ने यह अष्टकम् अष्टभुज पेरुमाल् — अष्टभुजाकरम् दिव्यदेश में विष्णु के अष्टभुज रूप — को प्रपत्ति के रूप में रचा। भगवान् के सौन्दर्य और कृपा से अभिभूत होकर, और स्वयं को विषयों रूपी मगर द्वारा खींचे गए असहाय गजेन्द्र के समान मानकर, उन्होंने आठ श्लोकों में अपने को पूर्णतः भगवान् की रक्षा में समर्पित किया, मोक्ष को स्वयं में साध्य न मानकर भगवान् के चरणों में नित्य सेवा के आनन्द की प्रार्थना की।

Frequently Asked Questions

अष्टभुज पेरुमाल् कौन हैं?
अष्टभुज ('आठ भुजाओं वाले') पेरुमाल् भगवान् विष्णु का एक अनूठा रूप हैं, जो काञ्चीपुरम् के अष्टभुजाकरम् (आदिकेशव पेरुमाल्) मन्दिर में, 108 दिव्यदेशों में से एक, विराजमान हैं। उनकी आठ भुजाओं में विभिन्न अस्त्र एवं चिह्न हैं। परम्परा कहती है कि भगवान् ने एक यज्ञ की रक्षा हेतु तथा अपने भक्तों पर कृपा करने हेतु यह अष्टभुज रूप धारण किया।
अष्टभुजाष्टकम् की रचना किसने की?
इसकी रचना महान् श्रीवैष्णव आचार्य स्वामी वेदान्त देशिक (1268-1369 ई.) ने काञ्चीपुरम् के अष्टभुज पेरुमाल् के चरणों में प्रपत्ति (शरणागति) के रूप में की।
प्रथम श्लोक में गजेन्द्र के सन्दर्भ का क्या महत्त्व है?
देशिक स्वयं की तुलना गजेन्द्र से करते हैं — वह गजराज जिसे मगर ने पकड़ लिया था और जो भगवान् को पुकारने पर बचाया गया। जैसे भगवान् गजेन्द्र की रक्षा हेतु दौड़े, वैसे ही देशिक, स्वयं को विषयों से खिंचा अनुभव करते हुए, उन्हीं करुणामय अष्टभुज भगवान् की शरण लेते हैं।
इस स्तोत्र में भक्त अन्ततः क्या माँगता है?
सांसारिक लाभ नहीं, अपितु इस जीवन के अन्त तक, समस्त अपराध से मुक्त, भगवान् के चरणकमलों में नित्य अन्तरंग कैंकर्य (सेवा) का आनन्द (आठवाँ श्लोक)। यह सेवा को परम लक्ष्य मानने के श्रीवैष्णव आदर्श को प्रतिबिम्बित करता है।

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