अतिथिर्यस्य भग्नाशो — Word-by-Word Meaning
अतिथिर्यस्य भग्नाशो
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अतिथिः
atithiḥ
अतिथि (बिना निश्चित समय के आने वाला)
यस्य
yasya
जिसका, जिसके घर से
भग्नाशः
bhagnāśaḥ
टूटी आशा वाला, निराश, हताश
गृहात्
gṛhāt
घर से, गृह से
प्रतिनिवर्तते
pratinivartate
लौट जाता है, मुड़कर चला जाता है
सः
saḥ
वह, वह अतिथि
तस्मै
tasmai
उसको (गृहस्थ को)
दुष्कृतम्
duṣkṛtam
अपने पाप, अपने दुष्कर्म, अपना दोष
दत्त्वा
dattvā
देकर, छोड़कर
पुण्यम्
puṇyam
पुण्य, सत्कर्मों का फल
आदाय
ādāya
लेकर, साथ ले जाकर
गच्छति
gacchati
चला जाता है, प्रस्थान कर जाता है
Complete Translation
जो अतिथि किसी के घर से अपनी आशा टूटी हुई (निराश) लौट जाता है, वह उस गृहस्थ को अपने पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है। यह श्लोक चेतावनी देता है कि अतिथि को निराश लौटाना अपने पुण्य को खोना और अतिथि के पापों को ग्रहण करना है।
Origin & History
Source: Subhashita (Sanskrit niti literature)
Author: Traditional (anonymous wisdom verse)
Period: Classical Sanskrit literature
वैदिक एवं धार्मिक आदर्श 'अतिथि देवो भव' — 'अतिथि को ईश्वर के समान मानो' — में निहित यह श्लोक संस्कृत की सुभाषित परम्परा का अंग है। यह आतिथ्य के कर्तव्य को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करता है, उस अदृश्य पुण्य-पाप के विनिमय का वर्णन करते हुए जो तब होता है जब अतिथि का स्वागत किया जाता है या, दुर्भाग्यवश, टूटी आशा के साथ लौटा दिया जाता है, और इस प्रकार गृहस्थ को हर आगंतुक का सम्मान करना सिखाता है।
Frequently Asked Questions
अतिथिर्यस्य भग्नाशो का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है कि जो अतिथि किसी घर से निराश (लौटाया हुआ) चला जाता है, वह गृहस्थ का पुण्य अपने साथ ले जाता है और अपना दुष्कर्म (पाप) वहीं छोड़ जाता है। यह आतिथ्य में चूक से होने वाली आध्यात्मिक हानि की चेतावनी है।
यह श्लोक आतिथ्य के विषय में क्या सिखाता है?▼
यह अतिथि-सत्कार की पवित्र भारतीय परम्परा को सुदृढ़ करता है। अतिथि का स्वागत एवं सेवा करने से पुण्य मिलता है, जबकि किसी को निराश लौटाना अपने पुण्य की हानि करता है — यह 'अतिथि देवो भव' अर्थात् अतिथि ईश्वर के समान है, इस आदर्श को दर्शाता है।
यह श्लोक कहाँ मिलता है?▼
यह संस्कृत नीति परम्परा का एक सुप्रसिद्ध सुभाषित है, जो धर्म एवं आतिथ्य के उपदेशों में प्रायः उद्धृत होता है और नैतिक श्लोकों के शास्त्रीय संग्रहों में सुरक्षित है।
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