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श्रीमद्भगवद्गीता १.१ — धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता १.१ — धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

धृतराष्ट्रः उवाच
dhṛitarāśhtraḥ uvācha
धृतराष्ट्र ने कहा
धर्मक्षेत्रे
dharma-kṣhetre
धर्म की भूमि
कुरुक्षेत्रे
kuru-kṣhetre
कुरुक्षेत्र में
समवेताः
samavetāḥ
एकत्र हुए
युयुत्सवः
yuyutsavaḥ
युद्ध की इच्छा रखने वाले
मामकाः
māmakāḥ
मेरे पुत्र
पाण्डवाः
pāṇḍavāḥ
पाण्डु के पुत्र
cha
और
एव
eva
निश्चय ही
किम्
kim
क्या
अकुर्वत
akurvata
उन्होंने किया
सञ्जय
sañjaya
हे संजय

Complete Translation

धृतराष्ट्र ने कहा -- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए युद्ध के इच्छुक (युयुत्सव:) मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 1

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

भगवद्गीता का आरम्भ प्रथम अध्याय 'अर्जुन विषाद योग' से होता है। जब महायुद्ध आरम्भ होने को है, नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र, जो स्वयं रणभूमि नहीं देख सकते, अपने सारथी संजय से — जिन्हें व्यास ने दूरदर्शी दृष्टि प्रदान की थी — कुरुक्षेत्र की घटनाओं का वर्णन करने को कहते हैं। उनके ये प्रथम शब्द ही सम्पूर्ण गीता का आरम्भ बन जाते हैं।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता का पहला श्लोक कौन कहता है?
नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र आरम्भिक श्लोक कहते हैं। वे अपने मंत्री संजय से, जिन्हें वेद व्यास ने दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, पूछते हैं कि कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर उनके पुत्रों (कौरवों) और पाण्डवों के बीच क्या हो रहा है।
कुरुक्षेत्र को 'धर्मक्षेत्र' क्यों कहा गया है?
कुरुक्षेत्र को 'धर्म की भूमि' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एक पवित्र तीर्थभूमि थी और वहाँ लड़ा गया युद्ध मूल रूप से धर्म के लिए संघर्ष था। टीकाकार यह भी कहते हैं कि पवित्र भूमि पर होने से अधर्म की ओर झुके हुए मनुष्यों में भी स्वाभाविक रूप से धर्म जाग उठता है।
गीता का आरम्भ धृतराष्ट्र के प्रश्न से क्यों होता है?
धृतराष्ट्र के व्याकुल प्रश्न से आरम्भ होने पर तुरन्त उनकी अपने पुत्रों के प्रति आसक्ति प्रकट हो जाती है ('मेरे पुत्र' बनाम 'पाण्डु के पुत्र')। यह सूक्ष्म पक्षपात महाकाव्य के नैतिक तनाव की भूमिका रचता है और श्रोता को उस संवाद की ओर खींच लेता है जो आगे गीता बनता है।
यह श्लोक महत्वपूर्ण क्यों है जबकि इसे कृष्ण नहीं कहते?
हाँ। आरम्भिक श्लोक होने के कारण यह सम्पूर्ण दृश्य की भूमिका रचता है और परम्परागत रूप से गीता के किसी भी सम्पूर्ण पाठ के आरम्भ में पढ़ा जाता है। यह कृष्ण के उपदेश से पहले कुरुक्षेत्र का परिवेश और वक्ताओं के सम्बन्ध को स्थापित करता है।

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