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अतुलं तत्र तत्तेजः (देवी का तेज से प्रादुर्भाव) — Word-by-Word Meaning

अतुलं तत्र तत्तेजः (देवी का तेज से प्रादुर्भाव)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अतुलम्
atulam
अतुलनीय, अनुपम, माप से परे
तत्र
tatra
वहाँ (उस स्थान पर)
तत् तेजः
tat tejaḥ
वह तेज, अग्निमय प्रकाश
सर्वदेवशरीरजम्
sarva-deva-śarīra-jam
समस्त देवताओं के शरीरों से उत्पन्न
एकस्थम्
eka-stham
एक स्थान पर एकत्रित
तत् अभूत् नारी
tat abhūt nārī
वह एक नारी (देवी) बन गया
व्याप्तलोकत्रयम्
vyāpta-loka-trayam
तीनों लोकों में व्याप्त
त्विषा
tviṣā
अपनी कांति, दीप्ति से
यत् अभूत् शाम्भवम् तेजः
yat abhūt śāmbhavam tejaḥ
जो शिव (शम्भु) का तेज था
तेन अजायत तत् मुखम्
tena ajāyata tat mukham
उससे उनका मुख प्रकट हुआ
याम्येन
yāmyena
यम (मृत्यु के देवता) के तेज से
अभवन् केशाः
abhavan keśāḥ
उनके केश प्रकट हुए
बाहवः
bāhavaḥ
उनकी भुजाएँ
विष्णुतेजसा
viṣṇu-tejasā
विष्णु के तेज से

Complete Translation

देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक नारी (देवी) बन गया, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त था। जो शिव (शाम्भव) का तेज था, उससे उनका मुख बना; यम के तेज से केश, और विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं।

Origin & History

Source: Durga Saptashati Chapter 2

Author: Sage Markandeya (Markandeya Purana)

Period: c. 400–600 CE (Markandeya Purana)

जब महिषासुर ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर देवताओं को निकाल दिया, तब वे विष्णु और शिव के पास गए और भैंसासुर के अत्याचार का वर्णन किया। यह सुनकर विष्णु, ब्रह्मा और शिव के मुखों से एक प्रचण्ड तेज प्रकट हुआ, जिसमें इन्द्र और समस्त देवताओं की ऊर्जाएँ भी मिल गईं। यह असीम प्रकाश एक में मिलकर देवी के रूप में प्रकट हुआ, जिनके शरीर का प्रत्येक अंग किसी विशेष देवता की दीप्ति से बना था।

Frequently Asked Questions

दुर्गा सप्तशती के ये श्लोक किसका वर्णन करते हैं?
ये समस्त देवताओं के संयुक्त तेज से देवी दुर्गा के प्रादुर्भाव का वर्णन करते हैं। महिषासुर को पराजित करने में असमर्थ देवताओं का क्रोध प्रकाश के रूप में प्रज्वलित हुआ, एक पुंज में मिल गया, और तीनों लोकों में व्याप्त सर्वशक्तिमयी देवी बन गया।
देवी अनेक देवताओं की ऊर्जाओं से क्यों बनी हैं?
यह प्रतीक है कि शक्ति ही प्रत्येक देवता की अन्तर्निहित शक्ति है। शिव से उनका मुख, यम से केश, विष्णु से भुजाएँ आदि दर्शाते हैं कि वे देवताओं से भिन्न नहीं हैं, अपितु उनकी संकेन्द्रित, सक्रिय शक्ति (तेज) हैं जो एक दिव्य रूप में एकत्र हो गई।
यह दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय से है?
ये दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय (महिषासुर-सैन्य-वध) के १२वें और १३वें श्लोक हैं, जो देवी महालक्ष्मी द्वारा अधिष्ठित मध्यम चरित का अंग है।

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