अतिथिर्यस्य भग्नाशो PDF
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अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते। स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति॥
atithir yasya bhagnāśo gṛhāt pratinivartate। sa tasmai duṣkṛtaṁ dattvā puṇyam ādāya gacchati॥
जो अतिथि किसी के घर से अपनी आशा टूटी हुई (निराश) लौट जाता है, वह उस गृहस्थ को अपने पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है। यह श्लोक चेतावनी देता है कि अतिथि को निराश लौटाना अपने पुण्य को खोना और अतिथि के पापों को ग्रहण करना है।