बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् PDF
बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
ॐ भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावनः। क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्॥१॥
Om Bhairavo Bhutanathascha Bhutatma Bhutabhavanah। Kshetrajnah Kshetrapalascha Kshetradah Kshatriyo Virat॥1॥
ॐ। वे भैरव हैं, भूतों के नाथ, भूतों के आत्मा, भूतों के पालक; क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपाल, क्षेत्रद, क्षत्रिय और विराट् हैं।
श्मशानवासी मांसाशी खर्पराशी स्मरान्तकृत्। रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धिसेवितः॥२॥
Shmashana-Vasi Mamsashi Kharparashi Smarantakrit। Raktapah Panapah Siddhah Siddhidah Siddhi-Sevitah॥2॥
श्मशानवासी, मांसाशी, खर्पर (कपाल) धारण करने वाले, कामदेव के अन्तक; रक्तप, पानप, सिद्ध, सिद्धिदाता और सिद्धियों से सेवित।
कङ्कालः कालशमनः कलाकाष्ठातनुः कविः। त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिङ्गललोचनः॥३॥
Kankalah Kala-Shamanah Kala-Kashtha-Tanuh Kavih। Trinetro Bahunetrascha Tatha Pingala-Lochanah॥3॥
कंकाल-रूप, काल को शान्त करने वाले, कला-काष्ठा रूपी शरीर वाले, कवि; त्रिनेत्र, बहुनेत्र और पिंगल नेत्रों वाले।
शूलपाणिः खड्गपाणिः कङ्काली धूम्रलोचनः। अभीरुर्भैरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः॥४॥
Shulapanih Khadgapanih Kankali Dhumra-Lochanah। Abhirur-Bhairavi-Natho Bhutapo Yogini-Patih॥4॥
हाथ में त्रिशूल और खड्ग धारण करने वाले, कंकाली, धूम्रलोचन; निर्भय भैरवीनाथ, भूतपालक, योगिनीपति।
धनदोऽधनहारी च धनवान् प्रतिभागवान्। नागहारो नागकेशो व्योमकेशः कपालभृत्॥५॥
Dhanado'dhana-Hari Cha Dhanavan Pratibhagavan। Nagaharo Nagakesho Vyomakeshah Kapalabhrit॥5॥
धन देने वाले और (अपात्र से) धन हरने वाले, धनवान्, प्रतिभावान्; नागों के हार और केश वाले, व्योमकेश, कपालधारी।
कालः कपालमाली च कमनीयः कलानिधिः। त्रिनेत्रो ज्वलन्नेत्रश्च त्रिशिखी च त्रिलोकभृत्॥६॥
Kalah Kapalamali Cha Kamaniyah Kalanidhih। Trinetro Jvalannetrascha Trishikhi Cha Trilokabhrit॥6॥
काल-स्वरूप, कपालमाली, कमनीय, कलानिधि; त्रिनेत्र, ज्वलन्नेत्र, त्रिशिखी और तीनों लोकों के धारक।
त्रिवृत्ततनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रियः। बटुको बटुवेषश्च खट्वाङ्गवरधारकः॥७॥
Trivritta-Tanayo Dimbhah Shantah Shanta-Janapriyah। Batuko Batuveshascha Khatvanga-Varadharakah॥7॥
त्रिवृत्त से उत्पन्न, डिम्भ (बालक), शान्त, शान्तजनों के प्रिय; बटुक, बटु-वेषधारी, खट्वांग-वरधारक।
भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः। धूर्तो दिगम्बरः शौरिर्हरिणः पाण्डुलोचनः॥८॥
Bhutadhyakshah Pashupatir-Bhikshukah Paricharakah। Dhurto Digambarah Shaurir-Harinah Pandu-Lochanah॥8॥
भूताध्यक्ष, पशुपति, भिक्षुक, परिचारक; धूर्त, दिगम्बर, शूर, हरिण-समान, पाण्डुलोचन।
प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शङ्करप्रियबान्धवः। अष्टमूर्तिर्निधीशश्च ज्ञानचक्षुस्तपोमयः॥९॥
Prashantah Shantidah Shuddhah Shankara-Priya-Bandhavah। Ashtamurtir-Nidhishascha Jnana-Chakshus-Tapomayah॥9॥
प्रशान्त, शान्तिदाता, शुद्ध, शंकर के प्रियबन्धु; अष्टमूर्ति, निधीश, ज्ञानचक्षु, तपोमय।
अष्टाधारः षडाधारः सर्पयुक्तः शिखीसखः। भूधरो भूधराधीशो भूपतिर्भूधरात्मजः॥१०॥
Ashtadharah Shadadharah Sarpa-Yuktah Shikhi-Sakhah। Bhudharo Bhudharadhisho Bhupatir-Bhudharatmajah॥10॥
अष्टाधार, षडाधार, सर्पयुक्त, शिखी (अग्नि) के सखा; भूधर, भूधराधीश, भूपति, भूधरात्मज।
कपालधारी मुण्डी च नागयज्ञोपवीतवान्। जृम्भणो मोहनः स्तम्भी मारणः क्षोभणस्तथा॥११॥
Kapaladhari Mundi Cha Naga-Yajnopavitavan। Jrimbhano Mohanah Stambhi Maranah Kshobhanas-Tatha॥11॥
कपालधारी, मुण्डी, नाग का यज्ञोपवीत धारण करने वाले; जृम्भण, मोहन, स्तम्भन, मारण और क्षोभण (शक्तियों के स्वामी)।
शुद्धनीलाञ्जनप्रख्यदेहो मुण्डविभूषणः। बलिभुग् बलिभुङ्नाथो बालो बालपराक्रमः॥१२॥
Shuddha-Nilanjana-Prakhya-Deho Munda-Vibhushanah। Balibhug Balibhung-Natho Balo Bala-Parakramah॥12॥
शुद्ध नीलाञ्जन-समान देह वाले, मुण्डविभूषित; बलिभुक्, बलिभुक्-नाथ, बाल और बाल-पराक्रमी।
सर्वापत्तारणो दुर्गो दुष्टभूतनिषेवितः। कामी कलानिधिः कान्तः कामिनीवशकृद्वशी॥१३॥
Sarvapat-Tarano Durgo Dushta-Bhuta-Nishevitah। Kami Kalanidhih Kantah Kamini-Vashakrid-Vashi॥13॥
समस्त आपत्तियों से तारने वाले, दुर्ग (दुर्गम), दुष्ट भूतों से सेवित; कामी, कलानिधि, कान्त, कामिनियों को वश में करने वाले, वशी।
जगद्रक्षाकरोऽनन्तो मायामन्त्रौषधीमयः। सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुरितीव हि॥१४॥
Jagad-Rakshakaro'nanto Maya-Mantraushadhi-Mayah। Sarva-Siddhiprado Vaidyah Prabhavishnur-Itiva Hi॥14॥
जगत् की रक्षा करने वाले, अनन्त, माया-मन्त्र-औषधिमय; सर्वसिद्धिप्रद, वैद्य, प्रभविष्णु — ऐसे वे हैं।
य इदं पठते स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम्। न तस्य दुरितं किञ्चिन्न च भूतभयं तथा॥१५॥
Ya Idam Pathate Stotram Namashtashatam-Uttamam। Na Tasya Duritam Kinchin-Na Cha Bhutabhayam Tatha॥15॥
जो इस उत्तम अष्टोत्तरशत (१०८) नाम स्तोत्र का पाठ करता है, उसे कोई पाप नहीं रहता और न ही भूतों का भय रहता है।
न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित् प्राप्नुयान्मानवः क्वचित्। पातकेभ्यो भयं नैव पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः॥१६॥
Na Shatrubhyo Bhayam Kinchit Prapnuyan-Manavah Kvachit। Patakebhyo Bhayam Naiva Pathet Stotram-Atah Sudhih॥16॥
न उसे शत्रुओं से कोई भय होता है, न पापों से भय; अतः बुद्धिमान् को यह स्तोत्र अवश्य पढ़ना चाहिए।