Mantra.Tips
dattatreyadattagurubavani

दत्त बावनी

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 गुरुवार, दत्त जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), तथा प्रतिदिन प्रातः या सायंकाल·📜 Datta-sampradaya devotional literature; composed in Gujarati by Shri Rang Avadhoot Maharaj of Nareshwar

अन्य नाम / खोज: datta bavani · dattabavani · datta bavani lyrics · shri datta bavani · jai yogishwar datt dayal · rang avadhoot datta bavani

Share:

अर्थ

दत्त बावनी भगवान् दत्तात्रेय को समर्पित एक प्रिय भक्ति-स्तोत्र है, जिसकी रचना नारेश्वर के संत श्री रंग अवधूत महाराज ने गुजराती में की। 'बावनी' का अर्थ है बावन (52) चरणों की रचना, जिसकी प्रत्येक पंक्ति दत्त को करुणामय अवधूत, ब्रह्मा-विष्णु-शिव के एकत्व, और शरणागत के निश्चित आश्रय के रूप में महिमामंडित करती है। इसे लाखों दत्तभक्त प्रतिदिन पढ़ते हैं और यह रक्षा, संकटहरण तथा गुरुकृपा प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है।

उत्पत्ति और कथा

Datta-sampradaya devotional literature; composed in Gujarati by Shri Rang Avadhoot Maharaj of Nareshwar · Shri Rang Avadhoot Maharaj (Pandurang Vitthal Valame), 1898–1968 · 20th century

श्री रंग अवधूत महाराज एक प्रसिद्ध दत्त-भक्त थे, जिन्होंने नर्मदा के तट पर नारेश्वर में अपना आश्रम स्थापित किया। भगवान् दत्तात्रेय के प्रति अपने प्रगाढ़ प्रेम के कारण उन्होंने दत्त बावनी की रचना की — सरल, उत्कट गुजराती में बावन चरण, जो दत्त को सर्वपालक, करुणामय अवधूत और त्रिमूर्ति के साक्षात् स्वरूप के रूप में पूर्ण शरणागति उँडेलते हैं। यह स्तोत्र भक्तों में शीघ्र फैल गया और अब विशेषतः गुजरात और महाराष्ट्र में असंख्य घरों और दत्त मन्दिरों में शरण, रक्षा तथा सद्गुरु की कृपा की प्रार्थना के रूप में प्रतिदिन पढ़ा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

दत्त परम्परा मानती है कि जहाँ कहीं श्रद्धापूर्वक दत्त बावनी का पाठ होता है, वहाँ भगवान् दत्त शीघ्र ही भक्त के संकटों को दूर करते हैं — श्री रंग अवधूत महाराज के असंख्य अनुयायी बताते हैं कि रोग, संकट या विपत्ति में इसके पाठ से अचानक राहत और रक्षा मिली, जो इस वचन को सत्य सिद्ध करता है कि दत्त 'शरण लेने वाले सबके तारणहार' हैं।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

श्लोक 1

जय योगीश्वर दत्त दयाळ। तुं एक जगमां प्रतिपाळ॥ अत्र्यनसूया करी निमित्त। प्रगट्यो जगकारण निश्चित्त॥

Jaya Yogishvara Datta Dayaal. Tun ja eka jagamaan pratipaal. Atryanasuyaa kari nimitta. Pragatyo jagakaarana nishchitta.

अर्थ:हे योगियों के स्वामी दत्त, दयालु! आपकी जय हो — इस जगत् में एकमात्र आप ही पालनकर्ता हैं। अत्रि और अनसूया को निमित्त बनाकर आप निश्चय ही जगत् के कारणरूप में प्रकट हुए।

श्लोक 2

ब्रह्महरिहरनो अवतार। शरणागतनो तारणहार॥ अंतर्यामी सत्चितसुख। बहार धरा बहुविध सुखदुःख॥

Brahma-Hari-Hara-no avataar. Sharanaagata-no taaranahaar. Antaryaami Sat-Chit-Sukha. Bahaar dharaa bahuvidha sukha-duhkha.

अर्थ:आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अवतार हैं, शरणागत के तारणहार हैं। अन्तर्यामी रूप में आप सत्-चित्-सुख हैं; बाहर आप अनेक प्रकार के सुख-दुःख धारण करते हैं।

श्लोक 3

वाडे घेर के रानमां। रहो छो चैतन्य रूपमां॥ सहाय करो सदा सर्व ठाम। अगणित रूपे अगणित नाम॥

Vaade gher ke raanamaan. Raho chho Chaitanya roopamaan. Sahaaya karo sadaa sarva thaam. Aganita roope aganita naam.

अर्थ:बगीचे में, घर में या वन में — आप चैतन्यरूप में विराजते हैं। आप सदा सर्वत्र सहायता करते हैं, अगणित रूपों और अगणित नामों से।

श्लोक 4

माता तुं ने पिता तुं ज। बंधु तुं ने सखा तुं ज॥ त्रिगुणातीत त्रिगुणस्वरूप। अकल अरूप ने बहुरूप॥

Maataa tun ne pitaa tun ja. Bandhu tun ne sakhaa tun ja. Trigunaateeta triguna-svaroopa. Akala aroopa ne bahuroopa.

अर्थ:आप ही माता और आप ही पिता हैं; आप ही बन्धु और आप ही सखा हैं। आप त्रिगुणातीत हैं फिर भी त्रिगुणस्वरूप हैं — अकल, अरूप और बहुरूप हैं।

श्लोक 5

तुज विण भटक्यो बहु बहु दूर। हवे चरणे राख्यो जरूर॥ प्रेमे पुकारुं दिनरात। दत्त दत्त बस एक वात॥

Tuja vina bhatakyo bahu bahu door. Have charane raakhyo jaroor. Preme pukaarun dinaraata. Datta Datta basa eka ja vaata.

अर्थ:आपके बिना मैं बहुत-बहुत दूर भटका; अब अवश्य मुझे अपने चरणों में रखिए। दिन-रात मैं प्रेम से पुकारता हूँ — 'दत्त, दत्त' — बस यही मेरी एक बात है।

श्लोक 6

वेद शास्त्र पुराण प्रमाण। तारक मंत्र दत्तप्रमाण॥ गुरु बिन ज्ञान को पावे। दत्तकृपा विण कळावे॥

Veda Shaastra Puraana pramaana. Taaraka mantra e Datta-pramaana. Guru bina jnaana na ko paave. Datta-kripaa vina na kalaave.

अर्थ:वेद, शास्त्र और पुराण प्रमाण हैं; तारक मंत्र दत्त के प्रमाण से ही है। गुरु के बिना कोई ज्ञान नहीं पाता, और दत्त की कृपा के बिना वह प्रकट नहीं होता।

श्लोक 7

जय जय कारुणिक अवधूत। तारक तरण त्रिगुणातीत॥ अनसूयात्मज दिगंबर। दत्त दिगंबर दत्त दिगंबर॥

Jaya jaya kaarunika Avadhoota. Taaraka tarana trigunaateeta. Anasuyaatmaja Digambara. Datta Digambara Datta Digambara.

अर्थ:करुणामय अवधूत की जय हो, जय हो — तारक, तारण और त्रिगुणातीत। हे अनसूयानन्दन दिगम्बर — दत्त दिगम्बर, दत्त दिगम्बर!

श्लोक 8

जय गिरनारी अवधूत। श्री गुरुदत्त दिगंबर सूत॥ भावे भजे जे नरनार। तेने तारे भवपार॥

Jaya Giranaari Avadhoota. Shri Gurudatta Digambara soota. Bhaave bhaje je nara-naara. Tene taare e bhavapaara.

अर्थ:गिरनार के अवधूत की जय हो, श्री गुरुदत्त दिगम्बर सुत की जय। जो नर-नारी भाव से उनका भजन करते हैं, उन्हें वे भवसागर से पार उतार देते हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

जय योगीश्वर दत्त🔊Jaya Yogishvara Dattaहे योगियों के स्वामी दत्त, आपकी जय हो
दयाळ🔊Dayaalदयालु — करुणामय
तुं ज एक जगमां प्रतिपाळ🔊Tun ja eka jagamaan pratipaalइस जगत् में एकमात्र आप ही पालनकर्ता हैं
अत्र्यनसूया करी निमित्त🔊Atryanasuyaa kari nimittaअत्रि और अनसूया को (अपने जन्म का) निमित्त बनाकर
प्रगट्यो जगकारण🔊Pragatyo jaga-kaaranaआप जगत् के कारणरूप में प्रकट हुए
ब्रह्महरिहरनो अवतार🔊Brahma-Hari-Hara-no avataarब्रह्मा, विष्णु (हरि) और शिव (हर) के अवतार
शरणागतनो तारणहार🔊Sharanaagata-no taaranahaarशरणागत सबके तारणहार
अंतर्यामी🔊Antaryaamiअन्तर्यामी — सबके भीतर निवास करने वाले अन्तर्यामी
सत्चितसुख🔊Sat-Chit-Sukhaसत्-चित्-सुख स्वरूप — सत्, चित् और आनन्दमय
रहो छो चैतन्य रूपमां🔊Raho chho Chaitanya roopamaanआप चैतन्यरूप में विराजते हैं (घर, बगीचे या वन में समान रूप से)
अगणित रूपे अगणित नाम🔊Aganita roope aganita naamअगणित रूपों में और अगणित नामों से
माता तुं ने पिता तुं ज🔊Maataa tun ne pitaa tun jaआप ही माता और आप ही पिता हैं
त्रिगुणातीत त्रिगुणस्वरूप🔊Trigunaateeta triguna-svaroopaत्रिगुणातीत होकर भी त्रिगुणस्वरूप
अकल अरूप ने बहुरूप🔊Akala aroopa ne bahuroopaअकल, अरूप फिर भी बहुरूप
तुज विण भटक्यो बहु बहु दूर🔊Tuja vina bhatakyo bahu bahu doorआपके बिना मैं बहुत-बहुत दूर भटका
हवे चरणे राख्यो जरूर🔊Have charane raakhyo jaroorअब अवश्य मुझे अपने चरणों में रखिए
तारक मंत्र ए दत्तप्रमाण🔊Taaraka mantra e Datta-pramaanaतारक मंत्र दत्त के अपने प्रमाण से सिद्ध है
गुरु बिन ज्ञान न को पावे🔊Guru bina jnaana na ko paaveगुरु के बिना कोई सच्चा ज्ञान नहीं पाता
जय जय कारुणिक अवधूत🔊Jaya jaya kaarunika Avadhootaकरुणामय अवधूत की जय, जय
अनसूयात्मज दिगंबर🔊Anasuyaatmaja Digambaraहे अनसूयानन्दन दिगम्बर
दत्त दिगंबर दत्त दिगंबर🔊Datta Digambara Datta Digambaraदत्त दिगम्बर, दत्त दिगम्बर (दत्त परम्परा का महान् ध्रुवपद)
जय गिरनारी अवधूत🔊Jaya Giranaari Avadhootaगिरनार के अवधूत की जय

दत्त बावनी पाठ के लाभ

भगवान् दत्तात्रेय को 'शरणागत के तारणहार' रूप में आवाहित करता है — जो शरण लेने वालों के निश्चित उद्धारक हैं

परम्परागत रूप से संकट, भय और विघ्नों को दूर करने तथा दत्त की रक्षा पाने के लिए पढ़ा जाता है

एक ही दत्त रूप में संयुक्त त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की उपासना करता है — सम्पूर्ण भक्ति

पूर्ण शरणागति और 'दत्त' नाम के व्याकुल जप का भाव जगाता है

माना जाता है कि यह भक्त के जीवन में सद्गुरु की कृपा और मार्गदर्शन लाता है

दत्तभक्त प्रतिदिन मन की शान्ति, साहस और विपत्ति में स्थिरता के लिए इसका पाठ करते हैं

गुरुवार और दत्त जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पर विशेष रूप से प्रभावशाली

दत्त बावनी जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयगुरुवार, दत्त जयन्ती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा), तथा प्रतिदिन प्रातः या सायंकाल

भगवान् दत्तात्रेय की मूर्ति के समक्ष, यथासम्भव स्नान के पश्चात बैठें और दीपक जलाएँ। 'दत्त दिगम्बर दत्त दिगम्बर' ध्रुवपद पर मन टिकाते हुए भाव और पूर्ण शरणागति से दत्त बावनी का पाठ करें। अनेक भक्त इसे प्रतिदिन पढ़ने का व्रत रखते हैं, अथवा संकट में 11/21 बार पढ़ते हैं; रंग अवधूत परम्परा में इसे बावन चरणों की एक अखण्ड प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है। अन्त में प्रणाम कर दत्त से अपने चरणों में रखने की प्रार्थना करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दत्त बावनी भगवान् दत्तात्रेय को समर्पित बावन (बावनी = 52) चरणों का एक भक्ति-स्तोत्र है, जिसकी रचना नारेश्वर के श्री रंग अवधूत महाराज ने गुजराती में की। यह दत्त को करुणामय अवधूत और ब्रह्मा, विष्णु व शिव के एकत्व के रूप में महिमामंडित करता है, और उनकी शरण व कृपा की प्रार्थना करता है।
इसकी रचना बीसवीं शताब्दी के संत गुजरात के नारेश्वर के श्री रंग अवधूत महाराज (पाण्डुरंग विट्ठल वालमे) ने की, जो भगवान् दत्तात्रेय के महान् भक्त थे। तब से यह गुजरात और महाराष्ट्र में सबसे अधिक गाए जाने वाले दत्त स्तोत्रों में से एक बन गया है।
भक्त इसे रक्षा, संकट व भय के निवारण और गुरुकृपा के लिए पढ़ते हैं। यह दत्त के प्रति पूर्ण शरणागति जगाता है और विशेषतः विपत्ति के समय, गुरुवार तथा दत्त जयन्ती को इसका पाठ किया जाता है।
गुरु के दिन गुरुवार को और दत्त जयन्ती (मार्गशीर्ष की पूर्णिमा) को यह सर्वाधिक शुभ है। अनेक भक्त इसे भगवान् दत्तात्रेय की प्रातः या सायंकालीन प्रार्थना के रूप में प्रतिदिन पढ़ते हैं।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides