अतिथिर्यस्य भग्नाशो
अन्य नाम / खोज: atithir yasya bhagnasho · atithir yasya bhagnasho grihat pratinivartate · atithi devo bhava shloka · guest hospitality sanskrit verse · subhashita on atithi satkara
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
'अतिथिर्यस्य भग्नाशो' अतिथि-सत्कार के पवित्र भारतीय कर्तव्य पर एक मार्मिक सुभाषित है। यह घोषित करता है कि निराश लौटाया गया अतिथि गृहस्थ का संचित पुण्य ले जाता है और अपने पाप वहीं छोड़ जाता है। यह श्लोक 'अतिथि देवो भव' के प्राचीन आदर्श को आतिथ्य में चूक के आध्यात्मिक मूल्य को स्पष्ट करते हुए रेखांकित करता है।
उत्पत्ति और कथा
Subhashita (Sanskrit niti literature) · Traditional (anonymous wisdom verse) · Classical Sanskrit literature
वैदिक एवं धार्मिक आदर्श 'अतिथि देवो भव' — 'अतिथि को ईश्वर के समान मानो' — में निहित यह श्लोक संस्कृत की सुभाषित परम्परा का अंग है। यह आतिथ्य के कर्तव्य को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करता है, उस अदृश्य पुण्य-पाप के विनिमय का वर्णन करते हुए जो तब होता है जब अतिथि का स्वागत किया जाता है या, दुर्भाग्यवश, टूटी आशा के साथ लौटा दिया जाता है, और इस प्रकार गृहस्थ को हर आगंतुक का सम्मान करना सिखाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
पारम्परिक रूप से माना जाता है कि जो घर किसी अतिथि को कभी नहीं लौटाते, वे समृद्धि एवं कृपा से धन्य होते हैं, जबकि एक भी निराश आगंतुक को लौटाने में खोया पुण्य वर्षों के सत्कर्मों को चुपचाप नष्ट कर सकता है — ऐसा महत्व शास्त्र अतिथि-सत्कार को देते हैं।
मंत्र
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते। स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति॥
atithir yasya bhagnāśo gṛhāt pratinivartate। sa tasmai duṣkṛtaṁ dattvā puṇyam ādāya gacchati॥
अर्थ:जो अतिथि किसी के घर से अपनी आशा टूटी हुई (निराश) लौट जाता है, वह उस गृहस्थ को अपने पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है। यह श्लोक चेतावनी देता है कि अतिथि को निराश लौटाना अपने पुण्य को खोना और अतिथि के पापों को ग्रहण करना है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
अतिथिर्यस्य भग्नाशो पाठ के लाभ
अतिथियों के स्वागत एवं सम्मान के कालजयी धर्म को सुदृढ़ करता है
गृहस्थ को आतिथ्य के आध्यात्मिक फलों का स्मरण कराता है
आने वाले सभी के प्रति उदारता, स्नेह एवं निःस्वार्थता विकसित करता है
'अतिथि देवो भव' — अतिथि को देवता मानने के वैदिक आदर्श की प्रतिध्वनि करता है
घर-परिवार को प्रोत्साहित करता है कि किसी जरूरतमंद या आगंतुक को निराश न लौटाएँ
एक सजीव स्मरण कि अतिथि पर दिखाई गई दया अपने ही पुण्य की रक्षा करती है
अतिथिर्यस्य भग्नाशो जप विधि
इस श्लोक का पाठ इस सन्देश के प्रति जागरूकता के साथ करें कि निराश अतिथि आपका पुण्य ले जाता है। यह आपके द्वार पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति गर्मजोशीपूर्ण, अनिच्छारहित स्वागत को प्रेरित करे। अतिथि-सत्कार के प्राचीन आदर्श पर चिन्तन करें और संकल्प लें कि किसी अतिथि या जरूरतमंद आगंतुक को कभी खाली हाथ या हताश होकर न लौटाएँगे।