गुरु गीता (चयनित श्लोक)
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✦ अर्थ
गुरु गीता ('गुरु का गीत') भगवान् शिव और देवी पार्वती के बीच का पूज्य संवाद है, जो स्कन्द पुराण से लिया गया है, जिसमें शिव गुरु की परम महिमा का वर्णन करते हैं। ये प्रसिद्ध श्लोक 'गुरु' शब्द की व्याख्या अन्धकार को प्रकाश में बदलने वाले के रूप में करते हैं, गुरु को साक्षात् ब्रह्म घोषित करते हैं, और गुरु की मूर्ति, चरण, वचन तथा कृपा को ध्यान, पूजा, मन्त्र और मोक्ष का मूल बताते हैं। समापन ध्यान-श्लोक 'ब्रह्मानन्दं' सम्पूर्ण भारत में सद्गुरु के परम वन्दन के रूप में नित्य गाया जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Skanda Purana — the dialogue of Lord Shiva and Goddess Parvati (Uttara Khanda) · Traditional (revealed by Lord Shiva to Parvati; preserved in the Skanda Purana) · Ancient (Puranic)
जब देवी पार्वती भगवान् शिव से उस मार्ग को प्रकट करने की प्रार्थना करती हैं जिससे जीव ब्रह्म के साथ ऐक्य प्राप्त कर सके, तब शिव उत्तर देते हैं कि गुरु-भक्ति से बढ़कर कोई साधन नहीं। तब वे गुरु गीता का उपदेश देते हैं — 'गुरु' शब्द का अर्थ, गुरु के चरणों का पूजन, और यह सत्य खोलते हुए कि गुरु साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप, अज्ञान का नाशक एवं मोक्ष का दाता है। ये श्लोक गुरु-भक्ति के सर्वाधिक प्रिय शास्त्रों में से एक बन गए, जो सम्पूर्ण भारत के आश्रमों एवं घरों में नित्य पठित होते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
प्रत्येक परम्परा के सन्त साक्षी देते हैं कि गुरु गीता का सच्चा पाठ गुरु की जीवन्त कृपा को जगाता है — असंख्य साधक बताते हैं कि इन श्लोकों के नित्य पाठ से अकस्मात् आन्तरिक स्पष्टता, चिरकालीन संशयों का निवारण, और अपने गुरु की अचूक, मार्गदर्शक उपस्थिति प्राप्त हुई, जो इस वचन को पूर्ण करती है कि 'मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है'।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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गुकारश्चान्धकारो हि ककारस्तेज उच्यते। अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥
Gukaarash-chaandhakaaro hi Kakaaras-teja uchyate. Ajnaana-graasakam Brahma Gurur-eva na samshayah.
अर्थ:'गु' अक्षर अन्धकार (अज्ञान) है और 'रु' अक्षर तेज (प्रकाश) कहा गया है; जो ब्रह्म अज्ञान का ग्रास कर लेता है, वही निःसंदेह गुरु है।
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्तिविनाशनम्॥
Gukaarah prathamo varno maayaadi-guna-bhaasakah. Rakaaro dviteeyo Brahma maayaa-bhraanti-vinaashanam.
अर्थ:प्रथम 'गु' अक्षर माया आदि गुणों का प्रकाशक है; दूसरा 'रु' अक्षर माया की भ्रान्ति का नाशक ब्रह्म है।
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्। मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥
Dhyaana-moolam guror-moortih poojaa-moolam guroh padam. Mantra-moolam guror-vaakyam moksha-moolam guroh kripaa.
अर्थ:ध्यान का मूल गुरु की मूर्ति है, पूजा का मूल गुरु के चरण हैं, मन्त्र का मूल गुरु का वचन है, और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है।
गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः। गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परायणम्॥
Gurur-eva param Brahma Gurur-eva paraa gatih. Gurur-eva paraa vidyaa Gurur-eva paraayanam.
अर्थ:गुरु ही परब्रह्म है, गुरु ही परा गति है; गुरु ही परा विद्या है, गुरु ही परम आश्रय है।
गुरुरेव परः कामो गुरुरेव परं धनम्। यस्माद्तत्त्वोपदेष्टासौ तस्माद्गुरुतरो गुरुः॥
Gurur-eva parah kaamo Gurur-eva param dhanam. Yasmaat-tattvopadeshtaasau tasmaad-gurutaro guruh.
अर्थ:गुरु ही परम काम (अभीष्ट) है, गुरु ही परम धन है। चूँकि वही तत्त्व का उपदेश देता है, इसलिए गुरु सबसे श्रेष्ठ (गुरुतर) है।
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः। वेदान्ताम्बुजसूर्यो यः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Sarva-shruti-shiro-ratna-viraajita-padaambujah. Vedaantaambuja-sooryo yah tasmai Shri-Gurave Namah.
अर्थ:जिनके चरण-कमल समस्त श्रुतियों (उपनिषदों) रूपी शिरोमणि से सुशोभित हैं, जो वेदान्त-कमल को विकसित करने वाले सूर्य हैं — उन श्रीगुरु को नमस्कार।
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥
Brahmaanandam parama-sukhadam kevalam jnaana-moortim Dvandvaateetam gagana-sadrisham tattvam-asyaadi-lakshyam. Ekam nityam vimalam-achalam sarva-dhee-saakshi-bhootam Bhaavaateetam triguna-rahitam sad-gurum tam namaami.
अर्थ:जो ब्रह्मानन्द-स्वरूप, परम सुखदायी, केवल ज्ञान की मूर्ति, द्वन्द्वों से अतीत, आकाश के समान व्यापक, 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के लक्ष्य, एक, नित्य, निर्मल, अचल, समस्त बुद्धियों के साक्षी, भावातीत और त्रिगुणरहित हैं — उन सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गुरु गीता (चयनित श्लोक) पाठ के लाभ
गुरु की परम महिमा को साक्षात् ब्रह्म रूप में प्रकट करता है — गुरु-भक्ति का हृदय
प्रत्येक श्लोक सद्गुरु की मूर्ति, चरण, वचन एवं कृपा के प्रति श्रद्धा और समर्पण को गहन करता है
'ब्रह्मानन्दं' ध्यान-श्लोक गुरु एवं आत्मा का सम्पूर्ण नित्य वन्दन है
ज्ञान (ज्ञान) प्रदान करता है और भीतर के अज्ञान का नाश ('जो अन्धकार का ग्रास करता है') करता है
शान्ति, स्थिरता एवं ध्यान में गुरु की अनुभूत उपस्थिति लाता है
परम्परागत रूप से गुरु पूर्णिमा एवं गुरुवार को गुरु के आशीर्वाद हेतु पठित
यह बोध विकसित करता है कि गुरु और परम सत्य एक हैं
गुरु गीता (चयनित श्लोक) जप विधि
स्नान के पश्चात् पूर्व दिशा की ओर अपने गुरु अथवा भगवान् शिव की प्रतिमा के सम्मुख बैठें और दीप जलाएँ। गुरु गीता के इन श्लोकों का धीरे-धीरे एवं ध्यानपूर्वक पाठ करें, गुरु को ब्रह्म के रूप में देखते हुए। सम्पूर्ण गुरु गीता का पाठ परम्परागत रूप से प्रातःकाल किया जाता है; इन मूल श्लोकों का चयन भी, विशेषकर समापन 'ब्रह्मानन्दं', एक सम्पूर्ण एवं शुभ गुरु-वन्दना है। गुरु के चरणों में (मानसिक नमस्कार) झुककर समापन करें।