अथातो ब्रह्मजिज्ञासा PDF
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अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥ जन्माद्यस्य यतः ॥ २ ॥ शास्त्रयोनित्वात् ॥ ३ ॥ तत्तु समन्वयात् ॥ ४ ॥
athāto brahma-jijñāsā (1.1.1) janmādy asya yataḥ (1.1.2) śāstra-yonitvāt (1.1.3) tat tu samanvayāt (1.1.4)
अब, इसलिए, (आरम्भ होती है) ब्रह्म की जिज्ञासा। (१.१.१) ब्रह्म वह है जिससे इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। (१.१.२) क्योंकि (उसके ज्ञान का) स्रोत शास्त्र है। (१.१.३) किन्तु वह (ब्रह्म ही समस्त शास्त्रों का तात्पर्य है), उनके समन्वय (एकवाक्यता) के कारण। (१.१.४)