श्रीमद्भगवद्गीता 16.3 — तेजः क्षमा धृतिः शौचम्
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✦ अर्थ
दैवी और आसुरी प्रकृति के अध्याय में श्रीकृष्ण दैवी सम्पद — दैवी गुणों के धन — की सूची पूर्ण करते हैं। यह श्लोक तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्वेष के अभाव और अभिमान के अभाव को दैवी भाग्य के लिए जन्मे पुरुष के लक्षण बताता है। यह उत्तम, दिव्य चरित्र का चित्र है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 16, Verse 3 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
सोलहवाँ अध्याय, दैवासुर-सम्पद-विभाग योग, श्रीकृष्ण द्वारा दैवी भाग्य के लिए जन्मे लोगों के गुणों की गणना से आरंभ होता है। यह श्लोक लगभग छब्बीस दैवी गुणों की उस आरंभिक सूची को पूर्ण करता है, जिसके बाद श्रीकृष्ण विपरीत आसुरी लक्षणों का वर्णन करते हैं। यह प्रसंग दीर्घकाल से सात्त्विक आत्म-विकास की कसौटी रहा है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परंपरा सिखाती है कि जो व्यक्ति इस श्लोक के दैवी गुणों को सचेत रूप से पोषित करता है, वह धीरे-धीरे निम्न प्रकृति को पार कर जाता है; संत ऐसे गुणों को एक ऐसा धन बताते हैं जिसे कोई दुर्भाग्य चुरा नहीं सकता, और जो निरंतर मुक्ति की ओर ले जाता है।
मंत्र
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तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata
अर्थ:हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता 16.3 — तेजः क्षमा धृतिः शौचम् पाठ के लाभ
दैवी सम्पद — उत्तम आत्मा के दैवी गुणों — की गणना करता है
तेज (तेजस्), क्षमा और धैर्य (धृति) का विकास करता है
शुद्धि, द्वेष के अभाव और अभिमान से मुक्ति को प्रोत्साहित करता है
उस चरित्र का वर्णन करता है जो बंधन की ओर नहीं, मुक्ति की ओर ले जाता है
दैवी, सात्त्विक गुणों के विकास के लिए दैनिक प्रेरणा
साधक को अपनी उच्चतर दैवी प्रकृति को पहचानने और पोषित करने में सहायता करता है
श्रीमद्भगवद्गीता 16.3 — तेजः क्षमा धृतिः शौचम् जप विधि
श्लोक का पाठ करें और प्रत्येक दैवी गुण पर चिंतन करें — तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्वेषरहित सद्भावना, विनम्रता। दिनभर इनमें से किसी एक को सचेत रूप से व्यक्त करने का संकल्प लें। श्रीकृष्ण इन्हें 'दैवी अवस्था के लिए जन्मे' पुरुष के लक्षण बताते हैं, अतः इस जप को अपने चरित्र को उस दैवी सम्पद की ओर अभिमुख करने दें।
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