आयुः कर्म च वित्तं च — Word-by-Word Meaning
आयुः कर्म च वित्तं च
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
आयुः
āyuḥ
आयु, जीवन की अवधि
कर्म
karma
अपने कर्म / नियत कार्य एवं वृत्ति
च
ca
और
वित्तम्
vittam
धन, भौतिक सम्पत्ति
विद्या
vidyā
विद्या, ज्ञान, शिक्षा
निधनम्
nidhanam
मृत्यु, अन्त का समय एवं प्रकार
एव च
eva ca
और (बलपूर्वक) — निश्चय ही भी
पञ्च
pañca
पाँच
एतानि
etāni
ये (बातें)
हि
hi
निश्चय ही, क्योंकि (बल देने वाला/व्याख्यात्मक अव्यय)
सृज्यन्ते
sṛjyante
रचे जाते हैं, निश्चित किए जाते हैं, नियत होते हैं
गर्भस्थस्य
garbhasthasya
गर्भ में स्थित जीव के
एव
eva
केवल, ही (बलपूर्वक)
देहिनः
dehinaḥ
देहधारी जीव के, प्राणी के
Complete Translation
आयु, कर्म (नियत कार्य), धन, विद्या और मृत्यु — ये पाँचों बातें जीव के गर्भ में रहते ही निश्चित हो जाती हैं। चाणक्य सिखाते हैं कि जीवन की मूल रूपरेखा जन्म से पहले ही तय हो जाती है, इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति न तो सौभाग्य पर अभिमान करता है और न ही नियत बातों की चिन्ता में टूटता है।
Origin & History
Source: Chanakya Niti
Author: Chanakya (Vishnugupta / Kautilya)
Period: Ancient India (c. 4th–3rd century BCE)
चाणक्य, वह रणनीतिकार एवं मन्त्री जिन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना में सहायता की, ने नीति, समृद्धि एवं जीवन-आचरण पर संक्षिप्त नीति-श्लोक संकलित किए। उनके प्रथम अध्याय का यह श्लोक एक आधारभूत स्वर स्थापित करता है: आयु, कर्म, धन, विद्या एवं मृत्यु को जन्म से पूर्व निश्चित घोषित करके, वे मानव-प्रयास को नियति की स्वीकार्यता के भीतर रखते हैं, और साधक को शान्त, विनम्र एवं भय-मुक्त रहना सिखाते हैं।
Frequently Asked Questions
'आयुः कर्म च वित्तं च' कहाँ से लिया गया है?▼
यह चाणक्य नीति (निति दर्पण भी कहा जाता है) के प्रथम अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक है, जो नीति एवं राजनीति के प्राचीन आचार्य चाणक्य (कौटिल्य / विष्णुगुप्त) को आरोपित सूक्तियों का संग्रह है।
इस श्लोक के अनुसार जन्म से पूर्व निश्चित पाँच बातें कौन-सी हैं?▼
आयु (जीवन की अवधि), कर्म (नियत कार्य एवं वृत्ति), वित्त (धन), विद्या (ज्ञान), और निधन (मृत्यु का समय एवं प्रकार)। चाणक्य कहते हैं कि ये पाँचों बातें जीव के गर्भ में रहते ही निश्चित हो जाती हैं।
क्या यह श्लोक भाग्यवाद या आलस्य सिखाता है?▼
नहीं। चाणक्य अन्यत्र उद्यम (परिश्रम) की प्रबल प्रशंसा करते हैं। यह श्लोक उस बात की स्वीकार्यता सिखाता है जो वश में नहीं, ताकि मन लोभ एवं भय से मुक्त रहे; इसका उद्देश्य चिन्ता हटाना है, परिश्रम नहीं। व्यक्ति फिर भी परिश्रमपूर्वक कर्म करता है, किन्तु नियत परिणामों पर टूटे बिना।
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