गीता ध्यानम्
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✦ अर्थ
गीता ध्यानम् वे नौ ध्यान-श्लोक हैं जो परंपरागत रूप से भगवद्गीता का पाठ आरंभ करने से पहले गाए जाते हैं। ये गीता को दिव्य माता के रूप में पुकारते हैं और व्यास तथा भगवान कृष्ण को नमन करते हैं। इनमें प्रसिद्ध 'वसुदेवसुतं देवम्' और 'मूकं करोति वाचालम्' श्लोक सम्मिलित हैं।
उत्पत्ति और कथा
Gita Dhyanam — traditional invocation prefacing the Bhagavad Gita (attributed to Madhusudana Saraswati) · Attributed to Madhusudana Saraswati · Medieval
भगवद्गीता के संस्करण इन्हीं नौ ध्यान-श्लोकों से आरंभ होते हैं। ये गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि अद्वैत का अमृत बरसाने वाली दिव्य माता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, और व्यास को, जिन्होंने इस संवाद को महाभारत के हृदय में स्थापित किया, तथा कृष्ण को, जिन्होंने समस्त उपनिषदों का सार अर्जुन के कानों में 'दुह' दिया, श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। अध्ययन से पहले इनका पाठ शास्त्र के प्रति श्रद्धा का शताब्दियों पुराना चिह्न है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
'मूकं करोति वाचालम्' श्लोक — 'जिनकी कृपा गूँगे को वाचाल और लँगड़े को पर्वत लाँघने वाला बना देती है' — सम्पूर्ण भारत में जब भी दिव्य कृपा से असंभव-सा कार्य सिद्ध होता है, उद्धृत किया जाता है। जो भक्त इन श्लोकों से अपना गीता पाठ आरंभ करते हैं, वे कहते हैं कि शास्त्र उनके लिए जीवंत हो उठता है, उसका अर्थ शब्दों से कहीं अधिक प्रकट होता है।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
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ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभारतम्। अद्वैतामृतवर्षिणीं भगवतीमष्टादशाध्यायिनीम् अम्ब त्वामनुसन्दधामि भगवद्गीते भवद्वेषिणीम्॥
Om Parthaya Pratibodhitam Bhagavata Narayanena Svayam Vyasena Grathitam Purana-Munina Madhye Mahabharatam Advaitamrita-Varshinim Bhagavatim Ashtadasha-Adhyayinim Amba Tvam Anusandadhami Bhagavad-Gite Bhava-Dveshinim
अर्थ:हे भगवद्गीते! जिसके द्वारा स्वयं भगवान नारायण (कृष्ण) ने अर्जुन को ज्ञान दिया, जिसे व्यास ने महाभारत के मध्य में पिरोया, जो अद्वैत-अमृत बरसाने वाली, अठारह अध्यायों वाली है — हे माता, संसार-बंधन का नाश करने वाली, मैं तुम्हारा ध्यान करता हूँ।
नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र। येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥
Namostu Te Vyasa Vishala-Buddhe Phullaravinda-Yatapatra-Netra Yena Tvaya Bharata-Taila-Purnah Prajvalito Jnanamayah Pradipah
अर्थ:हे विशाल बुद्धि वाले, कमल-से नेत्रों वाले व्यास! आपको नमस्कार, जिन्होंने महाभारत-रूपी तेल से भरा ज्ञान का दीपक प्रज्वलित किया।
प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये। ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः॥
Prapanna-Parijataya Totra-Vetraika-Panaye Jnana-Mudraya Krishnaya Gitamrita-Duhe Namah
अर्थ:समस्त उपनिषद् गौएँ हैं, कृष्ण ग्वाला उन्हें दुहते हैं, अर्जुन बछड़ा है, और बुद्धिमान जन गीता-रूपी महान अमृत-दुग्ध का पान करते हैं।
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥
Sarvopanishado Gavo Dogdha Gopala-Nandanah Partho Vatsah Sudhir Bhokta Dugdham Gitamritam Mahat
अर्थ:वसुदेव के पुत्र, कंस और चाणूर का मर्दन करने वाले, देवकी के परमानन्द, जगद्गुरु कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
Vasudeva-Sutam Devam Kamsa-Chanura-Mardanam Devaki-Paramanandam Krishnam Vande Jagad-Gurum
अर्थ:जिनकी कृपा गूँगे को वाचाल और लँगड़े को पर्वत लाँघने वाला बना देती है — उन परमानन्द माधव को मैं वन्दन करता हूँ।
भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः॥
Bhishma-Drona-Tata Jayadratha-Jala Gandhara-Nilotpala Shalya-Grahavati Kripena Vahani Karnena Velakula Ashvatthama-Vikarna-Ghora-Makara Duryodhana-Avartini Sottirna Khalu Pandavai Rana-Nadi Kaivartakah Keshavah
पाराशर्यवचः सरोजममलं गीतार्थगन्धोत्कटं नानाख्यानककेसरं हरिकथासंबोधनाबोधितम्। लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसि नः श्रेयसे॥
Parasharya-Vachah Sarojam Amalam Gitartha-Gandhotkatam Nana-Khyanaka-Kesaram Hari-Katha-Sambodhana-Abodhitam Loke Sajjana-Shatpadair Aharahah Pepiyamanam Muda Bhuyad Bharata-Pankajam Kali-Mala-Pradhvamsi Nah Shreyase
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥
Mukam Karoti Vachalam Pangum Langhayate Girim Yat-Kripa Tam Aham Vande Paramananda-Madhavam
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥
Yam Brahma Varunendra-Rudra-Marutah Stunvanti Divyaih Stavaih Vedaih Sanga-Pada-Kramopanishadair Gayanti Yam Samagah Dhyana-Avasthita-Tad-Gatena Manasa Pashyanti Yam Yogino Yasyantam Na Viduh Surasura-Gana Devaya Tasmai Namah
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गीता ध्यानम् पाठ के लाभ
भगवद्गीता का पाठ आरंभ करने से पहले गाए जाने वाले परंपरागत नौ 'ध्यान' (ध्यान) श्लोक।
गीता को स्वयं दिव्य माता के रूप में नमन करते हैं, और व्यास तथा कृष्ण का सम्मान करते हैं।
गीता पारायण (क्रमिक पाठ) और गीता अध्ययन आरंभ करने के लिए पढ़े जाते हैं।
इनमें प्रिय श्लोक 'वसुदेवसुतं देवम्' और 'मूकं करोति वाचालम्' सम्मिलित हैं।
भगवान की शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व मन को स्थिर और पवित्र करते हैं।
गीता ध्यानम् जप विधि
गीता आरंभ करने से पहले इन नौ श्लोकों को धीरे-धीरे गाएँ, शास्त्र के प्रति, उसे लिखने वाले व्यास के प्रति, और उसे कहने वाले कृष्ण के प्रति श्रद्धा के रूप में। अनेक लोग नित्य गीता पाठ कम-से-कम 'वसुदेवसुतं देवम्' और 'मूकं करोति वाचालम्' से आरंभ करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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