श्रीमद्भगवद्गीता १.१ — धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे
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✦ अर्थ
यह भगवद्गीता का सर्वप्रथम श्लोक है, जिसे नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र अपने मंत्री-सारथी संजय से कहते हैं। वे पूछते हैं कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए उनके पुत्रों (कौरवों) और पाण्डु के पुत्रों (पाण्डवों) ने क्या किया। 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे' ये आरम्भिक शब्द पूरे संवाद की भूमिका रचते हैं और युद्ध को धर्म की भूमि पर हुए संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 1, Verse 1 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
भगवद्गीता का आरम्भ प्रथम अध्याय 'अर्जुन विषाद योग' से होता है। जब महायुद्ध आरम्भ होने को है, नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र, जो स्वयं रणभूमि नहीं देख सकते, अपने सारथी संजय से — जिन्हें व्यास ने दूरदर्शी दृष्टि प्रदान की थी — कुरुक्षेत्र की घटनाओं का वर्णन करने को कहते हैं। उनके ये प्रथम शब्द ही सम्पूर्ण गीता का आरम्भ बन जाते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि गीता धर्म की भूमि पर ही आरम्भ और समाप्त होती है, और पाठ के आरम्भ में इसके प्रथम श्लोक का भक्तिपूर्वक उच्चारण मात्र श्रोता को पवित्र करता है और सम्पूर्ण ग्रन्थ की कृपा को जीवन में आमन्त्रित करता है।
मंत्र
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धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
dhṛitarāśhtra uvācha dharma-kṣhetre kuru-kṣhetre samavetā yuyutsavaḥ māmakāḥ pāṇḍavāśhchaiva kimakurvata sañjaya
अर्थ:धृतराष्ट्र ने कहा -- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए युद्ध के इच्छुक (युयुत्सव:) मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १.१ — धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे पाठ के लाभ
भगवद्गीता के मंगलमय आरम्भ का प्रतीक — इसका पाठ सम्पूर्ण ग्रन्थ का आवाहन करता है
साधक को स्मरण कराता है कि जीवन स्वयं एक 'धर्मक्षेत्र' है जहाँ निर्णय लेने होते हैं
सम्पूर्ण गीता के अध्ययन या पाठ हेतु चिन्तनशील भाव उत्पन्न करता है
गीता पारायण (सम्पूर्ण पाठ) के आरम्भ में परम्परागत रूप से पढ़ा जाता है
कृष्ण और अर्जुन के कालातीत संवाद के प्रति श्रद्धा जगाता है
कर्तव्य, धर्म और मानव हृदय के भीतर के संघर्षों पर चिन्तन को प्रेरित करता है
श्रीमद्भगवद्गीता १.१ — धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे जप विधि
यह श्लोक प्रायः गीता पारायण या दैनिक गीता अध्ययन के आरम्भ में पढ़ा जाता है। यदि चाहें तो गीता ध्यानम् से आरम्भ करें, फिर इस प्रथम श्लोक को श्रद्धापूर्वक पढ़ें, कुरुक्षेत्र की रणभूमि को धर्म की भूमि के रूप में चित्रित करते हुए। चिन्तन करें कि कैसे प्रत्येक दिन अपना ही 'कुरुक्षेत्र' और निर्णयों की भूमि लेकर आता है, और अध्याय आगे बढ़ाने से पूर्व इस श्लोक से मन को स्थिर होने दें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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