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अवधूत गीता (प्रारम्भिक श्लोक) PDF

अवधूत गीता (प्रारम्भिक श्लोक) की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना। महाभयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते॥

Ishvaraanugrahaad-eva pumsaam-advaita-vaasanaa. Mahaa-bhaya-paritraanaad-vipraanaam-upajaayate.

ईश्वर की कृपा से ही मनुष्यों में अद्वैत की वासना (एकत्व की अभिलाषा) उत्पन्न होती है, जो विवेकियों को महान् भय (जन्म-मृत्यु) से बचाती है॥

येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि। निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम्॥

Yened-idam pooritam sarvam-aatmanaiv-aatman-aatmani. Niraakaaram katham vande hy-abhinnam shivam-avyayam.

जिससे यह सब परिपूर्ण है — आत्मा के द्वारा, आत्मा रूप में, आत्मा में ही — उस निराकार, अभिन्न, शिव (कल्याणस्वरूप), अव्यय को मैं कैसे वन्दना करूँ?॥

पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम्। कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः॥

Pancha-bhootaatmakam vishvam mareechi-jala-sannibham. Kasyaapy-aho namaskuryaam-aham-eko niranjanah.

पञ्चभूतों से बना यह विश्व मरीचिका के जल के समान है; अहो! मैं, जो एकमात्र निरञ्जन हूँ, किसको नमस्कार करूँ?॥

आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते। अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे॥

Aatmaiva kevalam sarvam bhedaabhedo na vidyate. Asti naasti katham brooyaam vismayah pratibhaati me.

आत्मा ही केवल सब कुछ है; भेद और अभेद कुछ भी नहीं है। फिर मैं 'है' या 'नहीं है' कैसे कहूँ? मुझमें महान् विस्मय प्रकट हो रहा है॥

वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानं विज्ञानमेव च। अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः॥

Vedaanta-saara-sarvasvam jnaanam vijnaanam-eva cha. Aham-aatmaa niraakaarah sarva-vyaapee svabhaavatah.

यही वेदान्त का सम्पूर्ण सार है, ज्ञान भी और विज्ञान भी: मैं आत्मा हूँ, निराकार हूँ, स्वभाव से ही सर्वव्यापी हूँ॥

यो वै सर्वात्मकं तत्त्वं वेत्ति निश्चयतो मम। निर्ममो निर्विकल्पोऽसौ शुद्धचैतन्यविग्रहः॥

Yo vai sarvaatmakam tattvam vetti nishchayato mama. Nirmamo nirvikalpo'sau shuddha-chaitanya-vigrahah.

जो उस सर्वात्मक तत्त्व को निश्चयपूर्वक जानता है, वह वस्तुतः मेरा ही स्वरूप है — ममतारहित, निर्विकल्प, शुद्ध चैतन्य का विग्रह॥

न त्वं देहो न ते देहो न भोक्ता न च ते क्रिया। चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥

Na tvam deho na te deho na bhoktaa na cha te kriyaa. Chid-roopo'si sadaa saakshee nirapekshah sukham chara.

न तू देह है, न देह तेरी है; न तू भोक्ता है, न क्रिया तेरी है। तू चिद्रूप है, सदा साक्षी है, निरपेक्ष है — अतः सुखपूर्वक विचर (आनन्द में रह)॥