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अथातो ब्रह्मजिज्ञासा — Word-by-Word Meaning

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अथ
atha
अब (मंगल-शब्द; यहाँ 'पश्चात्' अर्थ में भी — साधन-सम्पत्ति की पूर्ति के अनन्तर)
अतः
ataḥ
इसलिए, अतः (क्योंकि कर्म के फल अनित्य हैं, अतः ब्रह्म की जिज्ञासा की जाती है)
ब्रह्म
brahma
ब्रह्म, परम, अनन्त सत्ता
जिज्ञासा
jijñāsā
जानने की इच्छा, जिज्ञासा, विचारपूर्वक अनुसन्धान
ब्रह्मजिज्ञासा
brahma-jijñāsā
ब्रह्म-जिज्ञासा — परम सत्ता को जानने की अनुशासित इच्छा (सम्पूर्ण ब्रह्मसूत्र का विषय)
अथातः
athātaḥ
अब इसलिए (अथ + अतः सन्धि में) — ग्रन्थ का मंगलमय एवं संयोजक आरम्भ
जिज्ञास्
jijñās
'ज्ञा' (जानना) धातु का सन्नन्त — जानने की इच्छा करना; जिज्ञासा शब्द का आधार
ब्रह्मणः जिज्ञासा
brahmaṇaḥ jijñāsā
ब्रह्म की जिज्ञासा — ब्रह्म ही वह विषय है जिसे जानना है
जन्मादि
janmādi
उत्पत्ति आदि (सृष्टि, स्थिति एवं लय)
अस्य यतः
asya yataḥ
इस (जगत्) का, जिससे — ब्रह्म की परिभाषा (सूत्र २) कि ब्रह्म वह है जिससे जगत् उत्पन्न होता है
शास्त्रयोनित्वात्
śāstra-yonitvāt
क्योंकि शास्त्र ही (ब्रह्म-ज्ञान का) स्रोत है — सूत्र ३, कि ब्रह्म शास्त्र द्वारा जाना जाता है
तत् तु समन्वयात्
tat tu samanvayāt
किन्तु वह (ब्रह्म ही समस्त शास्त्र का तात्पर्य है) समन्वय/एकवाक्यता के कारण — सूत्र ४, कि समस्त उपनिषद् ब्रह्म पर ही एकाग्र होते हैं

Complete Translation

अब, इसलिए, (आरम्भ होती है) ब्रह्म की जिज्ञासा। (१.१.१) ब्रह्म वह है जिससे इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। (१.१.२) क्योंकि (उसके ज्ञान का) स्रोत शास्त्र है। (१.१.३) किन्तु वह (ब्रह्म ही समस्त शास्त्रों का तात्पर्य है), उनके समन्वय (एकवाक्यता) के कारण। (१.१.४)

Origin & History

Source: Brahma Sutra (Vedanta Sutra) 1.1.1

Author: Sage Badarayana (traditionally identified with Vyasa)

Period: Ancient (classical period of Vedanta)

ब्रह्मसूत्र, अन्य महान् दार्शनिक ग्रन्थों की भाँति, 'अथ अतः' — 'अब, इसलिए' — शब्दों से आरम्भ होता है। भाष्यकार बताते हैं कि 'अब' उस समय को सूचित करता है जब साधक चतुष्टय-साधन-सम्पत्ति — विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति, एवं मुमुक्षुत्व — प्राप्त कर चुका हो, और 'इसलिए' कारण को सूचित करता है: यह देखकर कि कर्म के फल अनित्य हैं, मनुष्य नित्य की ओर मुड़ता है। इसके साथ महर्षि बादरायण अपने सम्पूर्ण ग्रन्थ का विषय घोषित करते हैं — ब्रह्म की जिज्ञासा। तत्पश्चात् अगला सूत्र ब्रह्म को उस रूप में परिभाषित करता है जिससे इस जगत् की उत्पत्ति एवं स्थिति होती है।

Frequently Asked Questions

'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'अब, इसलिए, (आरम्भ होती है) ब्रह्म की जिज्ञासा।' यह ब्रह्मसूत्र का प्रथम सूत्र है, जो घोषित करता है कि साधक अब अनन्त सत्ता ब्रह्म को जानने की विचारपूर्वक इच्छा का आरम्भ करता है।
ब्रह्मसूत्र क्या है?
ब्रह्मसूत्र (वेदान्त सूत्र या शारीरक सूत्र भी कहा जाता है) महर्षि बादरायण (व्यास से अभिन्न माने जाते हैं) द्वारा रचित सूत्रों का एक ग्रन्थ है, जो ब्रह्म पर उपनिषदों के उपदेशों को सुव्यवस्थित एवं समन्वित करता है। यह उपनिषदों एवं भगवद्गीता के साथ वेदान्त के तीन आधारभूत ग्रन्थों (प्रस्थानत्रयी) में से एक है।
यह 'अथ अतः' (अब, इसलिए) से क्यों आरम्भ होता है?
'अथ' (अब) एक मंगलमय आरम्भ है और सूचित करता है कि जिज्ञासा साधक द्वारा आवश्यक योग्यता प्राप्त कर लेने के पश्चात् होती है। 'अतः' (इसलिए) कारण देता है: चूँकि कर्म के फल अनित्य हैं, अतः मनुष्य ब्रह्म के ज्ञान की ओर मुड़ता है, जो ही स्थायी मुक्ति देता है।
'जिज्ञासा' क्या है?
जिज्ञासा जानने की इच्छा है — एक अनुशासित, सच्चा अनुसन्धान। यहाँ यह ब्रह्म की जिज्ञासा है, जो शास्त्र-श्रवण (श्रवण), मनन (मनन) एवं गहन ध्यान (निदिध्यासन) के द्वारा तब तक की जाती है जब तक आत्मा के ब्रह्म रूप का प्रत्यक्ष ज्ञान उदित नहीं होता।

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