गुणैरुत्तमतां याति
अन्य नाम / खोज: gunair uttamatam yati · gunair uttamatam yati nochchaira asana samsthitah · prasada shikharastho api kakah kim garudayate · crow does not become garuda chanakya · greatness comes from virtue not position
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✦ अर्थ
इस विनोदपूर्ण एवं अत्यन्त प्रिय श्लोक में चाणक्य घोषित करते हैं कि सच्ची श्रेष्ठता मनुष्य के गुणों से उपजती है, ऊँचे आसन या पदवी से नहीं। वे इसे एक सजीव चित्र से सिद्ध करते हैं — भव्य महल की चोटी पर बैठा कौआ बलशाली गरुड़ नहीं बन जाता। यह पद से ऊपर योग्यता की एक कालजयी शिक्षा है, और मात्र पद पर आधारित अहंकार के प्रति एक कोमल भर्त्सना है।
उत्पत्ति और कथा
Chanakya Niti · Chanakya (Vishnugupta / Kautilya) · Ancient India (c. 4th–3rd century BCE)
चाणक्य, जिन्होंने राजाओं की सेवा की किन्तु पद से ऊपर योग्यता को मूल्यवान माना, प्रायः उच्च पद के अभिमान को चूर्ण करते थे। इस श्लोक में वे आग्रह करते हैं कि श्रेष्ठता केवल गुणों से प्राप्त होती है, और एक अविस्मरणीय चित्र से रिक्त अभिमान का उपहास करते हैं — महल के बुर्ज पर बैठा कौआ जो अब भी कौआ ही है, गरुड़ नहीं — यह सिखाते हुए कि सच्ची उन्नति चरित्र की होती है, आसन की नहीं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
दरबारियों ने युगों से इस श्लोक को दोहराया है ताकि शक्तिशालियों को स्मरण रहे कि सिंहासन किसी को कुलीन नहीं बनाते, क्योंकि जैसे महल के गुम्बद पर बैठा कौआ कौआ ही रहता है, वैसे ही उच्च पद पर बैठा अयोग्य अयोग्य ही रहता है, जबकि सच्चा गुणवान जहाँ भी खड़ा हो वहीं चमकता है।
मंत्र
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गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः। प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥
guṇair uttamatāṁ yāti noccair āsana-saṁsthitaḥ। prāsāda-śikhara-stho 'pi kākaḥ kiṁ garuḍāyate॥
अर्थ:मनुष्य अपने गुणों से श्रेष्ठता को प्राप्त करता है, केवल ऊँचे आसन पर बैठ जाने से नहीं। भले ही वह राजमहल की चोटी पर जा बैठे, क्या कौआ इससे गरुड़ बन जाता है? चाणक्य सिखाते हैं कि पद और ऊँचे आसन सच्चा मूल्य नहीं देते — वह तो केवल मनुष्य के गुण एवं चरित्र से ही प्राप्त होता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गुणैरुत्तमतां याति पाठ के लाभ
सिखाता है कि सच्चा मूल्य गुणों से आता है, पद से नहीं
पद या पदवी पर आधारित अभिमान एवं अहंकार को रोकता है
सद्गुणों एवं चरित्र के विकास की प्रेरणा देता है
अपनी बात कहने के लिए एक सजीव, स्मरणीय चित्र (कौआ और गरुड़) का प्रयोग करता है
लोगों को पद के बजाय योग्यता से आँकने को प्रोत्साहित करता है
विनम्रता एवं श्रेष्ठता पर मनन हेतु एक संक्षिप्त, विनोदपूर्ण श्लोक
गुणैरुत्तमतां याति जप विधि
श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और महल की छत पर बैठे उस कौए की कल्पना करें जो फिर भी गरुड़ नहीं है। मनन करें कि ऊँचा आसन मनुष्य के सच्चे मूल्य में कुछ नहीं जोड़ता, जो केवल गुणों से आता है। यह परम्परागत रूप से चाणक्य की चरित्र एवं योग्यता सम्बन्धी शिक्षाओं में पढ़ा जाता है।