श्रीमद्भगवद्गीता १८.४६ — यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्
अन्य नाम / खोज: yatah pravrittir bhutanam · yatah pravrittir bhutanam yena sarvam idam tatam · sva karmana tam abhyarchya siddhim vindati manavah · bhagavad gita 18.46 · gita 18 46 · work as worship gita verse
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
अंतिम अध्याय का यह तेजस्वी श्लोक कर्म का गूढ़तम रहस्य प्रकट करता है: कोई भी ईमानदार कर्तव्य, यदि सर्वव्यापक भगवान की पूजा के रूप में किया जाए, तो सिद्धि का साक्षात् मार्ग बन जाता है। जिस परमात्मा से समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं और जो सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है, उसकी पूजा केवल अनुष्ठान से नहीं, बल्कि सही भाव से किए गए अपने कर्म से भी होती है। यह प्रत्येक व्यवसाय को ईश्वर तक पहुँचने का साधन बनाकर उसे गौरव प्रदान करता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 18, Verse 46 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
अठारहवें और अंतिम अध्याय, मोक्ष संन्यास योग में, श्रीकृष्ण सम्पूर्ण गीता की शिक्षा का सार प्रस्तुत करते हैं। स्वभाव के अनुसार कर्तव्यों का वर्णन करने के पश्चात वे यह गहन सत्य प्रकट करते हैं: जो भगवान समस्त प्राणियों के स्रोत हैं और जगत् में व्याप्त हैं, उनकी पूजा अपने कर्म द्वारा होती है, और ऐसी पूजा से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के सन्त — जुलाहे, मोची, किसान और व्यापारी भी — केवल अपने विनम्र कर्म को पूजा के रूप में करके ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए स्मरण किए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसा यह श्लोक वचन देता है, जो सिद्ध करता है कि कोई भी ईमानदार कर्तव्य ईश्वर का बहुत छोटा मार्ग नहीं।
मंत्र
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam sva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ
अर्थ:जिस परमात्मा से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसकी अपने स्वकर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
श्रीमद्भगवद्गीता १८.४६ — यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम् पाठ के लाभ
प्रकट करता है कि पूजा के रूप में किया गया कोई भी ईमानदार कर्म आध्यात्मिक सिद्धि की ओर ले जाता है
प्रत्येक व्यवसाय और कर्तव्य को ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग के रूप में पवित्र बनाता है
सांसारिक कर्म और पूजा के बीच के भेद को मिटाता है
दैनिक श्रम में गरिमा, अर्थ और भक्ति लाता है
सिखाता है कि सर्वव्यापक भगवान की सेवा अपने धर्म के द्वारा की जा सकती है
कर्मयोग, भक्ति और आत्म-सिद्धि को एक ही साधना में जोड़ता है
श्रीमद्भगवद्गीता १८.४६ — यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम् जप विधि
इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन अपना कार्य आरम्भ करने से पहले करें, अपने कर्तव्य को सर्वव्यापी भगवान की पूजा के रूप में सचेत भाव से अर्पित करते हुए। इसे साधारण कार्यों को भक्ति के कर्मों में बदलने दें, जो भगवान के लिए किए जाएँ न कि केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए। यह विशेष रूप से उन सभी के लिए प्रेरक है जो अपने कार्य को सामान्य अनुभव करते हैं — उन्हें स्मरण कराता है कि ईश्वर को अर्पित सच्चा कर्तव्य ही सिद्धि-प्राप्ति का साधन बन जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ये भी पढ़ें
ॐ
Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides