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श्रीमद्भगवद्गीता 16.3 — तेजः क्षमा धृतिः शौचम् — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता 16.3 — तेजः क्षमा धृतिः शौचम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

तेजः
tejaḥ
तेज, आध्यात्मिक ऊर्जा
क्षमा
kṣhamā
क्षमा
धृतिः
dhṛitiḥ
धैर्य, दृढ़ संकल्प
शौचम्
śhaucham
स्वच्छता, शुद्धि
अद्रोहः
adrohaḥ
किसी के प्रति शत्रुता न रखना, द्वेष का अभाव
न अतिमानिता
na ati-mānitā
घमंड / अति अभिमान का अभाव
भवन्ति
bhavanti
होते हैं, बनते हैं
सम्पदम्
sampadam
गुण, संपदा
दैवीम्
daivīm
ईश्वरीय, दैवी
अभिजातस्य
abhijātasya
जो इनसे संपन्न है उसका / जो इसके लिए जन्मा है
भारत
bhārata
हे भरतवंशी (अर्जुन)

Complete Translation

हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 16, Verse 3

Author: Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa)

Period: Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)

सोलहवाँ अध्याय, दैवासुर-सम्पद-विभाग योग, श्रीकृष्ण द्वारा दैवी भाग्य के लिए जन्मे लोगों के गुणों की गणना से आरंभ होता है। यह श्लोक लगभग छब्बीस दैवी गुणों की उस आरंभिक सूची को पूर्ण करता है, जिसके बाद श्रीकृष्ण विपरीत आसुरी लक्षणों का वर्णन करते हैं। यह प्रसंग दीर्घकाल से सात्त्विक आत्म-विकास की कसौटी रहा है।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 16.3 में दैवी सम्पद क्या हैं?
दैवी सम्पद का अर्थ है उत्तम गुणों का 'दैवी धन'। यह श्लोक तेज (तेजस्), क्षमा, धैर्य (धृति), शुद्धि (शौच), द्वेष का अभाव (अद्रोह) और अभिमान का अभाव (न अतिमानिता) को दैवी भाग्य के लिए जन्मे पुरुष के लक्षण बताता है।
श्रीकृष्ण इन गुणों की सूची क्यों देते हैं?
सोलहवाँ अध्याय दैवी और आसुरी प्रकृति की तुलना करता है। श्रीकृष्ण दैवी गुणों की गणना (श्लोक 16.1–16.3 में) करते हैं ताकि साधक उन्हें पहचान सके, विकसित और सुदृढ़ कर सके, क्योंकि ये मुक्ति की ओर ले जाते हैं जबकि आसुरी लक्षण बंधन की ओर।
अद्रोह का क्या अर्थ है?
अद्रोह का अर्थ है किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष या शत्रुता न रखना। यह सद्भावना और हानि पहुँचाने की इच्छा का अभाव है — दैवी प्रकृति का एक प्रमुख लक्षण जिसकी श्रीकृष्ण इस श्लोक में प्रशंसा करते हैं।
यह श्लोक आज कैसे उपयोगी है?
यह विकसित करने योग्य गुणों की एक स्पष्ट, व्यावहारिक सूची प्रस्तुत करता है — साहस और ऊर्जा, जो क्षमा, स्थिरता, स्वच्छता, सद्भावना और विनम्रता से संतुलित हो। इस पर चिंतन करने से व्यक्ति सचेत रूप से एक उत्तम, सात्त्विक चरित्र विकसित कर सकता है।

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