अतुलं तत्र तत्तेजः (देवी का तेज से प्रादुर्भाव)
अन्य नाम / खोज: atulam tatra tat tejah · birth of durga from tejas · devi manifestation saptashati · tejorashi samudbhava · durga saptashati chapter 2 manifestation
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✦ अर्थ
दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय के ये श्लोक देवी दुर्गा के अद्भुत प्रादुर्भाव का वर्णन करते हैं। जब महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, तब शिव, विष्णु, ब्रह्मा और समस्त देवताओं के शरीरों से निकला क्रोधमय तेज एक प्रचण्ड पुंज में मिलकर एक तेजोमयी नारी के रूप में प्रकट हुआ, जो तीनों लोकों में व्याप्त था। देवी का प्रत्येक अंग किसी न किसी देवता की शक्ति से बना, अतः वे समस्त ब्रह्माण्ड की संकेन्द्रित शक्ति हैं।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati Chapter 2 · Sage Markandeya (Markandeya Purana) · c. 400–600 CE (Markandeya Purana)
जब महिषासुर ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर देवताओं को निकाल दिया, तब वे विष्णु और शिव के पास गए और भैंसासुर के अत्याचार का वर्णन किया। यह सुनकर विष्णु, ब्रह्मा और शिव के मुखों से एक प्रचण्ड तेज प्रकट हुआ, जिसमें इन्द्र और समस्त देवताओं की ऊर्जाएँ भी मिल गईं। यह असीम प्रकाश एक में मिलकर देवी के रूप में प्रकट हुआ, जिनके शरीर का प्रत्येक अंग किसी विशेष देवता की दीप्ति से बना था।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि देवी के प्रादुर्भाव के इस दृश्य का — जहाँ देवताओं की असहायता अजेय स्त्री-शक्ति में बदल गई — मात्र चिन्तन ने भक्तों को असंभव-सी निराशाजनक परिस्थितियों से उबारा है, क्योंकि वही शक्ति जो महिषासुर का वध करने एकत्र हुई थी, माना जाता है कि किसी भी सच्चे साधक के चारों ओर एकत्र हो जाती है जो उन्हें पुकारता है।
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अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥
atulaṃ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam ekasthaṃ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṃ tviṣā
अर्थ:देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक नारी (देवी) बन गया, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त था। जो शिव (शाम्भव) का तेज था, उससे उनका मुख बना; यम के तेज से केश, और विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं।
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् । याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥
yadabhūcchāmbhavaṃ tejastenājāyata tanmukham yāmyena cābhavan keśā bāhavo viṣṇutejasā
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अतुलं तत्र तत्तेजः (देवी का तेज से प्रादुर्भाव) पाठ के लाभ
देवी को समस्त देवताओं की एकीकृत शक्ति के रूप में आवाहित करता है, जिससे सर्वांगीण रक्षा प्राप्त होती है
देवी के प्रादुर्भाव का ध्यान भक्त को असंभव-सी परिस्थितियों के विरुद्ध साहस से भर देता है
साधक को स्मरण कराता है कि दिव्य स्त्री-शक्ति समस्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं का स्रोत और योग है
नवरात्रि में दुर्गा के जन्म और प्रादुर्भाव का सम्मान करने के लिए पाठ किया जाता है
भय और निराशा को दूर करता है, क्योंकि यह स्मरण कराता है कि देवताओं की असहायता विजय में बदल गई
इस विश्वास को दृढ़ करता है कि एकाग्र भक्ति (तेज) किसी भी अधर्म पर विजय पा सकती है
अतुलं तत्र तत्तेजः (देवी का तेज से प्रादुर्भाव) जप विधि
इन श्लोकों का पाठ करते हुए कल्पना करें कि प्रत्येक देवता से तेज की किरणें प्रवाहित होकर देवी के रूप में मिल रही हैं। सप्तशती के बीज मन्त्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' से आरम्भ करें, फिर धीरे-धीरे पाठ करें, देवी के प्रत्येक अंग के बनते समय उस पर ध्यान केन्द्रित करें। पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ के अंग रूप में अथवा देवी के प्रादुर्भाव पर स्वतन्त्र ध्यान के रूप में आदर्श है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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ॐ
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