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अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल, ध्यान के समय, अथवा दैनिक आत्म-चिंतन के रूप में।·📜 Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 13

अन्य नाम / खोज: adveshta sarva bhutanam maitrah karuna eva cha · adveshta sarvabhutanam · bhagavad gita 12.13

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अर्थ

भगवद्गीता 12.13 श्रीकृष्ण द्वारा उस सच्चे भक्त के गुणों के सुंदर वर्णन का आरंभ करती है जो उन्हें प्रिय है। ऐसा भक्त किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और करुणावान् होता है, ममता और अहंकार से रहित, सुख-दुख में सम तथा क्षमाशील होता है। यह श्लोक आदर्श आध्यात्मिक चरित्र का चित्र है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 13 · Veda Vyasa (Lord Krishna's teaching) · Itihasa (Mahabharata)

भगवद्गीता के बारहवें अध्याय भक्तियोग में, श्रीकृष्ण अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है और प्रेममयी भक्ति की महिमा गाते हैं। अन्त में वे उस भक्त के गुणों का वर्णन करते हैं जो उन्हें सर्वाधिक प्रिय है; यही श्लोक उस प्रसिद्ध प्रसंग का आरंभ करता है, जो सच्चे भक्त के करुणामय, अहंकाररहित और क्षमाशील हृदय का चित्रण करता है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि ऐसा भक्त — द्वेषरहित, करुणा से पूर्ण, अहंकार से मुक्त और सदा क्षमाशील — भगवान को इतना प्रिय हो जाता है कि स्वयं भगवान उसके हृदय में निवास करते हैं; इसलिए इन गुणों में विकसित होना ही उनके प्रेम को प्राप्त करने का सबसे निश्चित मार्ग माना जाता है।

मंत्र

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अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī

अर्थ:भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अद्वेष्टा🔊adveṣhṭāद्वेषरहित, जो किसी से द्वेष नहीं करता
सर्वभूतानाम्🔊sarva-bhūtānāmसमस्त प्राणियों के प्रति
मैत्रः🔊maitraḥमित्रवत्, मैत्रीपूर्ण
करुणः🔊karuṇaḥकरुणावान्, दयालु
एव🔊evaवास्तव में, ही
🔊chaऔर
निर्ममः🔊nirmamaḥममता से रहित ('मेरेपन' से मुक्त)
निरहङ्कारः🔊nirahankāraḥअहंकार से रहित ('मैंपन' से मुक्त)
सम-दुःख-सुखः🔊sama-duḥkha-sukhaḥसुख और दुःख में समान (सम)
क्षमी🔊kṣhamīक्षमाशील, क्षमावान्

अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् पाठ के लाभ

ईश्वर को प्रिय सच्चे भक्त के गुणों का वर्णन करता है — आन्तरिक रूपान्तरण का मार्गदर्शक।

समस्त प्राणियों के प्रति सार्वभौम मैत्री, करुणा और द्वेषमुक्ति का भाव विकसित करता है।

अहंकार और ममता — दुःख के मूल — को विगलित करने में सहायक होता है।

सुख-दुःख में समता तथा क्षमा के महान् गुण के लिए प्रेरित करता है।

सच्चे भक्त के चरित्र को धारण करने की प्रार्थना के रूप में प्रतिदिन पाठ एवं चिंतन किया जाता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल, ध्यान के समय, अथवा दैनिक आत्म-चिंतन के रूप में।

श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और उसमें वर्णित प्रत्येक गुण पर चिंतन करें — अद्वेष, मैत्री, करुणा, अहंकार और ममता से मुक्ति, समता और क्षमा — इन्हें धारण करने का संकल्प करते हुए। इसे अपने आचरण के दर्पण के रूप में और भगवान को प्रिय भक्त बनने की प्रार्थना के रूप में चिंतन किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 12.13 से, इसका अर्थ है: 'जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और करुणावान् है, ममता और अहंकार से रहित, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है।' यह श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें प्रिय भक्त के वर्णन का आरंभ करता है।
यह एक प्रसिद्ध प्रसंग (गीता 12.13–20) का आरंभ करता है जिसमें श्रीकृष्ण उस भक्त के गुण बताते हैं जिसे वे सर्वाधिक प्रेम करते हैं। यह श्लोक कुछ उच्चतम गुणों — द्वेषमुक्ति, सार्वभौम करुणा, अहंकारहीनता, समता और क्षमा — का नाम लेता है, जिससे यह आध्यात्मिक चरित्र का आदर्श बनता है।
इसे दैनिक आत्म-चिंतन के रूप में प्रयोग करें: सबके प्रति मैत्री और करुणा विकसित करें, ममता और अभिमान का त्याग करें, सुख-दुःख में सम रहें, और क्षमा का अभ्यास करें। इन गुणों को जीना स्वयं भक्ति का एक रूप है जो ईश्वर के निकट ले जाता है।

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