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असितगिरिसमं स्यात्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रदोष काल, सोमवार, महाशिवरात्रि तथा शिव-पूजा या स्वाध्याय के समय·📜 Shiva Mahimna Stotra, verse 32

अन्य नाम / खोज: asita giri samam syat · asitagirisamam syat kajjalam sindhupatre · shiva mahimna ocean of ink verse · likhati yadi grihitva sharada

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अर्थ

यह शिवमहिम्न स्तोत्र का बत्तीसवाँ श्लोक है और समस्त संस्कृत भक्ति-काव्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं प्रिय श्लोकों में से एक है। यह एक अविस्मरणीय चित्र खींचता है — यदि समुद्र दवात हो, पर्वत-तुल्य स्याही हो, कल्पवृक्ष लेखनी हो और पृथ्वी कागज़ हो, तथा स्वयं सरस्वती अनन्त काल तक लिखें — तब भी शिव की महिमा का वर्णन पूर्ण नहीं हो सकता। यह दिव्यता की अनन्तता की उदात्त घोषणा है।

उत्पत्ति और कथा

Shiva Mahimna Stotra, verse 32 · Pushpadanta (king of the Gandharvas) · Ancient / classical (a widely recited Shaiva hymn)

शिवमहिम्न स्तोत्र के अन्त के निकट, गन्धर्व कवि पुष्पदन्त — अनेक श्लोकों में शिव की स्तुति करने के पश्चात् — यह स्वीकार करते हैं कि उनकी स्तुति को पूर्ण कर पाना असम्भव है। इस प्रसिद्ध श्लोक में वे अपनी कल्पना के सबसे भव्य चित्र प्रस्तुत करते हैं — समुद्र को दवात, स्याही का पर्वत, कल्पवृक्ष को लेखनी, पृथ्वी को कागज़ और सरस्वती को लेखक — केवल यह घोषित करने के लिए कि ये सब भी प्रभु की महिमा के पार तक कभी नहीं पहुँच सकते।

शास्त्रों में वर्णित

इस श्लोक को भक्त शिव की अनन्तता की परम अभिव्यक्ति के रूप में अमूल्य मानते हैं; परम्परा कहती है कि इसका चिन्तन बौद्धिक अहंकार को विलीन करता है और विनम्र भक्ति को जगाता है — वही भाव जिसने इस स्तोत्र के द्वारा पुष्पदन्त को उनके शाप से मुक्ति दिलाई।

मंत्र

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असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं याति

asitagirisamaṃ syāt kajjalaṃ sindhupātre surataruvaraśākhā lekhanī patramurvī | likhati yadi gṛhītvā śāradā sarvakālaṃ tadapi tava guṇānāmīśa pāraṃ na yāti ||

अर्थ:यदि स्याही पर्वत के समान (काले गिरि-तुल्य) हो, समुद्र उसका पात्र हो, कल्पवृक्ष की श्रेष्ठ शाखा लेखनी हो और समस्त पृथ्वी कागज़ हो — और यदि स्वयं शारदा (सरस्वती) इन्हें लेकर सदा-सर्वदा लिखती रहें — तो भी, हे ईश! आपके गुणों का पार नहीं पाया जा सकता।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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असितगिरिसमं🔊asita-giri-samaṃकाले पर्वत के समान (मेरु के काले शिखर अथवा काजल के पर्वत के तुल्य)
स्यात्🔊syātहो; यदि हो जाए
कज्जलं🔊kajjalaṃस्याही, काजल, अंजन
सिन्धुपात्रे🔊sindhu-pātreसमुद्र को दवात (पात्र) बनाकर
सुरतरुवरशाखा🔊sura-taru-vara-śākhāकल्पवृक्ष (देवताओं के मनोरथपूरक वृक्ष) की शाखा लेखनी रूप में
लेखनी🔊lekhanīलेखनी, लिखने का साधन
पत्रम् उर्वी🔊patram urvīपृथ्वी ही कागज़ (लिखने का पत्र) रूप में
लिखति यदि🔊likhati yadiयदि (वह) लिखे
गृहीत्वा🔊gṛhītvāइन्हें लेकर, ग्रहण करके
शारदा🔊śāradāशारदा — विद्या एवं वाणी की देवी सरस्वती
सर्वकालं🔊sarvakālaṃसदा-सर्वदा, अनन्त काल तक, हमेशा
तदपि🔊tadapiतो भी, फिर भी
तव गुणानाम्🔊tava guṇānāmआपके गुणों / महिमाओं का
ईश🔊īśaहे ईश (ईश्वर, शिव)
पारं न याति🔊pāraṃ na yātiपार को प्राप्त नहीं होगी / कभी समाप्त नहीं होगी

असितगिरिसमं स्यात् पाठ के लाभ

शिव की अनन्त महिमा के उदात्त चित्र द्वारा विस्मय एवं भक्ति जगाता है

एक प्रिय स्वतन्त्र श्लोक, जो दिव्यता की असीमता को व्यक्त करने हेतु प्रायः उद्धृत होता है

इसके पाठ से भक्ति गहरी होती है और ज्ञान का अहंकार विलीन होता है, ऐसी मान्यता है

शिव और देवी शारदा (सरस्वती) दोनों का आवाहन कर भक्ति एवं विद्या को जोड़ता है

असीम के चिन्तन से मन में शान्ति और विशालता लाता है

शिव के सर्वोत्तम स्तोत्र शिवमहिम्न स्तोत्र की चरम स्तुति का रूप है

असितगिरिसमं स्यात् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रदोष काल, सोमवार, महाशिवरात्रि तथा शिव-पूजा या स्वाध्याय के समय

इस श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें, इसकी भव्य कल्पना को मन में शिव की असीमता के ध्यान रूप में उद्घाटित होने दें। इसे प्रायः शिवमहिम्न स्तोत्र के समापन के निकट गाया जाता है; इसे शिवलिंग के समक्ष अकेले भी पढ़ा जा सकता है, अथवा विद्यार्थी एवं ज्ञान के साधक इसका आवाहन कर सकते हैं (क्योंकि यह देवी शारदा की स्तुति करता है)। पूर्ण आशीर्वाद हेतु इसे सम्पूर्ण स्तोत्र के साथ जोड़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह शिवमहिम्न स्तोत्र का ३२वाँ श्लोक है और अपनी अद्भुत कल्पना के कारण संस्कृत साहित्य के सर्वाधिक उद्धृत श्लोकों में से एक है — यदि समुद्र दवात हो, पर्वत स्याही हो, दिव्य वृक्ष लेखनी हो और पृथ्वी कागज़ हो, तथा सरस्वती अनन्त काल तक लिखें, तब भी शिव की महिमा पूर्ण रूप से नहीं लिखी जा सकती। यह ईश्वर की अनन्तता को सुन्दर ढंग से व्यक्त करता है।
शारदा देवी सरस्वती का एक नाम है, जो वाणी, विद्या एवं कलाओं की देवी हैं। यह श्लोक कल्पना करता है कि वे — अभिव्यक्ति की परम शक्ति — भी, चाहे कितनी ही देर लिखें, शिव की स्तुति को पूर्ण नहीं कर सकतीं।
'असित-गिरि' (काला पर्वत) स्याही की अपरिमित विशाल मात्रा को व्यक्त करता है। समुद्र को दवात और पृथ्वी को कागज़ बनाकर यह श्लोक ब्रह्माण्डीय स्तर की कल्पनाओं को एक साथ रखकर दिखाता है कि कोई भी प्रयास प्रभु की अनन्त महिमा को नहीं समेट सकता।
हाँ। अपनी आत्मनिर्भर सुन्दरता और अर्थ के कारण इसका प्रायः स्वतन्त्र रूप से पाठ एवं उद्धरण किया जाता है। पूजा में इसे सम्पूर्ण शिवमहिम्न स्तोत्र के अन्त के निकट गाया जाता है।

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