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बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 भैरव अष्टमी, कालाष्टमी (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), रविवार या मंगलवार की रात्रि, तथा सायंकालीन (प्रदोष) पूजा के समय·📜 Tantric Shaiva tradition (Batuka Bhairava Ashtottara Shatanama Stotram, associated with the Bhairava / Rudrayamala tantric texts)

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अर्थ

बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् बटुक भैरव — भगवान शिव के बाल (बटुक) किन्तु उग्र रूप — के १०८ नामों की प्रवाहमयी स्तुति है, जिसकी तान्त्रिक परम्परा में विशेष उपासना होती है। 'ॐ भैरवो भूतनाथश्च' से आरम्भ होकर श्लोक उनके नामों — क्षेत्रपाल रक्षक, त्रिशूल-खड्गधारी श्मशानवासी, समस्त आपत्तियों से तारने वाले सर्वापत्तारण — को पिरोते हैं, और अन्त की फलश्रुति वचन देती है कि इसका पाठक भूत, शत्रु और पाप के समस्त भय से मुक्त हो जाता है। यह रक्षा हेतु अत्यन्त प्रसिद्ध भैरव स्तोत्रों में से एक है।

उत्पत्ति और कथा

Tantric Shaiva tradition (Batuka Bhairava Ashtottara Shatanama Stotram, associated with the Bhairava / Rudrayamala tantric texts) · Traditional (tantric Shaiva tradition) · Classical / medieval

बटुक भैरव की वन्दना भैरव — शिव के भयंकर किन्तु रक्षक स्वरूप — के बाल-रूप के रूप में होती है। तान्त्रिक परम्परा में वे एक रक्षक देवता (क्षेत्रपाल) हैं, जिनका आवाहन शीघ्र रक्षा एवं साधना की सिद्धि हेतु होता है। यह १०८-नाम स्तुति उनके अनेक रूपों — उग्र एवं सौम्य, श्मशानवासी तपस्वी तथा धन एवं ज्ञान के दाता — को एक प्रवाहमयी स्तुति में पिरोती है, जो भक्त के लिए निर्भयता के वचन से सील है।

शास्त्रों में वर्णित

अपनी ही फलश्रुति द्वारा यह स्तोत्र घोषित करता है कि जो इन १०८ नामों का पाठ करता है, उसे कोई अनिष्ट नहीं छूता और न भूतों, शत्रुओं या पापों का भय रहता है। बटुक भैरव के भक्त बताते हैं कि सच्चे पाठ ने, विशेषतः भैरव के आपदुद्धारक (संकट-निवारक) आवाहन ने, उन्हें गम्भीर संकट के क्षणों में सुरक्षित रखा एवं अदृश्य कष्टों को विलीन कर दिया है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावनः। क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्॥१॥

Om Bhairavo Bhutanathascha Bhutatma Bhutabhavanah। Kshetrajnah Kshetrapalascha Kshetradah Kshatriyo Virat॥1॥

अर्थ:ॐ। वे भैरव हैं, भूतों के नाथ, भूतों के आत्मा, भूतों के पालक; क्षेत्रज्ञ, क्षेत्रपाल, क्षेत्रद, क्षत्रिय और विराट् हैं।

श्लोक 2

श्मशानवासी मांसाशी खर्पराशी स्मरान्तकृत्। रक्तपः पानपः सिद्धः सिद्धिदः सिद्धिसेवितः॥२॥

Shmashana-Vasi Mamsashi Kharparashi Smarantakrit। Raktapah Panapah Siddhah Siddhidah Siddhi-Sevitah॥2॥

अर्थ:श्मशानवासी, मांसाशी, खर्पर (कपाल) धारण करने वाले, कामदेव के अन्तक; रक्तप, पानप, सिद्ध, सिद्धिदाता और सिद्धियों से सेवित।

श्लोक 3

कङ्कालः कालशमनः कलाकाष्ठातनुः कविः। त्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च तथा पिङ्गललोचनः॥३॥

Kankalah Kala-Shamanah Kala-Kashtha-Tanuh Kavih। Trinetro Bahunetrascha Tatha Pingala-Lochanah॥3॥

अर्थ:कंकाल-रूप, काल को शान्त करने वाले, कला-काष्ठा रूपी शरीर वाले, कवि; त्रिनेत्र, बहुनेत्र और पिंगल नेत्रों वाले।

श्लोक 4

शूलपाणिः खड्गपाणिः कङ्काली धूम्रलोचनः। अभीरुर्भैरवीनाथो भूतपो योगिनीपतिः॥४॥

Shulapanih Khadgapanih Kankali Dhumra-Lochanah। Abhirur-Bhairavi-Natho Bhutapo Yogini-Patih॥4॥

अर्थ:हाथ में त्रिशूल और खड्ग धारण करने वाले, कंकाली, धूम्रलोचन; निर्भय भैरवीनाथ, भूतपालक, योगिनीपति।

श्लोक 5

धनदोऽधनहारी धनवान् प्रतिभागवान्। नागहारो नागकेशो व्योमकेशः कपालभृत्॥५॥

Dhanado'dhana-Hari Cha Dhanavan Pratibhagavan। Nagaharo Nagakesho Vyomakeshah Kapalabhrit॥5॥

अर्थ:धन देने वाले और (अपात्र से) धन हरने वाले, धनवान्, प्रतिभावान्; नागों के हार और केश वाले, व्योमकेश, कपालधारी।

श्लोक 6

कालः कपालमाली कमनीयः कलानिधिः। त्रिनेत्रो ज्वलन्नेत्रश्च त्रिशिखी त्रिलोकभृत्॥६॥

Kalah Kapalamali Cha Kamaniyah Kalanidhih। Trinetro Jvalannetrascha Trishikhi Cha Trilokabhrit॥6॥

अर्थ:काल-स्वरूप, कपालमाली, कमनीय, कलानिधि; त्रिनेत्र, ज्वलन्नेत्र, त्रिशिखी और तीनों लोकों के धारक।

श्लोक 7

त्रिवृत्ततनयो डिम्भः शान्तः शान्तजनप्रियः। बटुको बटुवेषश्च खट्वाङ्गवरधारकः॥७॥

Trivritta-Tanayo Dimbhah Shantah Shanta-Janapriyah। Batuko Batuveshascha Khatvanga-Varadharakah॥7॥

अर्थ:त्रिवृत्त से उत्पन्न, डिम्भ (बालक), शान्त, शान्तजनों के प्रिय; बटुक, बटु-वेषधारी, खट्वांग-वरधारक।

श्लोक 8

भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः। धूर्तो दिगम्बरः शौरिर्हरिणः पाण्डुलोचनः॥८॥

Bhutadhyakshah Pashupatir-Bhikshukah Paricharakah। Dhurto Digambarah Shaurir-Harinah Pandu-Lochanah॥8॥

अर्थ:भूताध्यक्ष, पशुपति, भिक्षुक, परिचारक; धूर्त, दिगम्बर, शूर, हरिण-समान, पाण्डुलोचन।

श्लोक 9

प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शङ्करप्रियबान्धवः। अष्टमूर्तिर्निधीशश्च ज्ञानचक्षुस्तपोमयः॥९॥

Prashantah Shantidah Shuddhah Shankara-Priya-Bandhavah। Ashtamurtir-Nidhishascha Jnana-Chakshus-Tapomayah॥9॥

अर्थ:प्रशान्त, शान्तिदाता, शुद्ध, शंकर के प्रियबन्धु; अष्टमूर्ति, निधीश, ज्ञानचक्षु, तपोमय।

श्लोक 10

अष्टाधारः षडाधारः सर्पयुक्तः शिखीसखः। भूधरो भूधराधीशो भूपतिर्भूधरात्मजः॥१०॥

Ashtadharah Shadadharah Sarpa-Yuktah Shikhi-Sakhah। Bhudharo Bhudharadhisho Bhupatir-Bhudharatmajah॥10॥

अर्थ:अष्टाधार, षडाधार, सर्पयुक्त, शिखी (अग्नि) के सखा; भूधर, भूधराधीश, भूपति, भूधरात्मज।

श्लोक 11

कपालधारी मुण्डी नागयज्ञोपवीतवान्। जृम्भणो मोहनः स्तम्भी मारणः क्षोभणस्तथा॥११॥

Kapaladhari Mundi Cha Naga-Yajnopavitavan। Jrimbhano Mohanah Stambhi Maranah Kshobhanas-Tatha॥11॥

अर्थ:कपालधारी, मुण्डी, नाग का यज्ञोपवीत धारण करने वाले; जृम्भण, मोहन, स्तम्भन, मारण और क्षोभण (शक्तियों के स्वामी)।

श्लोक 12

शुद्धनीलाञ्जनप्रख्यदेहो मुण्डविभूषणः। बलिभुग् बलिभुङ्नाथो बालो बालपराक्रमः॥१२॥

Shuddha-Nilanjana-Prakhya-Deho Munda-Vibhushanah। Balibhug Balibhung-Natho Balo Bala-Parakramah॥12॥

अर्थ:शुद्ध नीलाञ्जन-समान देह वाले, मुण्डविभूषित; बलिभुक्, बलिभुक्-नाथ, बाल और बाल-पराक्रमी।

श्लोक 13

सर्वापत्तारणो दुर्गो दुष्टभूतनिषेवितः। कामी कलानिधिः कान्तः कामिनीवशकृद्वशी॥१३॥

Sarvapat-Tarano Durgo Dushta-Bhuta-Nishevitah। Kami Kalanidhih Kantah Kamini-Vashakrid-Vashi॥13॥

अर्थ:समस्त आपत्तियों से तारने वाले, दुर्ग (दुर्गम), दुष्ट भूतों से सेवित; कामी, कलानिधि, कान्त, कामिनियों को वश में करने वाले, वशी।

श्लोक 14

जगद्रक्षाकरोऽनन्तो मायामन्त्रौषधीमयः। सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः प्रभविष्णुरितीव हि॥१४॥

Jagad-Rakshakaro'nanto Maya-Mantraushadhi-Mayah। Sarva-Siddhiprado Vaidyah Prabhavishnur-Itiva Hi॥14॥

अर्थ:जगत् की रक्षा करने वाले, अनन्त, माया-मन्त्र-औषधिमय; सर्वसिद्धिप्रद, वैद्य, प्रभविष्णु — ऐसे वे हैं।

श्लोक 15

इदं पठते स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम्। तस्य दुरितं किञ्चिन्न भूतभयं तथा॥१५॥

Ya Idam Pathate Stotram Namashtashatam-Uttamam। Na Tasya Duritam Kinchin-Na Cha Bhutabhayam Tatha॥15॥

अर्थ:जो इस उत्तम अष्टोत्तरशत (१०८) नाम स्तोत्र का पाठ करता है, उसे कोई पाप नहीं रहता और न ही भूतों का भय रहता है।

श्लोक 16

शत्रुभ्यो भयं किञ्चित् प्राप्नुयान्मानवः क्वचित्। पातकेभ्यो भयं नैव पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः॥१६॥

Na Shatrubhyo Bhayam Kinchit Prapnuyan-Manavah Kvachit। Patakebhyo Bhayam Naiva Pathet Stotram-Atah Sudhih॥16॥

अर्थ:न उसे शत्रुओं से कोई भय होता है, न पापों से भय; अतः बुद्धिमान् को यह स्तोत्र अवश्य पढ़ना चाहिए।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

भैरवः🔊Bhairavahभैरव — शिव का उग्र रूप ('जो भय उत्पन्न करते भी हैं और भय हरते भी हैं')
भूतनाथः🔊Bhutanathahभूतनाथ — समस्त प्राणियों एवं भूतगणों (प्रेत-समूहों) के स्वामी
भूतभावनः🔊Bhutabhavanahभूतभावन — समस्त सृष्ट प्राणियों के पालक एवं हितैषी
क्षेत्रपालः🔊Kshetrapalahक्षेत्रपाल — पवित्र क्षेत्र/स्थान के रक्षक
श्मशानवासी🔊Shmashana-Vasiश्मशानवासी — जो श्मशान में निवास करते हैं
स्मरान्तकृत्🔊Smarantakritस्मरान्तकृत् — जिन्होंने स्मर (कामदेव) का अन्त किया
सिद्धिदः🔊Siddhidahसिद्धिद — आध्यात्मिक सिद्धियों के दाता
त्रिनेत्रः🔊Trinetrahत्रिनेत्र — तीन नेत्रों वाले
पिङ्गललोचनः🔊Pingala-Lochanahपिंगललोचन — पिंगल (तपे) अग्निमय नेत्रों वाले
शूलपाणिः खड्गपाणिः🔊Shulapanih Khadgapanihशूलपाणि-खड्गपाणि — एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में खड्ग धारण किए
योगिनीपतिः🔊Yogini-Patihयोगिनीपति — योगिनियों के स्वामी
धनदः🔊Dhanadahधनद — धन के दाता
व्योमकेशः🔊Vyomakeshahव्योमकेश — जिनके केश आकाश (अन्तरिक्ष) में फैले हैं
कपालभृत्🔊Kapalabhritकपालभृत् — कपाल (खप्पर) धारण करने वाले
कपालमाली🔊Kapalamaliकपालमाली — कपालों की माला पहने हुए
बटुकः बटुवेषः🔊Batukah Batuveshahबटुक-बटुवेष — युवा बालक (बटुक) रूप एवं वेष में
खट्वाङ्गवरधारकः🔊Khatvanga-Varadharakahखट्वांग-वरधारक — खट्वांग (कपाल-दण्ड) धारण करने वाले
पशुपतिः🔊Pashupatihपशुपति — समस्त प्राणियों के स्वामी
शङ्करप्रियबान्धवः🔊Shankara-Priya-Bandhavahशंकरप्रियबान्धव — शंकर (शिव) के प्रिय बन्धु/सखा
ज्ञानचक्षुः🔊Jnana-Chakshuhज्ञानचक्षु — जो ज्ञान के नेत्र हैं (विवेक से देखते हैं)
सर्वापत्तारणः🔊Sarvapat-Taranahसर्वापत्तारण — समस्त आपत्तियों एवं संकटों से तारने वाले — मुख्य रक्षक नाम
दुष्टभूतनिषेवितः🔊Dushta-Bhuta-Nishevitahदुष्टभूतनिषेवित — दुष्ट भूतों द्वारा भी सेवित (एवं नियन्त्रित)
जगद्रक्षाकरः🔊Jagad-Rakshakarahजगद्रक्षाकर — सम्पूर्ण जगत् के रक्षक
सर्वसिद्धिप्रदो वैद्यः🔊Sarva-Siddhiprado Vaidyahसर्वसिद्धिप्रद-वैद्य — समस्त सिद्धियों के दाता एवं दिव्य वैद्य (आरोग्यकर्ता)
य इदं पठते स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम्🔊Ya Idam Pathate Stotram Namashtashatam-Uttamamजो इस उत्तम अष्टोत्तरशत (१०८) नाम स्तोत्र का पाठ करता है (फलश्रुति का आरम्भ)

बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् पाठ के लाभ

बटुक भैरव का सर्वापत्तारण — समस्त आपत्तियों एवं संकटों से तारने वाले — रूप में आवाहन करता है

फलश्रुति भूतों (भूत-भय), शत्रुओं एवं पापों के समस्त भय से मुक्ति का वचन देती है

परम्परागत रूप से शक्तिशाली रक्षा हेतु, विशेषतः नकारात्मक ऊर्जाओं एवं अभिचार (काले जादू) के विरुद्ध पढ़ा जाता है

विघ्नों को दूर करता है और सिद्धियाँ प्रदान करने वाला माना जाता है (स्तोत्र उन्हें सिद्धिद कहता है)

भैरव को वैद्य, दिव्य चिकित्सक, के रूप में पुकारता है — कष्ट से मुक्ति हेतु जपा जाता है

रक्षक भैरव के १०८ नामों एवं रूपों का सम्पूर्ण ध्यान, जो भक्ति एवं निर्भयता को गहरा करता है

बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयभैरव अष्टमी, कालाष्टमी (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), रविवार या मंगलवार की रात्रि, तथा सायंकालीन (प्रदोष) पूजा के समय

यह एक तान्त्रिक नामस्तोत्र है। दक्षिण (भैरव की दिशा) की ओर मुख कर बैठें, दीप जलाएँ (सरसों का तेल परम्परागत है) और जहाँ प्रचलित हो, भैरव के साथ रहने वाले श्वान को अर्पित करें। 'ॐ भैरवो भूतनाथश्च' से अन्त तक १०८ नामों को प्रवाहपूर्वक पढ़ें, फिर फलश्रुति श्लोक। इसे प्रतिदिन एक बार पढ़ा जा सकता है; भैरव अष्टमी एवं कालाष्टमी को बार-बार पाठ विशेष फलदायी है। उग्र रूप के निकट श्रद्धा एवं स्वच्छ, सात्त्विक मन से जाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बटुक भैरव भगवान शिव के वे रूप हैं जिनकी उपासना एक युवा बालक (बटुक का अर्थ 'बालक') के रूप में होती है, जो एक साथ सौम्य एवं अत्यन्त रक्षक हैं। वे तान्त्रिक परम्परा के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भैरव-रूपों में से एक हैं, जिनका आवाहन एक शीघ्र रक्षक के रूप में होता है जो भक्तों को संकट से उबारते एवं आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्रदान करते हैं।
यह बटुक भैरव के १०८ नामों (अष्टोत्तर-शत-नाम) की अनुष्टुप् छन्द में प्रवाहमयी स्तुति है, जो 'ॐ भैरवो भूतनाथश्च भूतात्मा भूतभावनः' से आरम्भ होती है। नामावली (जो प्रत्येक नाम को 'ॐ... नमः' सहित गिनाती है) के विपरीत, यह एक सतत स्तोत्र है, जो अन्त में अपने फलों का वर्णन करने वाले फलश्रुति श्लोकों से समाप्त होता है।
इसके अपने अन्तिम श्लोक घोषित करते हैं कि इसके पाठक पर कोई अनिष्ट नहीं आता और न भूतों, शत्रुओं या पापों का भय रहता है। इसे प्रबल रक्षा, विघ्नों एवं संकटों के निवारण (सर्वापत्तारण), आरोग्य (भैरव वैद्य रूप में) तथा सिद्धियों की कृपा (सिद्धिद) हेतु जपा जाता है।
इसे भैरव अष्टमी एवं कालाष्टमी को, तथा रविवार या मंगलवार की रात्रि में, दक्षिण की ओर मुख कर दीप के समक्ष जपना सर्वोत्तम है। उग्र-देवता का तान्त्रिक स्तोत्र होने से इसे श्रद्धा, स्वच्छता एवं भक्ति सहित पढ़ना चाहिए। आरम्भकर्ता इसे केवल शिव-भैरव से रक्षा की हार्दिक प्रार्थना के रूप में भी जप सकते हैं।

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