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गुरु गीता (चयनित श्लोक) PDF

गुरु गीता (चयनित श्लोक) की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

गुकारश्चान्धकारो हि ककारस्तेज उच्यते। अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥

Gukaarash-chaandhakaaro hi Kakaaras-teja uchyate. Ajnaana-graasakam Brahma Gurur-eva na samshayah.

'गु' अक्षर अन्धकार (अज्ञान) है और 'रु' अक्षर तेज (प्रकाश) कहा गया है; जो ब्रह्म अज्ञान का ग्रास कर लेता है, वही निःसंदेह गुरु है।

गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्तिविनाशनम्॥

Gukaarah prathamo varno maayaadi-guna-bhaasakah. Rakaaro dviteeyo Brahma maayaa-bhraanti-vinaashanam.

प्रथम 'गु' अक्षर माया आदि गुणों का प्रकाशक है; दूसरा 'रु' अक्षर माया की भ्रान्ति का नाशक ब्रह्म है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्। मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥

Dhyaana-moolam guror-moortih poojaa-moolam guroh padam. Mantra-moolam guror-vaakyam moksha-moolam guroh kripaa.

ध्यान का मूल गुरु की मूर्ति है, पूजा का मूल गुरु के चरण हैं, मन्त्र का मूल गुरु का वचन है, और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है।

गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः। गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परायणम्॥

Gurur-eva param Brahma Gurur-eva paraa gatih. Gurur-eva paraa vidyaa Gurur-eva paraayanam.

गुरु ही परब्रह्म है, गुरु ही परा गति है; गुरु ही परा विद्या है, गुरु ही परम आश्रय है।

गुरुरेव परः कामो गुरुरेव परं धनम्। यस्माद्तत्त्वोपदेष्टासौ तस्माद्गुरुतरो गुरुः॥

Gurur-eva parah kaamo Gurur-eva param dhanam. Yasmaat-tattvopadeshtaasau tasmaad-gurutaro guruh.

गुरु ही परम काम (अभीष्ट) है, गुरु ही परम धन है। चूँकि वही तत्त्व का उपदेश देता है, इसलिए गुरु सबसे श्रेष्ठ (गुरुतर) है।

सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः। वेदान्ताम्बुजसूर्यो यः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

Sarva-shruti-shiro-ratna-viraajita-padaambujah. Vedaantaambuja-sooryo yah tasmai Shri-Gurave Namah.

जिनके चरण-कमल समस्त श्रुतियों (उपनिषदों) रूपी शिरोमणि से सुशोभित हैं, जो वेदान्त-कमल को विकसित करने वाले सूर्य हैं — उन श्रीगुरु को नमस्कार।

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥

Brahmaanandam parama-sukhadam kevalam jnaana-moortim Dvandvaateetam gagana-sadrisham tattvam-asyaadi-lakshyam. Ekam nityam vimalam-achalam sarva-dhee-saakshi-bhootam Bhaavaateetam triguna-rahitam sad-gurum tam namaami.

जो ब्रह्मानन्द-स्वरूप, परम सुखदायी, केवल ज्ञान की मूर्ति, द्वन्द्वों से अतीत, आकाश के समान व्यापक, 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के लक्ष्य, एक, नित्य, निर्मल, अचल, समस्त बुद्धियों के साक्षी, भावातीत और त्रिगुणरहित हैं — उन सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।