असितगिरिसमं स्यात् — Word-by-Word Meaning
असितगिरिसमं स्यात्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
असितगिरिसमं
asita-giri-samaṃ
काले पर्वत के समान (मेरु के काले शिखर अथवा काजल के पर्वत के तुल्य)
स्यात्
syāt
हो; यदि हो जाए
कज्जलं
kajjalaṃ
स्याही, काजल, अंजन
सिन्धुपात्रे
sindhu-pātre
समुद्र को दवात (पात्र) बनाकर
सुरतरुवरशाखा
sura-taru-vara-śākhā
कल्पवृक्ष (देवताओं के मनोरथपूरक वृक्ष) की शाखा लेखनी रूप में
लेखनी
lekhanī
लेखनी, लिखने का साधन
पत्रम् उर्वी
patram urvī
पृथ्वी ही कागज़ (लिखने का पत्र) रूप में
लिखति यदि
likhati yadi
यदि (वह) लिखे
गृहीत्वा
gṛhītvā
इन्हें लेकर, ग्रहण करके
शारदा
śāradā
शारदा — विद्या एवं वाणी की देवी सरस्वती
सर्वकालं
sarvakālaṃ
सदा-सर्वदा, अनन्त काल तक, हमेशा
तदपि
tadapi
तो भी, फिर भी
तव गुणानाम्
tava guṇānām
आपके गुणों / महिमाओं का
ईश
īśa
हे ईश (ईश्वर, शिव)
पारं न याति
pāraṃ na yāti
पार को प्राप्त नहीं होगी / कभी समाप्त नहीं होगी
Complete Translation
यदि स्याही पर्वत के समान (काले गिरि-तुल्य) हो, समुद्र उसका पात्र हो, कल्पवृक्ष की श्रेष्ठ शाखा लेखनी हो और समस्त पृथ्वी कागज़ हो — और यदि स्वयं शारदा (सरस्वती) इन्हें लेकर सदा-सर्वदा लिखती रहें — तो भी, हे ईश! आपके गुणों का पार नहीं पाया जा सकता।
Origin & History
Source: Shiva Mahimna Stotra, verse 32
Author: Pushpadanta (king of the Gandharvas)
Period: Ancient / classical (a widely recited Shaiva hymn)
शिवमहिम्न स्तोत्र के अन्त के निकट, गन्धर्व कवि पुष्पदन्त — अनेक श्लोकों में शिव की स्तुति करने के पश्चात् — यह स्वीकार करते हैं कि उनकी स्तुति को पूर्ण कर पाना असम्भव है। इस प्रसिद्ध श्लोक में वे अपनी कल्पना के सबसे भव्य चित्र प्रस्तुत करते हैं — समुद्र को दवात, स्याही का पर्वत, कल्पवृक्ष को लेखनी, पृथ्वी को कागज़ और सरस्वती को लेखक — केवल यह घोषित करने के लिए कि ये सब भी प्रभु की महिमा के पार तक कभी नहीं पहुँच सकते।
Frequently Asked Questions
'असितगिरिसमं स्यात्' इतना प्रसिद्ध क्यों है?▼
यह शिवमहिम्न स्तोत्र का ३२वाँ श्लोक है और अपनी अद्भुत कल्पना के कारण संस्कृत साहित्य के सर्वाधिक उद्धृत श्लोकों में से एक है — यदि समुद्र दवात हो, पर्वत स्याही हो, दिव्य वृक्ष लेखनी हो और पृथ्वी कागज़ हो, तथा सरस्वती अनन्त काल तक लिखें, तब भी शिव की महिमा पूर्ण रूप से नहीं लिखी जा सकती। यह ईश्वर की अनन्तता को सुन्दर ढंग से व्यक्त करता है।
इस श्लोक में 'शारदा' कौन हैं?▼
शारदा देवी सरस्वती का एक नाम है, जो वाणी, विद्या एवं कलाओं की देवी हैं। यह श्लोक कल्पना करता है कि वे — अभिव्यक्ति की परम शक्ति — भी, चाहे कितनी ही देर लिखें, शिव की स्तुति को पूर्ण नहीं कर सकतीं।
'स्याही के काले पर्वत' का क्या अर्थ है?▼
'असित-गिरि' (काला पर्वत) स्याही की अपरिमित विशाल मात्रा को व्यक्त करता है। समुद्र को दवात और पृथ्वी को कागज़ बनाकर यह श्लोक ब्रह्माण्डीय स्तर की कल्पनाओं को एक साथ रखकर दिखाता है कि कोई भी प्रयास प्रभु की अनन्त महिमा को नहीं समेट सकता।
क्या इस श्लोक का पृथक् रूप से पाठ किया जा सकता है?▼
हाँ। अपनी आत्मनिर्भर सुन्दरता और अर्थ के कारण इसका प्रायः स्वतन्त्र रूप से पाठ एवं उद्धरण किया जाता है। पूजा में इसे सम्पूर्ण शिवमहिम्न स्तोत्र के अन्त के निकट गाया जाता है।
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