अतुलं तत्र तत्तेजः (देवी का तेज से प्रादुर्भाव) PDF
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अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥
atulaṃ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam ekasthaṃ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṃ tviṣā
देवताओं के शरीरों से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक नारी (देवी) बन गया, जो अपनी कांति से तीनों लोकों में व्याप्त था। जो शिव (शाम्भव) का तेज था, उससे उनका मुख बना; यम के तेज से केश, और विष्णु के तेज से भुजाएँ बनीं।
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् । याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥
yadabhūcchāmbhavaṃ tejastenājāyata tanmukham yāmyena cābhavan keśā bāhavo viṣṇutejasā