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अवधूत गीता (प्रारम्भिक श्लोक)

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 ब्रह्म मुहूर्त में, गुरुवार को, तथा ध्यान या आत्म-विचार के समय प्रातःकाल·📜 Avadhuta Gita — traditionally the utterance of Lord Dattatreya (recorded by his disciples Swami and Kartika)

अन्य नाम / खोज: avadhuta gita · avadhoota gita · avadhut gita · dattatreya avadhuta gita · song of the avadhuta · ishvaranugrahad eva

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अर्थ

अवधूत गीता ('अवधूत का गीत') परम अवधूत और आदि गुरु भगवान् दत्तात्रेय द्वारा कथित एक उदात्त अद्वैत वेदान्त ग्रन्थ है। इसके श्लोक अद्वैत अनुभूति की अखण्ड धारा हैं — जो घोषित करते हैं कि आत्मा ही सब कुछ है, संसार मात्र मरीचिका है, और जीव सदा मुक्त, निराकार, सर्वव्यापी शुद्ध चैतन्य है। ये प्रसिद्ध प्रारम्भिक श्लोक, जो 'तू देह नहीं है... अतः सुखपूर्वक विचर' इस अमर उपदेश से समाप्त होते हैं, एकत्व-ज्ञान के शुद्धतम कथनों में से एक माने जाते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Avadhuta Gita — traditionally the utterance of Lord Dattatreya (recorded by his disciples Swami and Kartika) · Lord Dattatreya (the supreme Avadhuta) · Ancient (classical Advaita Vedanta literature)

अवधूत गीता भगवान् दत्तात्रेय का स्वतःस्फूर्त गीत माना जाता है — ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अवधूत संयोग और आदि गुरु, जो अपनी अद्वैत आत्मा की साक्षात् अनुभूति को उँडेलते हैं। समस्त अनुष्ठान और परम्परा से मुक्त, यह उस पुरुष के दृष्टिकोण से बोलता है जो पूर्णतः जाग्रत है, बारम्बार घोषित करता है कि आत्मा ही केवल सत्य है और बन्धन तथा मोक्ष दोनों समान रूप से भ्रम हैं। वेदान्तियों और सन्न्यासियों द्वारा समान रूप से प्रिय, इसके श्लोक सदियों से आत्मज्ञान के साधकों को एकत्व के सत्य के निर्भय मानचित्र के रूप में प्रेरित करते रहे हैं।

शास्त्रों में वर्णित

अवधूत गीता बाह्य चमत्कारों के लिए नहीं, अपितु उस आन्तरिक चमत्कार के लिए पूजित है जो यह करती है — अद्वैत परम्परा के सन्त बताते हैं कि इसके श्लोकों का सच्चा चिन्तन, पहचान की एक चमक में, देह होने के आजीवन भाव को विलीन कर सदा-मुक्त साक्षी-आत्मा को प्रकट कर सकता है, जो प्रथम श्लोक द्वारा प्रतिज्ञात वही 'भय से महान् उद्धार' है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना। महाभयपरित्राणाद्विप्राणामुपजायते॥

Ishvaraanugrahaad-eva pumsaam-advaita-vaasanaa. Mahaa-bhaya-paritraanaad-vipraanaam-upajaayate.

अर्थ:ईश्वर की कृपा से ही मनुष्यों में अद्वैत की वासना (एकत्व की अभिलाषा) उत्पन्न होती है, जो विवेकियों को महान् भय (जन्म-मृत्यु) से बचाती है॥

श्लोक 2

येनेदं पूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि। निराकारं कथं वन्दे ह्यभिन्नं शिवमव्ययम्॥

Yened-idam pooritam sarvam-aatmanaiv-aatman-aatmani. Niraakaaram katham vande hy-abhinnam shivam-avyayam.

अर्थ:जिससे यह सब परिपूर्ण है — आत्मा के द्वारा, आत्मा रूप में, आत्मा में ही — उस निराकार, अभिन्न, शिव (कल्याणस्वरूप), अव्यय को मैं कैसे वन्दना करूँ?॥

श्लोक 3

पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम्। कस्याप्यहो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः॥

Pancha-bhootaatmakam vishvam mareechi-jala-sannibham. Kasyaapy-aho namaskuryaam-aham-eko niranjanah.

अर्थ:पञ्चभूतों से बना यह विश्व मरीचिका के जल के समान है; अहो! मैं, जो एकमात्र निरञ्जन हूँ, किसको नमस्कार करूँ?॥

श्लोक 4

आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो विद्यते। अस्ति नास्ति कथं ब्रूयां विस्मयः प्रतिभाति मे॥

Aatmaiva kevalam sarvam bhedaabhedo na vidyate. Asti naasti katham brooyaam vismayah pratibhaati me.

अर्थ:आत्मा ही केवल सब कुछ है; भेद और अभेद कुछ भी नहीं है। फिर मैं 'है' या 'नहीं है' कैसे कहूँ? मुझमें महान् विस्मय प्रकट हो रहा है॥

श्लोक 5

वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानं विज्ञानमेव च। अहमात्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः॥

Vedaanta-saara-sarvasvam jnaanam vijnaanam-eva cha. Aham-aatmaa niraakaarah sarva-vyaapee svabhaavatah.

अर्थ:यही वेदान्त का सम्पूर्ण सार है, ज्ञान भी और विज्ञान भी: मैं आत्मा हूँ, निराकार हूँ, स्वभाव से ही सर्वव्यापी हूँ॥

श्लोक 6

यो वै सर्वात्मकं तत्त्वं वेत्ति निश्चयतो मम। निर्ममो निर्विकल्पोऽसौ शुद्धचैतन्यविग्रहः॥

Yo vai sarvaatmakam tattvam vetti nishchayato mama. Nirmamo nirvikalpo'sau shuddha-chaitanya-vigrahah.

अर्थ:जो उस सर्वात्मक तत्त्व को निश्चयपूर्वक जानता है, वह वस्तुतः मेरा ही स्वरूप है — ममतारहित, निर्विकल्प, शुद्ध चैतन्य का विग्रह॥

श्लोक 7

त्वं देहो ते देहो भोक्ता ते क्रिया। चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥

Na tvam deho na te deho na bhoktaa na cha te kriyaa. Chid-roopo'si sadaa saakshee nirapekshah sukham chara.

अर्थ:न तू देह है, न देह तेरी है; न तू भोक्ता है, न क्रिया तेरी है। तू चिद्रूप है, सदा साक्षी है, निरपेक्ष है — अतः सुखपूर्वक विचर (आनन्द में रह)॥

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

ईश्वरानुग्रहादेव🔊Ishvaraanugrahaad-evaकेवल ईश्वर की कृपा से ही
अद्वैतवासना🔊Advaita-vaasanaaअद्वैत (एकत्व) की ओर रुचि, अभिलाषा
महाभयपरित्राणात्🔊Mahaa-bhaya-paritraanaatमहान् भय (जन्म-मृत्यु, संसार) से उद्धार के लिए
उपजायते🔊Upajaayateउत्पन्न होती है (मनुष्यों में)
येनेदं पूरितं सर्वम्🔊Yened-idam pooritam sarvamजिससे यह सब परिपूर्ण/व्याप्त है
आत्मनैवात्मनात्मनि🔊Aatmanaiv-aatman-aatmaniआत्मा के द्वारा, आत्मा रूप में, आत्मा में ही
निराकारं कथं वन्दे🔊Niraakaaram katham vandeउस निराकार को मैं कैसे वन्दना करूँ
अभिन्नं शिवमव्ययम्🔊Abhinnam shivam-avyayamअभिन्न, कल्याणस्वरूप (शिव), अव्यय एक को
मरीचिजलसन्निभम्🔊Mareechi-jala-sannibhamमरीचिका के जल के समान (संसार मृगतृष्णा की भाँति असत्य है)
अहमेको निरञ्जनः🔊Aham-eko niranjanahमैं एकमात्र निरञ्जन (निर्मल) हूँ
आत्मैव केवलं सर्वम्🔊Aatmaiva kevalam sarvamआत्मा ही केवल सब कुछ है
भेदाभेदो न विद्यते🔊Bhedaabhedo na vidyateभेद और अभेद कुछ भी नहीं है (कोई द्वैत नहीं)
विस्मयः प्रतिभाति मे🔊Vismayah pratibhaati meमुझमें महान् विस्मय प्रकट हो रहा है
वेदान्तसारसर्वस्वम्🔊Vedaanta-saara-sarvasvamवेदान्त का सम्पूर्ण सार और निधि
अहमात्मा निराकारः🔊Aham-aatmaa niraakaarahमैं आत्मा हूँ, निराकार हूँ
सर्वव्यापी स्वभावतः🔊Sarva-vyaapee svabhaavatahस्वभाव से ही सर्वव्यापी हूँ
शुद्धचैतन्यविग्रहः🔊Shuddha-chaitanya-vigrahahशुद्ध चैतन्य का साक्षात् विग्रह
न त्वं देहो न ते देहः🔊Na tvam deho na te dehahन तू देह है, न देह तेरी है
न भोक्ता न च ते क्रिया🔊Na bhoktaa na cha te kriyaaन तू भोक्ता है, न क्रिया तेरी है
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी🔊Chid-roopo'si sadaa saaksheeतू चिद्रूप है, सदा साक्षी है
निरपेक्षः सुखं चर🔊Nirapekshah sukham charaसमस्त इच्छाओं से रहित, सुखपूर्वक विचर (आनन्द में रह)

अवधूत गीता (प्रारम्भिक श्लोक) पाठ के लाभ

भगवान् दत्तात्रेय के साक्षात् वचनों में सर्वोच्च अद्वैत (अद्वय) ज्ञान प्रदान करता है

'तू देह नहीं है... तू शुद्ध चैतन्य है' इस उद्घोष से बन्धन के भाव को विलीन करता है

निर्भयता और जन्म-मृत्यु के महान् भय से मुक्ति की भावना जगाता है

संसार को मरीचिका और आत्मा को एकमात्र सत्य प्रकट कर गहन शान्ति देता है

अपने यथार्थ स्वरूप — साक्षी — पर ध्यान (निदिध्यासन) का सशक्त साधन है

आत्मज्ञान के परम गुरु दत्तात्रेय के प्रति भक्ति को दृढ़ करता है

समझपूर्वक इसका पठन या श्रवण आत्मा में स्थिति को जाग्रत करता है, ऐसा कहा जाता है

अवधूत गीता (प्रारम्भिक श्लोक) जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयब्रह्म मुहूर्त में, गुरुवार को, तथा ध्यान या आत्म-विचार के समय प्रातःकाल

ये श्लोक अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति के बजाय चिन्तन (मनन) और ध्यान (निदिध्यासन) के लिए हैं। मन को स्थिर करने के पश्चात् इन्हें धीरे-धीरे, यथासम्भव उच्च स्वर में पढ़ें, और आत्मा के यथार्थ स्वरूप की प्रत्येक उद्घोषणा पर रुकें। अनेक साधक अवधूत गीता को अद्वैत के दृढ़ निश्चय हेतु नित्य पाठ रूप में रखते हैं। अन्त में, ग्रन्थ में वर्णित साक्षी-चैतन्य रूप में मौन बैठकर समापन करें — 'समस्त इच्छाओं से रहित, सुखपूर्वक स्थित'।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अवधूत गीता अद्वैत वेदान्त का एक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थ है, जो परम्परागत रूप से परम अवधूत भगवान् दत्तात्रेय की स्वतःस्फूर्त वाणी मानी जाती है। लगभग २८९ श्लोकों में यह सबसे साहसिक शब्दों में इस अनुभूति को व्यक्त करता है कि व्यक्तिगत आत्मा अनन्त, निराकार ब्रह्म के साथ एक है।
अवधूत वह मुक्त पुरुष है जिसने समस्त सांसारिक बन्धन, परम्पराएँ और तादात्म्य 'झाड़ डाले' (अव-धूत) हैं, और जो स्वाभाविक रूप से आत्मा के आनन्द में स्थित है। भगवान् दत्तात्रेय परम अवधूत के रूप में पूजित हैं, और यह गीता उसी अवस्था का उनका गीत है।
केन्द्रीय शिक्षा शुद्ध अद्वैत है: आत्मा ही केवल सब कुछ है, संसार मरीचिका से अधिक सत्य नहीं, और अपना यथार्थ स्वरूप निराकार, सर्वव्यापी चैतन्य है — वह नित्य साक्षी जो कभी देह, कर्ता या भोक्ता नहीं। इसे जानकर मनुष्य मुक्त और निर्भय होकर जीता है।
यह अनुष्ठानिक जप के बजाय चिन्तन और ध्यान के लिए है। इन श्लोकों को धीरे-धीरे पढ़ना, उनके अर्थ पर मनन करना, और फिर उनमें वर्णित साक्षी-चैतन्य में मौन रूप से स्थित होना — यही इनकी प्रज्ञा को मूल में बसाने का परम्परागत मार्ग है।

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